सोमवार, 24 नवंबर 2008

नकलची विद्यार्थियों के लिए खुशखबरी

दोस्तों अभी हमलोगों का एंड सेमेस्टर एक्जाम चल रहा है। इस दौरान कई विद्यार्थियों की शिकायत सुनी कि नक़ल करने के उनके अधकार का शिक्षकों द्वारा हनन किया जा रहा है।

उन विद्यार्थियों कि मदद के लिए या यों कहें कि उनके आन्दोलन को अपना "समर्थन" देने के लिए एक बहुत हे रोचक लेख लिख रहा हूँ। जल्द ही आपके सामने आयेगा।

तब तक इंतजार का आनंद लीजिये

शनिवार, 15 नवंबर 2008

मुझे इन चाटों से बचाओ - जे एन यू

<span title="Click to correct" class="transl_class" id="0">जे</span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="1">एन</span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="2">यू</span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="3">में</span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="4">चाट</span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="5">परंपरा</span>

सबसे पहले "चाट" शब्द पर थोड़ा प्रकाश डालना या यूं कहें कि इसका स्पष्टीकरण देना ज़रूरी है। वर्ना कुछ लोग इसे अंग्रेजी वाले "चैट" का हिन्दी रुपन्तरण अथवा चाट-पकौड़े वाली चाट समझने की भूल भी कर सकते हैं। अब हर किसी को अपने जितना अकलमंद तो नहीं समझ सकते न! हां तो, यहां चाट शब्द "चाटना" क्रिया से बना है; लेकिन वो "लिक" वाला चाटना नहीं। इसका सीधा मतलब है किसी को जबर्दस्ती भाषण (बकवास) पिला पिला कर बोर करना। यह चाट प्रजाति हर जगह पाई जाती है; चाहे गली-मुहल्ला हो, ऑफ़िस हो या फ़िर स्कूल कॉलेज। इन्हें यह भ्रम होता है कि ये अरस्तू और सुकरात से भी बड़े विचारक और विवेकानन्द से भी बड़े वक्ता हैं। ये दुनिया के अज्ञानियों को ज्ञान बांटना अपना कर्तव्य या यों कहें कि अधिकार समझते हैं। इन्हें लगता है कि इनके वचनामृत सुनकर लोग लोग धन्य हो जाएंगे।

हमारे जे एन यू में चाटों की एक दीर्घकालीन परंपरा रही है। यहां पाये जाने वाले चाटों की मुख्य किस्में इस प्रकार हैं:-

हल्का चाट :- ये आमतौर पर नये या फ़िर चाट विद्या में मंदबुद्धि चाट होते हैं। ये चाटते कम हैं और बदनाम ज्यादा होते हैं। ये अगर रास्ते में मिल जायें तो आठ-दस फ़ालतू के सवाल चेंप देंगे। सवालों की प्रकृति बड़ी निर्दोष किस्म की होगी; जैसे "हॉस्टल से आ रहे हैं क्या?" (और क्या किताबें लेके काशी से आऊंगा), "अभी आ रहा था तो रास्ते में आपके क्लास का एक लड़का दिखा था" (तो मैं क्या करूं) इत्यादि। आपको चिढ़ बहुत आयेगी मगर जवाब तो देना ही पड़ेगा। इन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि आप क्लास के लिए लेट हो रहे हैं या आपका एक्जाम छूट रहा है। हां, एक बात और, ये दिन में जितनी बार आपसे मिलेंगे उतनी बार हाथ मिलाएंगे और "कैसे हैं" इस मुद्रा में पुछेंगे जैसे वर्षों के बिछुड़े भाई मिलें हों।


