रविवार, 8 मार्च 2009

टिप्पणी करते समय इन बातों का ध्यान रखें




ब्लॉगजगत में टिप्पणियों के महत्त्व से भला कौन ब्लॉगर अपरिचित होगा। और वो भी हिन्दी ब्लॉगजगत में जहाँ ब्लॉगरों की संख्या कुछ हजार तक सीमित है। यहाँ ब्लोगर ही एक दूसरे को पढ़ते हैं; नान-ब्लोगर पाठकों की संख्या नही के बराबर है। ऐसे में सार्थक टिप्पणियाँ जहाँ ब्लोगर का उत्साहवर्द्धन करके उसे और अच्छा और नियमित लिखने को प्रेरित करती हैं वहीं टिप्पणी के अभाव में कई ब्लॉग शैशवावस्था में ही दम तोड़ देते हैं। इसलिए यह बात तो तय है की टिप्पणी न करने से तो कैसी भी टिप्पणी करना अच्छा है। बिन-मामा वाले से काना मामा वाला अच्छा! पर अगर टिप्पणी करते समय कुछ बातों का ख़याल रखा जाए तो न सिर्फ़ ब्लोगर को सच्चे प्रोत्साहन का आनंद मिलेगा बल्कि ब्लॉगजगत में आपकी भी एक अच्छी छवि बनेगी। यहाँ मैंने ध्यान रखने लायक कुछ बातों को गिनाया है : -

१) पोस्ट को पूरा पढ़े बिना टिप्पणी न करें : - कई लोग अधिक से अधिक ब्लॉगस पर टिप्पणी करने के चक्कर में पोस्ट को बिना पढ़े ही टिप्पणी करते चलते हैं। ऐसी टिप्पणियाँ कभी कभी तो खप जाती हैं पर कभी कभी इनका घातक अर्थ और प्रभाव भी हो सकता है। जैसे किसी ने अपने किसी प्रिय के बिछुड़ने के बारे में लिखा है और आप उसपर "बहुत अच्छे" या "बधाई" टिपिया आए हैं। वैसे लंबे समय के बाद कई लोगों को अनुभव हो जाता है कि पोस्ट का शीर्षक देखकर ही कैसे सटीक टिप्पणी मारी जाए। पर मेरी सलाह है कि समय अभाव में पोस्ट को पूरा नही पढ़ पाएं तो कम से कम सरसरी तौर पर निगाह तो दौडा ही लें। पोस्ट के अनुकूल टिप्पणी मिलने पर लेखक जहाँ प्रसन्न होता है वहीं बिल्कुल अलग टिप्पणी देखकर छला हुआ महसूस करता है।

२) एक शब्द की टिप्पणी न करें - माना की मंदी का दौर है; पर ऐसी भी क्या कंजूसी! कई बार बहुत मेहनत से लिखी गई पोस्ट पर हम सिर्फ़ "सुंदर", "बहुत अच्छा", "शुभकामनाएं" आदि लिखकर चल देते हैं। ऐसे में लेखक को चोट पहुँचती है। यह तो उसी प्रकार हुआ कि प्यासे के मुंह में दो बूँद पानी गिरा के चल दिए। हालांकि कभी कभी जल्दबाजी में ऐसा करना पड़ता है। पर अगर समय मिले तो अच्छी पोस्ट पर दुबारा जाकर अच्छे से टिप्पणी करें।

३) हस्ताक्षर न करें - अगर आप बेनामी टिप्पणी नही कर रहे हों, यानि कि ब्लॉगर या किसी अन्य अकाउंट में पहले से साइन इन हैं तो आपका नाम स्वतः टिप्पणी के साथ आ जाता है; वो भी आपके ब्लॉग के लिंक के साथ। इसलिए दुबारा से नीचे नाम लिखने की कोई आवश्यकता ही नही है। यह ब्लॉगर के साथ- साथ अन्य पाठकों को भी इरिटेट करता है। टिप्पणी कोई पत्र नहीं है जिसे आप "प्रिय फलाना" से शुरू करें और "आपका प्यारा चिलाना" से ख़त्म करें। इसके अलावा टिप्पणी में कोई अन्य व्यक्तिगत जानकारी जैसे फोन नंबर, ई-मेल आईडी वगैरह भी न डालें।

