सोमवार, 24 नवंबर 2008
नकलची विद्यार्थियों के लिए खुशखबरी
उन विद्यार्थियों कि मदद के लिए या यों कहें कि उनके आन्दोलन को अपना "समर्थन" देने के लिए एक बहुत हे रोचक लेख लिख रहा हूँ। जल्द ही आपके सामने आयेगा।
तब तक इंतजार का आनंद लीजिये
शनिवार, 15 नवंबर 2008
मुझे इन चाटों से बचाओ - जे एन यू
सबसे पहले "चाट" शब्द पर थोड़ा प्रकाश डालना या यूं कहें कि इसका स्पष्टीकरण देना ज़रूरी है। वर्ना कुछ लोग इसे अंग्रेजी वाले "चैट" का हिन्दी रुपन्तरण अथवा चाट-पकौड़े वाली चाट समझने की भूल भी कर सकते हैं। अब हर किसी को अपने जितना अकलमंद तो नहीं समझ सकते न! हां तो, यहां चाट शब्द "चाटना" क्रिया से बना है; लेकिन वो "लिक" वाला चाटना नहीं। इसका सीधा मतलब है किसी को जबर्दस्ती भाषण (बकवास) पिला पिला कर बोर करना। यह चाट प्रजाति हर जगह पाई जाती है; चाहे गली-मुहल्ला हो, ऑफ़िस हो या फ़िर स्कूल कॉलेज। इन्हें यह भ्रम होता है कि ये अरस्तू और सुकरात से भी बड़े विचारक और विवेकानन्द से भी बड़े वक्ता हैं। ये दुनिया के अज्ञानियों को ज्ञान बांटना अपना कर्तव्य या यों कहें कि अधिकार समझते हैं। इन्हें लगता है कि इनके वचनामृत सुनकर लोग लोग धन्य हो जाएंगे।
हमारे जे एन यू में चाटों की एक दीर्घकालीन परंपरा रही है। यहां पाये जाने वाले चाटों की मुख्य किस्में इस प्रकार हैं:-
हल्का चाट :- ये आमतौर पर नये या फ़िर चाट विद्या में मंदबुद्धि चाट होते हैं। ये चाटते कम हैं और बदनाम ज्यादा होते हैं। ये अगर रास्ते में मिल जायें तो आठ-दस फ़ालतू के सवाल चेंप देंगे। सवालों की प्रकृति बड़ी निर्दोष किस्म की होगी; जैसे "हॉस्टल से आ रहे हैं क्या?" (और क्या किताबें लेके काशी से आऊंगा), "अभी आ रहा था तो रास्ते में आपके क्लास का एक लड़का दिखा था" (तो मैं क्या करूं) इत्यादि। आपको चिढ़ बहुत आयेगी मगर जवाब तो देना ही पड़ेगा। इन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि आप क्लास के लिए लेट हो रहे हैं या आपका एक्जाम छूट रहा है। हां, एक बात और, ये दिन में जितनी बार आपसे मिलेंगे उतनी बार हाथ मिलाएंगे और "कैसे हैं" इस मुद्रा में पुछेंगे जैसे वर्षों के बिछुड़े भाई मिलें हों।
कड़ा चाट :- ऐसे चाटों का मानना होता है कि अवसर का इंतजार मत करो बल्कि उसे तलाशो। इनके अनुसार तसल्ली से बातचीत तो कमरे पर ही हो सकती है, इसलिए ये सीधे आपके कमरे पर ही पधारते हैं। पधारने का समय ऐसा अनुकूल होता है कि आप कोई बहाना बनाकर छूट भी नहीं सकते; जैसे, जब आप लंच के बाद सोने के लिए बिस्तर पर बस लेटने ही वाले हों या फ़िर छुट्टी का दिन हो और आप कमरे में पायजामा और बनियान में आराम से अखबार वगैरह पढ़ रहे हों। ये आते ही पहला वाक्य बोलेंगे "अरे, आपको फ़ालतू डिस्टर्ब किया। दर असल कमरे में बैठकर बोर हो रहा था। अब हॉस्टल में दो-चार बातें करने लायक आदमी ही कितने हैं (आप जैसे बेवकूफ़ को छोड़कर)।" और आप फ़ॉर्मलिटी निभाते हुए कहेंगे "अरे