कड़ा चाट :- ऐसे चाटों का मानना होता है कि अवसर का इंतजार मत करो बल्कि उसे तलाशो। इनके अनुसार तसल्ली से बातचीत तो कमरे पर ही हो सकती है, इसलिए ये सीधे आपके कमरे पर ही पधारते हैं। पधारने का समय ऐसा अनुकूल होता है कि आप कोई बहाना बनाकर छूट भी नहीं सकते; जैसे, जब आप लंच के बाद सोने के लिए बिस्तर पर बस लेटने ही वाले हों या फ़िर छुट्टी का दिन हो और आप कमरे में पायजामा और बनियान में आराम से अखबार वगैरह पढ़ रहे हों। ये आते ही पहला वाक्य बोलेंगे "अरे, आपको फ़ालतू डिस्टर्ब किया। दर असल कमरे में बैठकर बोर हो रहा था। अब हॉस्टल में दो-चार बातें करने लायक आदमी ही कितने हैं (आप जैसे बेवकूफ़ को छोड़कर)" और आप फ़ॉर्मलिटी निभाते हुए कहेंगे "अरे नहीं, अच्छे आये; मैं भी बोर ही हो रहा था"। इसके बाद उनका चाट भाषण शुरू होगा। बिषय उनके ही महान जीवन से जुड़े होंगे; जैसे, कैसे उनके फलाना शिक्षक के एक्जाम में सारे प्रश्न सही करने के बाद भी (*गाली*) शिक्षक ने फ़ेल कर दिया या फ़िर कैसे गांव मे उन्होंने दारोगा पर गोली चला दी इत्यादि। आप ये सोच कर अनमने ढंग से सिर्फ़ "हाँ", "हूँ" करते रहेंगे कि मेरा ज्यादा इंटरेस्ट नहीं देखकर ये जल्दी चला जायेगा। लेकिन वो चाट ही क्या जो इतनी जल्दी हार मान ले। आखिरकार आप ऊब कर कहेंगे,"चलिये, गंगा ढाबे पर चाय पीकर आते हैं"। ये सोचकर कि शायद ये महाशय चाय पीकर उधर से ही अपने कमरे में चले जायेंगे। इसी सुखद कल्पना में चाय और पकौड़े के पैसे भी आप ही दे देंगे। लेकिन आप यह देखकर सर पीट लेंगे कि श्रीमान आपके साथ-साथ ही वापस आपके कमरे का रुख करते हैं।


राजनीतिक चाट :- ये किसी छात्र संगठन से जुड़े होते हैं । इनको आप हुलिये से भी पह्चान सकते हैं: बढी हुई दाढ़ी, कंधे पर झोला और पैरों में हवाई चप्पल। ऐसा लगेगा सारी दुनिया को बदलने का जिम्मेदारी इन्ही के कंधों पर है। ये अपको कैंपस में यहां-वहां भटकते हुए, ढाबों पर (शिकार की तलाश में) अथवा किसी धरना, प्रदर्शन या भूख हड़ताल में दिख जाएंगे। इनका भाषण रेडिमेड होता है और मौका देखते ही न्यूक्लियर डील, आतंकवाद, या बम विस्फ़ोटों के ऊपर आधे पौन घंटे का भाषण पेल देंगे। ये छोटी से छोटी बात को भी इतने जोरदार और उत्तेजक तरीके से बोलेंगे कि अपको लगेगा कि शायद तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ गया है। उदाहरण के लिए किसी लड़के ने चलती बस से थूक दिया और वो गलती से किसी पर पड़ गया । इसपर उनका भाषण होगा,"यह कोई छोटी घटना नहीं है, आप इसकी गहराई में जाएं तो यह समाजवादी आंदोलन को धूमिल करने और कुचलने की कोशिश है। यहां बस पर बैठा छात्र पूंजीवाद का प्रतीक है और फ़ूटपाथी विद्यार्थी समाजवाद और प्रगतिशील विचरधारा का। हमारी जे एन यू प्रशासन से माँग है कि () इस मामले की जांच के लिए एक उच्च्स्तरीय कमिटी बनाई जाए, () पीड़ित छात्र को अगली दो परीक्षाओं में बिना बैठे ही पास कर दिया जाये और () कैम्पस मे थूक फेंकने वालों (खासकर बस से) पर पोटा और मकोका के तहत मुकदमा चलाया जाए। हमारी पार्टी यह भी चाहेगी की पूरे देश में इस मुद्दे एक सार्थक बहस हो। आज शाम इसी मुद्दे पर हम माही हॉस्टल मेस मे एक मीटिंग कर रहे हैं जिसमें हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष फलानाप्रसाद डिमकानादास भी आ रहे हैं। आपको ज़रूर आना है (यह वाक्य वो इस तरह से बोलेगा कि आपको लगेगा कि आपके बिना उनकी पार्टी और आंदोलन चल ही नहीं पाएंगे)" अब इतने ज़बर्दस्त तरीके से चाटे जाने के बाद भी अगर आप उनकी मीटिंग में सोच रहे हैं तो मैं आपकी "झेलू" प्रतिभा को प्रणाम करता हूं। राजनीतिक चाटों से पिंड छुड़ाना भी उतना ही मुश्किल है। अगर आपने बीच में बोल कि, "अब मैं चलूंगा। मुझे जरा नेहरू प्लेस जाना है" तो वे तपाक से बोलेंगे, "अरे याद आया, नेहरु प्लेस तो मुझे भी जाना था। चलिये साथ में चलते हैं।" अब अगर आपको सही में जाना भी होग तो भी आप प्लैन रद्द ही कर देंगे।