४) रंग-रोगन या साज-सज्जा न करें - कई लोग टिप्पणियों को बोल्ड, इटैलिक और अंडरलाइनड अक्षरों से सुसज्जित करते हैं। यहाँ यह बात ध्यान रखने योग्य है कि आपकी टिप्पणी का महत्व सजावट से नहीं बल्कि उसकी गुणवत्ता से बढ़ता है। कुछ सार्थक लिखें; पोस्ट की विषयवस्तु से जुड़े अपने अनुभव बांटे, कोई जिज्ञासा रखें अथवा उसके विरोध में ही अपनी राय रखें। इस प्रकार की एक अच्छी टिप्पणी आपको कई नियमित पाठक दिला सकती है। ध्यान रखें कि आपकी टिप्पणी आपके रेज्यूमे की तरह है जिससे आप पाठकों को लुभा कर अपने ब्लॉग तक खींच सकते हैं।

५) लिंक्स देने की आदत न बनाएं - कई टिप्पणीकार अपनी हर टिप्पणी में अपने ब्लॉगस का लिंक चिपका देते हैं। यह एक प्रकार की स्पैमिंग है। हो सकता है कि इस तरह आप ५-१० हिट्स पा लें पर इससे आपकी जो छवि बनती है वह कहीं ज्यादा पाठकों को आपसे दूर ले जाएगी। आपकी टिप्पणी आपके ब्लॉग का आइना है। इसपर मेहनत करें, रोचक टिप्पणियां लिखें। यह आपको लिंक्स से ज्यादा हिट्स दिलाएगा। हाँ, अगर पोस्ट से संबधित कोई उपयोगी जानकारी किसी वेबसाईट पर उपलब्ध है और आप उसे शेयर करना चाहते हैं तो लिंक्स दिए जा सकते हैं।

6) अभद्र भाषा का प्रयोग न करें - अगर आप लेखक के विचारों से पूरी तरह असहमत भी हैं तो संतुलित और विनम्र भाषा में तर्कों के साथ अपनी बात रखें। व्यक्तिगत आक्षेपों से बचें। हाँ, होली वगैरह के मौके पर थोडा बहुत मजाक खप जायेगा।

७) बाबा न बनें - कई लोग पोस्ट पर इस प्रकार समझाने के लहजे में टिप्पणी करते हैं जैसे उन्होंने उस विषय में शोध कर रखा हो और लिखने वाला निरा बुद्धू है। जैसे "थोडा और अच्छा लिख सकते थे. ऐसे ही लिखते रहो। बहुत आगे जाओगे", "अच्छा लिखा है पर धार में थोड़ी कमी है" इत्यादि। ऐसी बाबा टाइप टिप्पणियों से बचें (अगर आपने सचमुच उस विषय पर शोध कर रखा हो तो भी)।

अंत में कुछ छिटपुट सुझाव - टिप्पणी करने के बाद पोस्ट बटन दबाने से पहले देख लें कि कहीं वर्तनी वगैरह की अशुद्धि तो नहीं है अथवा कोई और भयंकर गलती तो नहीं है। कभी कभी बड़ी हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण गलतियां हो जाती हैं। हम बाद में टिप्पणी को एडिट तो कर नहीं सकते। मोडरेशन है तो ब्लोगर की दया वरना तो बेइज्जती है ही।

बाकी
, इन सब बातों को दिल पर न लें मस्ती से टिपियाते रहें। आज बस उपदेश देने का मूड हो लिया था। इसलिए लिख मारे। आप सबको होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
(वैसे यहाँ हर प्रकार की टिप्पणियों का स्वागत है। कहते हैं न कि बिन-मामा वाले से काना मामा वाला अच्छा!)