नहीं, अच्छे आये; मैं भी बोर ही हो रहा था"। इसके बाद उनका चाट भाषण शुरू होगा। बिषय उनके ही महान जीवन से जुड़े होंगे; जैसे, कैसे उनके फलाना शिक्षक के एक्जाम में सारे प्रश्न सही करने के बाद भी (*गाली*) शिक्षक ने फ़ेल कर दिया या फ़िर कैसे गांव मे उन्होंने दारोगा पर गोली चला दी इत्यादि। आप ये सोच कर अनमने ढंग से सिर्फ़ "हाँ", "हूँ" करते रहेंगे कि मेरा ज्यादा इंटरेस्ट नहीं देखकर ये जल्दी चला जायेगा। लेकिन वो चाट ही क्या जो इतनी जल्दी हार मान ले। आखिरकार आप ऊब कर कहेंगे,"चलिये, गंगा ढाबे पर चाय पीकर आते हैं"। ये सोचकर कि शायद ये महाशय चाय पीकर उधर से ही अपने कमरे में चले जायेंगे। इसी सुखद कल्पना में चाय और पकौड़े के पैसे भी आप ही दे देंगे। लेकिन आप यह देखकर सर पीट लेंगे कि श्रीमान आपके साथ-साथ ही वापस आपके कमरे का रुख करते हैं।
राजनीतिक चाट :- ये किसी छात्र संगठन से जुड़े होते हैं । इनको आप हुलिये से भी पह्चान सकते हैं: बढी हुई दाढ़ी, कंधे पर झोला और पैरों में हवाई चप्पल। ऐसा लगेगा सारी दुनिया को बदलने का जिम्मेदारी इन्ही के कंधों पर है। ये अपको कैंपस में यहां-वहां भटकते हुए, ढाबों पर (शिकार की तलाश में) अथवा किसी धरना, प्रदर्शन या भूख हड़ताल में दिख जाएंगे। इनका भाषण रेडिमेड होता है और मौका देखते ही न्यूक्लियर डील, आतंकवाद, या बम विस्फ़ोटों के ऊपर आधे पौन घंटे का भाषण पेल देंगे। ये छोटी से छोटी बात को भी इतने जोरदार और उत्तेजक तरीके से बोलेंगे कि अपको लगेगा कि शायद तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ गया है। उदाहरण के लिए किसी लड़के ने चलती बस से थूक दिया और वो गलती से किसी पर पड़ गया । इसपर उनका भाषण होगा,"यह कोई छोटी घटना नहीं है, आप इसकी गहराई में जाएं तो यह समाजवादी आंदोलन को धूमिल करने और कुचलने की कोशिश है। यहां बस पर बैठा छात्र पूंजीवाद का प्रतीक है और फ़ूटपाथी विद्यार्थी समाजवाद और प्रगतिशील विचरधारा का। हमारी जे एन यू प्रशासन से माँग है कि (क) इस मामले की जांच के लिए एक उच्च्स्तरीय कमिटी बनाई जाए, (ख) पीड़ित छात्र को अगली दो परीक्षाओं में बिना बैठे ही पास कर दिया जाये और (ग) कैम्पस मे थूक फेंकने वालों (खासकर बस से) पर पोटा और मकोका के तहत मुकदमा चलाया जाए। हमारी पार्टी यह भी चाहेगी की पूरे देश में इस मुद्दे एक सार्थक बहस हो। आज शाम इसी मुद्दे पर हम माही हॉस्टल मेस मे एक मीटिंग कर रहे हैं जिसमें हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष फलानाप्रसाद डिमकानादास भी आ रहे हैं। आपको ज़रूर आना है (यह वाक्य वो इस तरह से बोलेगा कि आपको लगेगा कि आपके बिना उनकी पार्टी और आंदोलन चल ही नहीं पाएंगे)।" अब इतने ज़बर्दस्त तरीके से चाटे जाने के बाद भी अगर आप उनकी मीटिंग में सोच रहे हैं तो मैं आपकी "झेलू" प्रतिभा को प्रणाम करता हूं। राजनीतिक चाटों से पिंड छुड़ाना भी उतना ही मुश्किल है। अगर आपने बीच में बोल कि, "अब मैं चलूंगा। मुझे जरा नेहरू प्लेस जाना है" तो वे तपाक से बोलेंगे, "अरे याद आया, नेहरु प्लेस तो मुझे भी जाना था। चलिये साथ में चलते हैं।" अब अगर आपको सही में जाना भी होग तो भी आप प्लैन रद्द ही कर देंगे।