खखोर चाट :- ये बड़े ही घातक किस्म के चाट होते हैं। इन्हें दूर से ही देखकर लोग अपना रास्ता बदल लेते हैं। चाट समाज इन्हें अपना गौरव मानता है। एक्चुअली, ये चाटते कम हैं, खखोरते ज्यादा हैं। इन्हें "बुद्धिजीवी चाट" भी कहते हैं। इनकी पह्चान यह है कि ये गुमसुम और विचारमग्न मुद्रा में रहेंगे, इनके हाथ में अकसर किसी बड़े अंग्रेजी लेखक की मोटी सी किताब रहेगी (जिसका शीर्षक भी हम-आप जैसे मूढ़मति की समझ से बाहर होगा, किताब तो दूर की बात है)। ये जेनरली आइ ए एस या पी सी एस की तैयारी कर रहे होते हैं । इनके चाट भाषण के विषय भी आम आदमी की समझ से बाहर के होते हैं; जैसे, वर्तमान आर्थिक मंदी के संदर्भ में लियोनार्दो दा विन्सी के फ़लाने इसवी में बने चित्र का क्या महत्व है, या फ़िर बोलीविया के एक गांव मे गरीबी हटाने के तरीकों की खोज के लिए अमेरिका की ए बी सी युनिवर्सिटी में चल रहा १२० करोड़ का रिसर्च प्रोजेक्ट। अब इनको कौन बताए की अगर हमारी वैचारिक क्षमता इतनी ही तीक्ष्ण होती तो यहां बैठकर घास छील रहे होते; किसी हिन्दी चैनल में न्यूज़ एडिटर न बन जाते।......................


परसों सोमवार से एक्ज़ाम है बाकी पोस्ट तीन चार दिन में पूरी करूंगा।

जे एन यू में छात्र राजनीति


<span title="Click to correct" class="transl_class" id="0"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="577"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1154"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="0"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="0"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="0">जे</span></span></span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="1"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="578"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1155"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1">एन</span></span></span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="2"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="579"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1156"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="2"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="2"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="2">यू</span></span></span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="3"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="580"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1157"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="3"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="3"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="3">अपने</span></span></span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="4"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="581"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1158"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="4"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="4"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="4">बेहतरीन</span></span></span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="5"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="582"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1159"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="5"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="5"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="5">शैक्षिक</span></span></span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="6"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="583"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1160"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="6"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="6"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="6">माहौल</span></span></span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="7"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="584"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1161"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="7"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="7"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="7">के</span></span></span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="8"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="585"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1162"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="8"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="8"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="8">अलावा</span></span></span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="9"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="586"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1163"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="9"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="9"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="9">कुछ</span></span></span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="10"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="587"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1164"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="10"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="10"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="10">अन्य</span></span></span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="11"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="588"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1165"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="11"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="11"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="11">चीज़ों</span></span></span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="12"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="589"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1166"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="12"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="12"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="12">के</span></span></span></span></span></span>


जे एन यू अपने बेहतरीन शैक्षिक माहौल के अलावा कुछ अन्य चीज़ों के लिए भी जाना जाता है जो इसे अन्य शैक्षिक संस्थानों से अलग करता है। यहां की छात्र राजनीति भी उनमें से नेक है। आज जहां देश के अन्य विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति हिंसा, बाहुबल, धनबल और भ्रष्टाचार जैसी बुराईयों से ग्रस्त है वहीं जे एन यू की छात्र राजनीति आज भी लोकतंत्र के उच्चतम मानदन्डों को न सिर्फ़ सहेजे हुए है बल्कि दिनोंदिन उन्हें नई उंचाईयों की ओर ले जाने के लिए प्रयत्न्शील है। यहां चुनावी मुद्दों में छात्र हितों की बात तो होती ही है पर यह जानकर शायद आपको आश्चर्य हो कि यहां सिंगुर, नंदीग्राम, गोधरा और आतंकवाद के साथ-साथ इजराइल-फ़िलीस्तीन और न्यूक्लियर डील जैसे मुद्दे भी चुनावों में अहम भुमिका निभाते हैं। इन मुद्दों पर छात्र संगठनों के बीच न सिर्फ़ स्वस्थ और सार्थक बहस होती है बल्कि छात्रों की बौद्धिक सोच को समाज तक पहुंचाकर जागरुकता फ़ैलाने और एक जन-आंदोलन की शुरुआत करने की कोशिश भी की जाती है। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस प्रकार की गंभीर और मुद्दों और मूल्यों से जुड़ी राजनीति छात्रों को न सिर्फ़ एक वैचारिक धरातल प्रदान करती है बल्कि विभिन्न सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर उनके विचारों को एक नई परिपक्वता देती है। ये छात्र जब अपनी शिक्षा पूरी करके नौकरशाही, व्यवसाय, राजनीति या समाज के अन्य किसी क्षेत्र का हिस्सा बनते हैं तो निश्चित रूप से उस क्षेत्र को एक कुशल और प्रखर नेतृत्व प्रदान करते हैं। प्रकाश करात और सीताराम येचुरी जैसे नेता जे एन यू छात्र राजनीति की ही देन हैं।