मंगलवार, 3 मार्च 2009

११ साल की एक लडकी जो अपनी कलम से तालिबान से लड़ रही है



इस लडकी का नाम है तुबा सहाब (Tuba Sahaab)। उम्र - ११ साल। रहती है इस्लामाबाद, पाकिस्तान के बाहरी इलाके में जो तालिबान का गढ़ माने जाने वाले स्वात घाटी से मात्र दो घंटे की दूरी पर है। इसकी तस्वीर को देखकर अगर आप इसे एक साधारण स्कूल की छात्रा समझ रहे हैं तो जनाब, आप ग़लत हैं। इस लडकी ने एक ऐसी जंग छेड़ी है जिसके बारे में सोचने मात्र से अच्छे-अच्छों के हौसले पस्त हो जाएँ। तुबा ने जंग छेड़ी है उस कट्टरपंथी इस्लामी संगठन तालिबान के ख़िलाफ़ जिसने अमेरिका जैसी विश्व शक्ति को भी हिला कर रख दिया था। और वह भी उस क्षेत्र में जहाँ जाने से मानवाधिकार संगठन भी डरते हैं। जहाँ तालिबान लोगों को कत्ल कर के फेंक देते हैं और लोग खौफ के मारे लाशों को उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। जहाँ २४ घंटे कर्फ्यू होता है।

और हथियार क्या हैं तुबा के पास - सिर्फ़ उसकी कलम। अपनी कविताओं के जरिये वह तालिबान की तलवारों से लड़ने को तैयार है। वह कविताएँ लिखती है- उसके जैसे बच्चों के दुःख और दर्द के बारे में, स्कूल जाने से रोक दी गयी लड़कियों के बारे में, जला दी गयी किताबों के बारे में, कट्टरपंथियों के आतंक के बारे में, प्रतिरोध और विद्रोह के बारे में। और आश्चर्य इस बात का है की यह सब करते हुए उसे डर नहीं लगता। वह अपनी कविताएँ खुलेआम लोगों को सुनाती है, मीडिया को भेजती है; यहाँ तक की उसकी एक किताब भी प्रकाशित हुई है। उसने टोमैटो-मैन नाम के एक काल्पनिक पात्र की रचना भी की है जिसे वह अपनी कहानियों में इस्तेमाल करती है। उसकी एक कविता की पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:-
आंसुओं की छोटी छोटी बूँदें,
उनके परियों जैसे मासूम चेहरे,
रक्त से धुले हुए,
वे हमेशा के लिए सोते हैं, क्रोध के साथ.
( यह मूल अंगरेजी कविता का हिन्दी अनुवाद है। )



तुबा बराक ओबामा को अपना आदर्श मानती है और व्हाइट हाउस जाकर उनसे मिलना चाहती है। वह पाकिस्तान में स्थितियों को सुधारने के लिए उनसे मदद का अनुरोध करना चाहती है।

तुबा अपनी उम्र की तुलना में कहीं ज्यादा ज़हीन और बहादुर है। वह बड़ी होकर एक एस्ट्रोनौट बनाना चाहती है; देश का नेतृत्व करना चाहती है। उसका कहना है की वह सब कुछ देखते हुए चुप नहीं रह सकती। वह अपने देश को इस नारकीय स्थिति से मुक्ति दिलाना चाहती है; देश में शान्ति और खुशहाली देखना चाहती है; देश के लिए कुछ कर गुजरना चाहती है। तुबा अपने माता-पिटा की एकमात्र औलाद है। तुबा की मां कहती हैं कि यह एक औलाद सात बेटे-बेटियों से बढ़कर है। वे कहती हैं कि उन्हें अपनी बेटी पर फख्र है।


सी एन एन पर तुबा का वीडियो इन्टरव्यू देखें :----------

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2009

जेएनयू: हम तो समझे थे.....................

जेएनयू प्रशासन के ख़िलाफ़ जारी छात्रों के वर्तमान संघर्ष के बीच ही एक पर्चा कुछ छात्रों ने जारी किया था जो इस पूरे मामले को न सिर्फ़ बड़ी खूबसूरती के साथ रखता है बल्कि इस लड़ाई को एक नई धार देने की कोशिश करता है। इस पर्चे को अपने ब्लॉग पर स्थान देने की कई दिनों से इच्छा थी। आज जब जेएनयू प्रशासन द्वारा ५ छात्रों को विश्वविद्यालय से निकालने का तानाशाही निर्णय लिया गया है, यह पर्चा और भी प्रासंगिक हो गया है। इसे प्रस्तुत कर रहा हूँ। पर्चे को लिखा था इन छात्रों ने : विस्मय, इम्तियाज़, राधिका, बृजेश, दिग्विजय, शादाब और नितेश।
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"हम तो जेएनयू को समझे थे घर जैसी पवित्र चीज़
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मह की गूँज की तरह गलियों में बहता है
गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है..........."

यह बात सच है कि जेएनयू आने से पहले 'यूनिवर्सिटी' के बारे में हमारे ख़याल दूसरे थे। यह बात सच है कि जेएनयू आने से पहले 'अध्यापक' के बारे में हमारे ख़याल दूसरे थे। यह बात सच है कि जेएनयू आने से पहले 'छात्रसंघ'' के बारे में हमारे ख़याल दूसरे थे। यह बात सच है कि जेएनयू आने से पहले 'पॉलिटिक्स' के बारे में हमारे ख़याल दूसरे थे। यह बात सच है कि जेएनयू आने से पहले 'जेंडर और कास्ट' के बारे में हममें से कई लोग दूसरे तरह का ख़याल रखते थे। यह बात सच है कि जेएनयू आने से पहले हमको 'साम्प्रदायिकता' के खतरे की समझ इस तरह से नहीं थी। यह बात सच है कि जेएनयू आने से पहले अपने बारे में हमारे ख़याल कुछ धुंधले धुंधले थे।

ऐसा नहीं है कि जेएनयू में आने के बाद सीखने के लिए कुछ बच नहीं जाता। ऐसा नहीं है कि जेएनयू के भीतर कमियाँ कमजोरियां नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि जेएनयू के भीतर सब कुछ अच्छा ही है। जेएनयू तमाम कमजोरियों से दूर, तमाम अच्छाइयों से लैस कोई आइलैंड नहीं है। बावजूद इसके हम पूरी शिद्दत से यह कहना चाहते हैं कि जेएनयू ने हमें वो तमाम बातें और चीज़ें सिखाईं जो अगर हम कहीं और होते तो सीखने में बड़ा वक्त लग जाता और हममें से कई लोग जिन्हें शायद न सीख पाते।

आख़िर कुछ तो सोचा होगा जी पार्थसारथी (जेएनयू के पहले चांसलर) और मुनिस रज़ा (पूर्व चांसलर) जैसे लोगों ने, जब वे इस यूनिवर्सिटी का आर्किटेक्ट डिजायन कर रहे थे। कुछ कि रहा ही होगा उनके मन में जब वे कहते थे कि जेएनयू के भीतर हम पक्की पगडंडियाँ इसलिए नहीं बनाएंगे कि जेएनयू के छात्र अपना रास्ता ख़ुद बनाएंगे और ये कि जेएनयू के छात्रों को बने बनाए रास्तों पर चलने की ज़रूरत नहीं है। आख़िर कोई बात तो दिमाग में रही ही होगी जब यूनिवर्सिटी की उदघोषणा को नेहरू के भाषण के उस अंश से ग्रहण किया गया, जो कहती है कि "एक विश्वविद्यालय जो खडा होगा मानवता के लिए, न्याय के लिए, सहिष्णुता के लिए......." सत्तर के दशक के उन छात्रों के दिमाग में कोई न कोई तस्वीर तो रही होगी, जब उनहोंने रात-रातभर जागकर और बहस कर जेएनयू छात्र संघ संविधान की नींव रखी, जीबीएम और यूजीबीएम की परम्परा डाली। मोहम्मद हसन, नामवर सिंह, रोमिला थापर, बिपन चंद्र, कृष्ण भारद्वाज, योगेन्द्र सिंह, मुनिस राजा, मीनाक्षी मुखर्जी... जैसे अध्यापकों के मन में कोई एक प्रोजेक्ट तो रहा ही होगा जो उन्होंने ऐसा उन्नत पाठ्यक्रम (कोर्स करिकुलम) डिजायन किया, जिसके सामने आज भी कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड पानी भरते हैं। यूनिवर्सिटी की शुरुआत से ही गाँव-गिराँव के लड़के-लड़कियों को २० डिप्रेवेशन प्वाइंट देना 'दया' की बात तो ज़रूर ही नहीं रही होगी। आज कानून पास हो जाने के बाद भी शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण और महिलाओं की भागीदारी के मद्देनज़र ये याद करना ज़रूरी लगता है कि यह जेएनयू ही है जिसने पिछले तीन दशकों से लगातार सामाजिक, आर्थिक रूप से पिछडे छात्रो को दाखिला देने का एक रिकोर्ड कायम किया है। आख़िर क्या बात है?