जे एन यू छात्र राजनीति की एक विशेषता यह भी है कि यहां पूरी चुनाव प्रक्रिया का संचालन खुद छात्रों द्वारा किया जाता है तथा जे एन यू प्रशासन की इसमें कोई भुमिका नहीं होती। काबिले-तरीफ़ बात यह है कि यह काम इतने कुशल, निष्पक्ष और अनुशासित तरीके से संपादित किया जाता है कि भारतीय निर्वाचन आयोग के बड़े पदाधिकारी भी इसके उदाहरण देते हैं। हाल ही में लिंग्दोह कमिटी ने अपनी रिपोर्ट मे जे एन यू की चुनाव प्रक्रिया को एक आदर्श के रूप में स्वीकार किया है। यहां सभी छात्र नेता सिर्फ़ हाथ से लिखे पोस्टर्स, -४ साइज़ पर्चों और व्यक्तिगत सम्पर्क के माध्यम से प्रचार करते हैं । चुनाव के संचालन के लिए छात्रों द्वारा एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव समिति का गठन किया जाता है। स्कूल स्तर पर काउंसिलर्स तथा केन्द्रीय पैनल के लिये अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव और संयुक्त सचिव के पदों के लिए चुनाव किया होता है। चुनाव से ठीक पहले जीबीएम (आम छात्र सभा) बुलाई जाती है जिसमें सभी उम्मीदवार छात्रों के समक्ष अपने विचार और योजनाओं को रखते हैं और उनपर उठाए गए सवालों के जवाब देते हैं।

चुनावों के लिए नामांकन के बाद से कैंपस में राजनीतिक माहौल गरमा जाता है और ढाबों पर चाय के साथ गरमागरम बहसों का दौर शुरू हो जाता है। रात को डिनर के बाद रोज किसी न किसी हॉस्टल मेस मे पॉलिटिकल मीटिंग होती ही है। कुल मिलाकर १०-१५ दिनों तक उत्सव का सा माहौल रह्ता है। छात्रों के उत्साह और राजनीतिक जागरुकता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि जे एन यू मे मतदान का प्रतिशत ६०% से भी ज्यादा होता है।


फिलहाल इस साल जे एन यू एस यू चुनावों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा अस्थाई रोक लगा दी गई हैं। विशेष जानकारी के लिए पढ़ें यह पोस्ट।



शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

कालिज स्टूडैंट - काका हाथरसी

अपने छात्र दोस्तों के लिए काका हाथरसी की एक चुटीली कविता प्रस्तुत रहा हूँ.


फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸

लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट।

कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸

दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती।

कहें काका कविराय¸ बुद्धि पर डाली चादर¸

मौज कर रहे पुत्र¸ हड्डियाँ घिसते फादर।
पढ़ना–लिखना व्यर्थ हैं¸ दिन भर खेलो खेल¸

होते रहु दो साल तक फस्र्ट इयर में फेल।

फस्र्ट इयर में फेल¸ जेब में कंघा डाला¸

साइकिल ले चल दिए¸ लगा कमरे का ताला।

कहें काका कविराय¸ गेटकीपर से लड़कर¸

मुफ़्त सिनेमा देख¸ कोच पर बैठ अकड़कर।
प्रोफ़ेसर या प्रिंसिपल बोलें जब प्रतिकूल¸

लाठी लेकर तोड़ दो मेज़ और स्टूल।

मेज़ और स्टूल¸ चलाओ ऐसी हाकी¸

शीशा और किवाड़ बचे नहिं एकउ बाकी।
कहें 'काका कवि' राय¸ भयंकर तुमको देता¸

बन सकते हो इसी तरह 'बिगड़े दिल नेता।'


दिल पे मत लिया कर यार!

गुरुवार, 13 नवंबर 2008

जे एन यू - जहाँ सवाल करना सिखाया जाता है।

<span title="Click to correct" class="transl_class" id="0"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="0"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="0"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="0">जे</span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="1"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="1">एन</span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="2"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="2"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="2"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="2">यू</span></span></span></span> - <span title="Click to correct" class="transl_class" id="3"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="3"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="3"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="3">जहाँ</span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="4"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="4"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="4"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="4">सवाल</span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="5"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="5"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="5"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="5">करना</span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="6"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="6"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="6"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="6">सिखाया</span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="7"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="7"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="7"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="7">जाता</span></span></span></span> <span title="Click to correct" class="transl_class" id="8"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="8"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="8"><span title="Click to correct" class="transl_class" id="8">है।</span></span></span></span>
जे एन यू के बारे में एक कहावत है कि "यहाँ प्रश्नों का उत्तर देना नहीं सिखाया जाता बल्कि उत्तरों पर प्रश्न उठाना सिखाया जाता है"। अपनी इसी प्रश्न पूछने की आदत और जिज्ञासु प्रवृति के कारण जे एन यू के छात्र अन्य विश्वविद्यालयों के छात्रों से अलग पहचाने जाते हैं। इस प्रश्न पूछने के कल्चर का रहस्य यहाँ की अद्वितीय गुरु-शिष्य परंपरा में छुपा हुआ है।a


जे एन यू शायद अकेला ऐस विश्वविद्यालय है जहाँ आपको प्रोफ़ेसर्स छात्रों के साथ चाय पीते और पकौड़े खाते दिख जायेंगे; जहाँ सभी छात्रों के पास सभी शिक्षकों के फ़ोन नम्बर्स और पते होते हैं और अपनी किसी भी समस्या के लिए वे इनका इस्तेमाल भी कर सकते हैं; जहाँ हर शिक्षक अपने सभी छात्रों को उनके नाम से जानता है; जहां शिक्षक विश्वविद्यालय परीक्षा की तारीख इसलिए बढ़ा देते हैं कि किसी छात्र के पिताजी अस्पताल में भर्ती हैं और वह परीक्षा में उस दिन शामिल नहीं हो सकता।


यहाँ शिक्षक छात्रों के अभिभावक भी होते हैं और दोस्त भी। शिक्षकों और छात्रों के बीच इस प्रगाढ़ संबंध का एक कारण जे एन यू का उच्च शिक्षक-छात्र अनुपात (:१०) भी है। जे एन यू के प्रोफ़ेसर्स अपने अपने विषयों के ख्यातिप्राप्त विद्वान होते हैं पर कक्षा में उनको पढ़ाते देखकर आपको लगेगा कि यहां किसी बड़े यूनिवर्सिटी प्रोफ़ेसर का लेक्चर नहीं चल रहा बल्कि छात्र आपस में बातचीत कर रहे हैं और कोइ शिक्षक बस उनकी बातचीत को नियंत्रित और दिशानिर्देशित कर रहा है।

शिक्षक यहां अपने विचारों को छात्रों पर थोपते नहीं बल्कि उनके विचारों को उद्वेलित करते हैं। वे छात्रों की सोच को एक वैचारिक धरातल देने की कोशिश करते हैं। अन्य विश्वविद्यालयों कि तरह जे एन यू में कक्षाओं और परीक्षाओं की तारीख और समय ब्रह्मवाक्य की तरह अचल अटल नहीं होते। यह बहुत कुछ शिक्षकों और छात्रों की आपसी समझ और सुविधा के अनुसार परिवर्तनीय होता है। यहां अपको रात के दस बजे खुले आसमान के नीचे क्लास लगाते शिक्षक और छात्र भी दिख जायेंगे।

छात्र न सिर्फ़ कैरियर, समाज़ और राजनीति जैसे विषयों पर शिक्षकों से खुलकर बात करते हैं बल्कि अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को भी उनके साथ शेयर करते हैं और शिक्षकगण यथा-सम्भव उन्हें दूर करने का प्रयास करते हैं।

जे एन यू की गुरु-शिष्य परंपरा सचमुच अद्वितीय और गौरवशाली है। अगर अन्य विश्वविद्यालय भी जे एन यू के मॉडल का अनुकरण करें तो न सिर्फ़ शिक्षा के गिरते स्तर को सुधारा जा सकता है बल्कि नैतिक मूल्यों और आत्मविश्वास से लबरेज़ छात्रों की एक पीढ़ी तैयार की जा सकती है।

प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्म का संगम - राजगीर


बिहार के नालंदा ज़िले में स्थित प्राचीन मगध साम्राज्य की राजधानी राजगृह का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है. वसुमतिपुर, वृहद्रथपुर, गिरिब्रज और कुशग्रपुर के नाम से भी प्रसिद्ध रहे राजगृह को आजकल राजगीर के नाम से जाना जाता है. पौराणिक साहित्य के अनुसार राजगीर बह्मा की पवित्र यज्ञ भूमि, संस्कृति और वैभव का केन्द्र तथा जैन तीर्थंकर महावीर और भगवान बुद्ध की साधनाभूमि रहा है. इसका ज़िक्र ऋगवेद, अथर्ववेद, तैत्तिरीय पुराण, वायु पुराण, महाभारत, बाल्मीकि रामायण आदि में आता है. जैनग्रंथ विविध तीर्थकल्प के अनुसार राजगीर जरासंध, श्रेणिक, बिम्बसार, कनिक आदि प्रसिद्ध शासकों का निवास स्थान था. जरासंध ने यहीं श्रीकृष्ण को हराकर मथुरा से द्वारिका जाने को विवश किया था.