जेएनयू 'जेएनयू' क्यों है? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि यहाँ सिर्फ़ २६३ रूपए में एडमिशन मिल जाता है? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि यहाँ आप सिर्फ़ १५ रूपए प्रति माह फीस देकर होस्टल में रह लेते हैं? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि सेशनल और मिड टर्म के समय रात में नींद हराम हो जाती है, तब भी न जाने हम कैसे पास हो जाया करते हैं? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि यहाँ छात्र संघ का चुनाव बड़े दिलचस्प तरीके से होता है, जहाँ घमासान वैचारिक राजनीतिक बहसों और विरोध के वाबजूद विरोधी पार्टियों के नेता कार्यकर्ता अगली सुबह एक ही ब्रेकफास्ट टेबल पर पाये जाते हैं? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि यहाँ लड़के और लडकियां दिन हो या रात, कहीं भी बेरोकटोक घूम सकते हैं? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि गंगा ढाबे पर बैठकर आप प्याले में तूफ़ान खडा कर देते हैं? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि रात में रिंग रोड का सफ़र शायद दुनिया का सबसे सुहाना सफ़र है? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि पूरी रात पीएसआर पर बैठ कर गुजार देने के बाद उगते सूरज को देखना अच्छा लगता है? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि गोपालन जी की लाइब्रेरी कैंटीन दिल्ली का सबसे सस्ता खाना खिलाती है? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि यहाँ गरीब छात्रों को एमसीएम (Merit-cum-Means Scholarship) मिला करता है? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि यहाँ जीएसकैश (जेंडर सेंसितैजेशन कमिटी फॉर अगेंस्ट सेक्सुअल हरासमेंट) है? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि यहाँ दिल्ली का सबसे घना जंगल, सबसे गहरी गुफा, सबसे ऊंची चट्टान, सबसे खूबसूरत पक्षी, और तमाम तरह के कीडे-मकोडे मिलते हैं? क्या जेएनयू सिर्फ इसलिए 'जेएनयू' है कि 'आपके लिए, आपके साथ सदैव' का बिल्ला लगाने वाली दिल्ली पुलिस की वें यहाँ नहीं घूमा करती? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि तमाम होस्टल्स के साथ-साथ इसका नॉर्थ गेट कभी बंद नहीं होता (ईस्ट गेट की बात दूसरी है, वहाँ हमारे वी सी साहब रहते हैं).

ये सब जेएनयू है। यह सब और............. और भी बहुत कुछ, वही सब कुछ है जो जेएनयू की आत्मा का निर्माण करता है। यह वही सब है जो जेएनयू को 'जेएनयू ' बनाता है। इसमें एक भी चीज आप खत्म कर देंगे तो शायद जेएनयू 'जेएनयू नहीं रह जायेगा। इसमें किसी पर भी हमला 'जेएनयू' की आत्मा पर हमला है, जेएनयू की पहचान पर हमला है, पीढियों की मेहनत और सपने पर हमला है। हमें हर हर हमले का जवाब देना होगा।

चंदू (पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष) ने कुछ तो सोचा होगा जब '९५ में वे फीस वृद्धि के खिलाफ प्रशासन से जूझ गए थे। '९३ की उस युनियन ने कुछ तो सोचा ही होगा जिसने '८३ के ख़त्म कर दिए गए डिप्रेवेशन प्वाइंट को फ़िर से शुरू कराने के लिए एतिहासिक लड़ाई लड़ी थी। उन तमाम सारी यूनियंस की कुछ तो समझदारी रही ही होगी जिन्होंने हमारी फीस को २६३ रु से २६४ रु नहीं होने दिया।

जरूर......... बात थी; कि एक ऐसा विश्वविद्यालय बनाएंगे जिसमें ऐसे लोग भी आ सकें, रह सकें, पढ़ सकें, बढ़ सकें, जिनके लिए जेएनयू के बाहर दिल्ली में सरवाइव करना भी मुश्किल होता। .....बात थी कि कालीकट, वारंगल, गुंटूर, कुन्नूर, नागरकोइल, जोरहाट, धनबाद, पूर्णिया, चंदौली, बिजनौर, झुंझूनू, सिलीगुड़ी, इटानगर, इम्फाल, अमरावती, आसनसोल, शोलापुर, कटिहार, आजमगढ़, टीकमगढ़, बस्तर, अनंतनाग और कश्मीर, कारगिल, चंबा, पिथौरागढ़, मयूरभंज, कालाहांडी के साथ-साथ श्रीलंका और नेपाल से चप्पल फटकारते हुए आने वाला नौजवान जब यहाँ आए तो उसे चप्पल पहनने को लेकर कोई तंज (हीनभावना) न हो।