पटना से ६० किमी उत्तर में पहाड़ियों और घने जंगलों के बीच बसा राजगीर सिर्फ़ एक प्रसिद्ध धार्मिक तीर्थस्थल है बल्कि एक खुबसूरत हेल्थ रेसॉर्ट के रूप में भी लोकप्रिय है। यहां हिन्दु, जैन और बौद्ध तीनों धर्मों के धार्मिक स्थल हैं। खासकर बौद्ध धर्म से इसका बहुत प्राचीन संबंध है। बुद्ध सिर्फ़ कई वर्षों तक यहां ठहरे थे बल्कि कई महत्वपूर्ण उपदेश भी यहां की धरती पर दिये थे। बुद्ध के उपदेशों को यहीं लिपिबद्ध किया गया गया था और पहली बौद्ध संगीति भी यहीं हुई थी।

दर्शनीय स्थल

गृद्धकूट पर्वत - इस पर्वत पर बुद्ध ने कई महत्वपूर्ण उपदेश दिये थे। जापान के बुद्ध संघ ने इसकी चोटी पर एक विशाल "शान्ति स्तूप" का निर्माण करवाया है जो आजकल पर्यटकों के आकर्षण का मूख्य केन्द्र है। स्तूप के चारों कोणों पर बुद्ध की चार प्रतिमाएं स्थपित हैं। स्तूप तक पहुंचने के लिए पहले पैदल चढ़ाई करनी पड़ एक "रज्जू मार्ग" भी बनाया गया है जो यात्रा को और भी रोमांचक बना देता है।


वेणु वन - बाँसों के इस रमणीक वन में बसे "वेणुवन विहार" को बिम्बिसार ने भगवान बुद्ध के रहने के लिए बनवाया था।

गर्म जल के झरने - वैभव पर्वत की सीढ़ियों पर मंदिरों के बीच गर्म जल के कई झरने (सप्तधाराएं) हैं जहां सप्तकर्णी गुफाओं से जल आता है। इन झरनों के पानी में कई चिकित्सकीय गुण होने के प्रमाण मिले हैं। पुरुषों और महिलाओं के नहाने के लिए अलग अलग कुन्ड बनाए गये हैं। इनमें "ब्रह्मकुन्ड" का पानी सबसे गर्म (४५ डिग्री से.) होता है।

स्वर्ण भंडार - यह स्थान प्राचीन काल में जरासंध का सोने का खजाना था। कहा जाता है कि अब भी इस पर्वत की गुफ़ा के अन्दर अतुल मात्रा में सोना छुपा है और पत्थर के दरवाजे पर उसे खोलने का रहस्य भी किसी गुप्त भाषा में खुदा हुआ है।

जैन मंदिर - पहाड़ों की कंदराओं के बीच बने २६ जैन मंदिरों को अप दूर से देख सकते हैं पर वहां पहुंचने का मार्ग अत्यंत दुर्गम है। लेकिन अगर कोई प्रशिक्षित गाइड साथ में हो तो यह एक यादगार और बहुत रोमांचक यात्रा साबित हो सकती है।

राजगीर का मलमास मेला


राजगीर की पहचान मेलों के नगर के रूप में भी है. इनमें सबसे प्रसिद्ध मकर और मलमास मेले के हैं. शास्त्रों में मलमास तेरहवें मास के रूप में वर्णित है. सनातन मत की ज्योतिषीय गणना के अनुसार तीन वर्ष में एक वर्ष 366 दिन का होता है. धार्मिक मान्यता है कि इस अतिरिक्त एक महीने को मलमास या अतिरिक्त मास कहा जाता है.

ऐतरेय बह्मण के अनुसार यह मास अपवित्र माना गया है और अग्नि पुराण के अनुसार इस अवधि में मूर्ति पूजाप्रतिष्ठा, यज्ञदान, व्रत, वेदपाठ, उपनयन, नामकरण आदि वर्जित है. लेकिन इस अवधि में राजगीर सर्वाधिक पवित्र माना जाता है. अग्नि पुराण एवं वायु पुराण आदि के अनुसार इस मलमास अवधि में सभी देवी देवता यहां आकर वास करते हैं. राजगीर के मुख्य ब्रह्मकुंड के बारे में पौराणिक मान्यता है कि इसे ब्रह्माजी ने प्रकट किया था और मलमास में इस कुंड में स्नान का विशेष फल है.

मलमास मेले का ग्रामीण स्वरूप

राजगीर के मलमास मेले को नालंदा ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों में आयोजित मेलों मे सबसे बड़ा कहा जा सकता है। इस मेले का लोग पूरे साल इंतजार करते हैं। कुछ साल पहले तक यह मेला ठेठ देहाती हुआ करता था पर अब मेले में तीर्थयात्रियों के मनोरंजन के लिए तरह-तरह के झूले, सर्कस, आदि भी लगे होते हैं. युवाओं की सबसे ज्यादा भीड़ थियेटर में होती है जहां नर्तकियाँ अपनी मनमोहक अदाओं से दर्शकों का मनोरंजन करती हैं।

बुधवार, 12 नवंबर 2008

मेरी मातृभाषा : मागधी (मगही)

मेरी मातृभाषा मगही है। मगहीशब्द का विकास मागधीसे हुआ है (मागधी > मागही >मगही) । मगही भारत में कुल १७,४४९,४४६ लोगों द्वारा बोली जाती है। प्राचीन काल में यह मगध साम्राज्य की भाषा थी और भगवान बुद्ध अपने उपदेश इसके प्राचीन रुप "मागधी प्राकृत" में देते थे। मगही का मैथिली और भोजपुरी भाषाओं से भी गहरा संबंध है जिन्हें सामूहिक रूप से "बिहारी भाषाएं कहा जाता है जो इन्डो-आर्यन भाषाएं हैं। मैथिली की पारंपरिक लिपि "कैथी" है पर अब यह समन्यतः देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती है। मगही बिहार के मुख्यतः पटना, गया, जहानाबाद, और औरंगाबाद जिले में बोली जाती है। इसके अलावा यह पलामू, गिरिडीह, हज़ारीबाग, मुंगेर, और भागलपुर, झारखंड के कुछ जिलों तथा पश्चिम बंगाल के मालदा में भी बोला जाता है।

आधुनिक काल में ही मगही के अनेक रुप दृष्टिगत होते हैं। मगही भाषा का क्षेत्र विस्तार अति व्यापक है; अतः स्थान भेद के साथ-साथ इसके रूप बदल जाते हैं । प्रत्येक बोली या भाषा कुछ दूरी पर बदल जाती है। मगही भाषा के निम्नलिखित भेदों का संकेत भाषाविद कृष्णदेव प्रसाद ने किया है :-

आदर्श- मगही

यह मुख्यत: गया जिले में बोली जाती है।

शुद्ध -मगही

इस प्रकार की मगही राजगृह से लेकर बिहारशरीफ के उत्तर चार कोस बयना स्टेशन (रेलवे) पटना जिले के अन्य क्षेत्रों में बोली जाती है

टलहा -मगही

टलहा मगही मुख्य रुप से मोकामा, बड़हिया, बाढ़ अनुमण्डल के इस पार के कुछ पूर्वी भाग और लक्खीसराय थाना के कुछ उत्तरी भाग गिद्धौर और पूर्व में फतुहां में बोली जाती है।

सोनतरिया मगही

सोन नदी के तटवर्ती भू-भाग में पट्ना और गया जिले में सोनतरिया मगही बोली जाती है।

जंगली मगही

राजगृह, गया, झारखण्ड प्रदेश के छोटानागपु (उत्तरी छोटानागपुर मूलत:) और विशेषतौर से हजारीबाग के वन्य या जंगली क्षेत्रों में जंगली मगही बोली जाती है।

भाषाविद ग्रियर्सन महोदय ने मगही के एक अन्य रूप पूर्वी मगहीका उल्लेख किया है। ग्रियर्सन महोदय के अनुसार पूर्वी मगही का क्षेत्र हजारीबाग, मानभूम, दक्षिणभूम, दक्षिणपूर्व रांची तथा उड़ीसा में स्थित खारसावां एवं मयुरभंज के कुछ भाग तथा छत्तीसगढ़ के वामड़ा में है। मालदा जिले के दक्षिण में भी ग्रियर्सन पूर्वी-मगही की स्थिति स्वीकार करते हैं।

मगही भाषा के प्राचीन साहित्येतिहास का प्रारम्भ आठवीं शताब्दी के सिद्ध कवियों की रचनाओं से होता है। सरहपा की रचनाओं का सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक संस्करण दोहाकोष के नाम से प्रकाशित है जिसके सम्पादक महापणिडत राहुल सांकृत्यायन हैं। सिद्धों की परम्परा में मध्यकाल के अनेक संतकवियों ने मगधी भाषा में रचनायें की। इन कवियों में बाबा करमदास, बाबा सोहंगदास, बाबा हेमनाथ दास आदि अनेक कवियों के नाम उल्लेख हैं।


आधुनिक काल में लोकभाषा और लोकसाहित्य सम्बन्धी अध्ययन के परिणामस्वरुप मगही के प्राचीन परम्परागत लोकगीतों, लोककथाओं, लोकनाट्यों, मुहावरों, कहावतों तथा पहेलियों का संग्रह कार्य बड़ी तीव्रता के साथ किया जा रहा है। साथ ही मगही भाषा में युगोचित साहित्य, अर्थात् कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, एकांकी, ललित निबन्ध आदि की रचनाएं, पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन एवं भाषा और साहित्य पर अनुसंधान भी हो रहे हैं।