पढ़ते तो यहाँ ऐसे भी लोग हैं जिनका पूरा परिवार विदेशों में रहता है या जिनके माता-पिता मंत्री-संत्री हैं। पढ़ते तो यहाँ ऐसे भी लोग हैं जो जरूरत पड़ने पर अपनी छात्रवृति का पैसा बचाकर घर भेज देते हैं। पढ़ती तो यहाँ ऐसी लड़कियां भी हैं जिन्होंने जेएनयू आने से पहले कभी जींस नहीं पहना। और ऐसी भी जो आठवीं से पहले घुड़सवारी सीख चुकी थीं। लेकिन ऐसे मौके शायद कम ही आए हैं या आने दिया गया है जब अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर कोई बेहतर-कमतर की जहनियत पाले हो।

आज इसी जेएनयू पर हमला है। बात सिर्फ़ प्रोस्पेक्टस का दाम बढ़ने की नहीं है, ये भी नहीं की होस्टल में मीटर लग आरहे हैं, बिल लिया जायेगा। शायद यह भी नहीं कि पी एस आर पर फिल्में बनेंगी और यूनिवर्सिटी मुनाफा कमाएगी। बात जैसा कि तमाम संगठन और छात्र संघ के लोग कह रहे हैं, उस मानसिकता की है जो विश्वविद्यालय और उसके संसाधनों के मुनाफा कमाने के स्रोत के रूप में देखती है। जेएनयू प्रशासन इसी मानसिकता का मास्टरमाइंड है। जेएनयू वीसी और रेक्टर ने इसी मानसिकता में पीएचडी की हुई है जिसे कुछ अध्यापकों ने ठीक ही 'मोंटेक-मनमोहन मानसिकता' कहा है। वो मानसिकता जो हर चीज को किराये पर उठा देना चाहती है, हर सुविधा का यूजर चार्ज लेना चाहती है, हर बात से मुनाफा कमाना चाहती है।

जिस तरह आरक्षण से छेड़छाड़ की जा रही है, विकलांग छात्रों के अधिकारों को रौंदा जा रहा है, जेएनयू की डेमोग्राफी और ईकोलोजी को बदलने की कोशिश की जा रही है, सोची-समझी योजना के तहत टुकड़े-टुकड़े में निजीकरण लागू किया जा रहा है, खम्भे उखाड-गाडे जा रहे हैं, रिफ्लेक्टरस और साइनबोर्डस में जेएनयू को बदल देने की कोशिश है। प्रशासन की यह पूरी साजिश, यह कोशिश उस सबके ख़िलाफ़ है जिसके लिए जेएनयू बना था, जिसके लिए '७० से लेकर अब तक लोग लड़े हैं, जिसको बनाने में छात्रों से लेकर ईमानदार प्रगतिशील अध्यापकों ने भी खून पसीना जलाया है। इसे रोकना होगा।

हम छात्रों की संख्या, हमारी एकता ही हमारी ताकत और हमारा हथियार है. आइये इस ताकत को इकट्ठा करें, हथियार को धार दें और प्रशासन पर हल्ला बोल दें। ये मालूम है कि लड़ाई एक दिन की नहीं है। जेएनयू 'जेएनयू' बना भी एक दिन में नहीं और वैस चांसलर व उनके लोग अपने एक कार्यकाल में उसको बिगड़ भी नहीं पाएंगे। हम उनको ऐसा करने भी नहीं देंगे। हम इस लड़ाई को आख़िर तक लडेंगे।
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जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष समेत ५ छात्र निष्कासित

जेएनयू के प्रोस्पेक्टस के दाम में वृद्धि, कैम्पस के कुछ ख़ूबसूरत स्थानों को फ़िल्म शूटिंग वगैरह के लिए किराये पर दी जाने और होस्टल के कमरों में बिजली मीटर लगाए जाने जैसे प्रशासनिक फैसलों के ख़िलाफ़ ३ हफ्तों से जारी छात्रों की लड़ाई ने उस समय एक नया मोड़ ले लिया जब प्रशासन ने जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष संदीप सिंह समेत ५ छात्रों को विश्वविद्यालय से निष्काषित कर दिया। निष्काषित किए गए अन्य छात्र हैं: - शेफालिका शेखर (छात्र संघ उपाध्यक्ष), मोबीन आलम (छात्र संघ संयुक्त सचिव), रोशन किशोर और रेणु। संदीप सिंह को २ साल के लिए जबकि अन्य छात्रों को १-१ साल के लिए निकाला गया है।

हुआ यों कि आज छात्रों ने प्रशासनिक भवन में बढ़ी हुई कीमत वाले प्रोस्पेक्टस की बिक्री होने से रोक दिया। छात्रों की मांग थी कि प्रोस्पेक्टस की कीमत घटाकर पहले जितनी की जाए। शाम तीन बजे प्रशासन ने छात्रों को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया जिसका जवाब देने के लिए चार बजे तक का वक्त दिया गया। छात्रों ने इसके लिए एक दिन का समय माँगा पर प्रशासन ने शाम पाँच बजे ५ छात्रों के निष्कासन का आदेश जारी कर दिया।

छात्र संघ ने छात्रों का आह्वान किया है की इस लड़ाई को हमें हर हाल में जीतना ही होगा वरना जेएनयू "जेएनयू " नहीं रह जायेगा।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

बच्चों के साथ क्या "न" करें : कुछ मजेदार कार्टून







कुछ और रोचक तस्वीरें आप कल की पोस्ट में देख सकते हैं। The fun contd......................

आभार: ये सारी तस्वीरें David और Kelly Sopp की किताब
"Safe Baby Handling Tips" से ली गयी हैं। जब तस्वीरें आपको इतनी पसंद आई हैं तो सोचिए किताब कितनी पसंद आयेगी। आप इस किताब को Amazon पर खरीद सकते हैं।
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शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

कला क्या है

कितना दुःख वह शरीर जज़्ब कर सकता है ?
वह शरीर जिसके भीतर खुद शरीर की टूटन हो
मन की कितनी कचोट कुण्ठा के अर्थ समझ उनके द्वारा अमीर होता जा सकता है ?

अनुभव से समृद्ध होने की बात तुम मत करो
वह तो सिर्फ अद्वितीय जन ही हो सकते हैं
अद्वितीय याने जो मस्ती में रहते हैं चार पहर
केवल कभी चौंककर
अपने कुएँ में से झाँक लिया करते हैं
वह कुआँ जिसको हम लोग बुर्ज कहते हैं

अद्वितीय हर व्यक्ति जन्म से होता है
किन्तु जन्म के पीछे जीवन में जाने कितनों से यह
अद्वितीय होने का अधिकार
छीन लिया जाता है
और अद्वितीय फिर वे ही कहलाते हैं
जो जन के जीवन से अनजाने रहने में ही
रक्षित रहते हैं

अद्वितीय हर एक है मनुष्य
और उसका अधिकार अद्वितीय होने का छीनकर जो खुद को अद्वितीय कहते हैं
उनकी रचनाएँ हों या उनके हों विचार
पीड़ा के एक रसभीने अवलेह में लपेटकर
परसे जाते हैं तो उसे कला कहते हैं !

कला और क्या है सिवाय इस देह मन आत्मा के
बाकी समाज है
जिसको हम जानकर समझकर
बताते हैं औरो को, वे हमें बताते हैं

वे, जो प्रत्येक दिन चक्की में पिसने से करते हैं शुरू
और सोने को जाते हैं
क्योंकि यह व्यवस्था उन्हें मार ड़ालना नहीं चाहती
वे तीन तकलीफ़ों को जानकर
उनका वर्णन नहीं करते हैं
वही है कला उनकी
कम से कम कला है वह
और दूसरी जो है बहुत सी कला है वह

कला बदल सकती है क्या समाज ?
नहीं, जहाँ बहुत कला होगी, परिवर्तन नहीं होगा।

---------- --- रघुवीर सहाय (१९२९-१९९०) के 1984 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कविता संग्रह "लोग भूल गए हैं" से।