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मंगलवार, 11 नवंबर 2008

बिहार का महापर्व छठ



छठ बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश मे मनाया जाने वाला एक प्राचीन पर्व है। बिहार में तो इसे सबसे बड़े त्योहार के रूप में मनाया जाता है। माना जाता है कि छठ या सूर्य पूजा महाभारत काल से की जाती रही है। ऐसा माना जाता है कि इस पर्व की शुरुआत अंग देश (आधुनिक भागलपुर) के राजा कर्ण ने की थी। छठ सूर्य की उपासना का पर्व है। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर ( तालाब ) के किनारे यह पूजा की जाती है। छठ वर्ष में दो बार मनाया जाता है: एक बार गर्मियों में, जिसे "चैती छठ" कहते हैं और एक बार दीपावली के करीब एक हफ़्ते बाद जिसे "कार्तिक छठ" कहते है। यह चैत और कार्तिक की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। "कार्तिक छठ" अधिक लोकप्रिय है। इसके दो कारण हैं- पहला, सर्दियों में वैसे भी उत्तर भारत में त्योहारों का माहौल रहता है और दूसरे, छठ में पर्व करने वालों को ३६ घंटे से भी अधिक लंबा उपवास (जिसमें पानी भी नहीं पिया जाता) रखना पड़ता है, जो कि गर्मियों कि तुलना में सर्दियों में आसान है।

चार दिवसीय इस महापर्व की शुरूआत दिवाली के चौथे दिन से शुरू हो जाती है। व्रत की शुरूआत नहाय-खाय से होती है। पूजन सामग्री किसी कारण से जूठी हो, इस कारण पूजन सामग्री को रखने के लिए घरों की सफाई की जाती है। अगर पूजन सामग्री जूठी या अपवित्र हो जाए तो पर्व खंडित हो जाता है और इसे अशुभ माना जाता है।


नहाय-खाय के दिन से ही व्रतधारी जमीन पर सोते हैं। घर में सभी के लिए सात्विक भोजन बनता है। दूसरे दिन पूरे दिन उपवास कर चंद्रमा निकलने के बाद व्रतधारी गुड़ की खीर (रसिया) का प्रसाद खाते हैं। इसके साथ कद्दू (घीया) की सब्जी विशेषतौर पर खायी जाती है। स्थानीय बोलचाल में इसे कद्दू-भात कहते हैं। इस दिन आस-पड़ोस और रिश्तेदारों को भी विशेष तौर पर कद्दू-भात खिलाया जाता है।

कद्दू-भात के साथ ही व्रतधारियों का 36 घंटे का अखंड उपवास शुरू हो जाता है। इस दौरान व्रतधारी अन्न और जल ग्रहण नहीं करते हैं। तीसरे दिन व्रतधारी अस्ताचलगामी सूर्य को नदी तालाब में खड़े होकर अर्ध्य देते हैं। चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को कंद-मूल गाय के दूध से अर्ध्य देने के साथ ही यह व्रत सम्पन्न होता है। व्रतधारी व्रत संपन्न होने के बाद सबसे पहले प्रसाद स्वरूप ठेकुआ खाते हैं और उसके बाद अन्न ग्रहण करते हैं।

सूर्य उपासना का महापर्व छठ मुख्य रूप से पति और पुत्र की लंबी उम्र के साथ-साथ सुख- समृद्धि के लिए किया जाता है। इस पर्व में सूर्य की आराधना की जाती है। छठ पूजा के नियम इतने कड़े हैं कि इस व्रत को करने से पहले तन-मन से महिलाओं को शुद्ध होना पड़ता है और घर की तमाम चीजों की साफ-सफाई की जाती है। जो लोग छठ पूजा की सामग्री खरीदने में असमर्थ होते हैं वे दूसरों से दान लेकर पूजन सामग्री खरीदते हैं।

पूजन सामग्री

गन्ना, ठेकुआ (मीठा पकवान), नारियल, गागल (टाभ), सरीफा, पानी वाला सिंघाड़ा, पत्ते वाला अदरक, आ॓ल, केला, सेब, संतरा, सुथनी, मूली, पत्ता वाला हल्दी, अनानास, पान का पत्ता, सुपाड़ी, अलता, साठी के चावल चिड़वा, कोसी, दीया, ढकनी, सूप, दौउरा, चांदनी (नया कपड़ा)

बिहार के लोग जहां भी गये अपने साथ छठ की परंपरा को भी ले गए। विभिन्न प्रदेशों और यहाँ तक की दूसरे देशों में रहने वाले बिहारी भी हर्षोल्लास से इस पर्व को मनाते हैं जिससे यह पर्व धीरे-धीरे दूसरे राज्यों में भी लोकप्रिय हो रहा है।