परसों सोमवार से एक्ज़ाम है बाकी पोस्ट तीन चार दिन में पूरी करूंगा।
जे एन यू में छात्र राजनीति
जे एन यू अपने बेहतरीन शैक्षिक माहौल के अलावा कुछ अन्य चीज़ों के लिए भी जाना जाता है जो इसे अन्य शैक्षिक संस्थानों से अलग करता है। यहां की छात्र राजनीति भी उनमें से नेक है। आज जहां देश के अन्य विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति हिंसा, बाहुबल, धनबल और भ्रष्टाचार जैसी बुराईयों से ग्रस्त है वहीं जे एन यू की छात्र राजनीति आज भी लोकतंत्र के उच्चतम मानदन्डों को न सिर्फ़ सहेजे हुए है बल्कि दिनोंदिन उन्हें नई उंचाईयों की ओर ले जाने के लिए प्रयत्न्शील है। यहां चुनावी मुद्दों में छात्र हितों की बात तो होती ही है पर यह जानकर शायद आपको आश्चर्य हो कि यहां सिंगुर, नंदीग्राम, गोधरा और आतंकवाद के साथ-साथ इजराइल-फ़िलीस्तीन और न्यूक्लियर डील जैसे मुद्दे भी चुनावों में अहम भुमिका निभाते हैं। इन मुद्दों पर छात्र संगठनों के बीच न सिर्फ़ स्वस्थ और सार्थक बहस होती है बल्कि छात्रों की बौद्धिक सोच को समाज तक पहुंचाकर जागरुकता फ़ैलाने और एक जन-आंदोलन की शुरुआत करने की कोशिश भी की जाती है। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस प्रकार की गंभीर और मुद्दों और मूल्यों से जुड़ी राजनीति छात्रों को न सिर्फ़ एक वैचारिक धरातल प्रदान करती है बल्कि विभिन्न सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर उनके विचारों को एक नई परिपक्वता देती है। ये छात्र जब अपनी शिक्षा पूरी करके नौकरशाही, व्यवसाय, राजनीति या समाज के अन्य किसी क्षेत्र का हिस्सा बनते हैं तो निश्चित रूप से उस क्षेत्र को एक कुशल और प्रखर नेतृत्व प्रदान करते हैं। प्रकाश करात और सीताराम येचुरी जैसे नेता जे एन यू छात्र राजनीति की ही देन हैं।
चुनावों के लिए नामांकन के बाद से कैंपस में राजनीतिक माहौल गरमा जाता है और ढाबों पर चाय के साथ गरमागरम बहसों का दौर शुरू हो जाता है। रात को डिनर के बाद रोज किसी न किसी हॉस्टल मेस मे पॉलिटिकल मीटिंग होती ही है। कुल मिलाकर १०-१५ दिनों तक उत्सव का सा माहौल रह्ता है। छात्रों के उत्साह और राजनीतिक जागरुकता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि जे एन यू मे मतदान का प्रतिशत ६०% से भी ज्यादा होता है।
शुक्रवार, 14 नवंबर 2008
कालिज स्टूडैंट - काका हाथरसी
फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸
लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट।
कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸
दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती।
कहें काका कविराय¸ बुद्धि पर डाली चादर¸
मौज कर रहे पुत्र¸ हड्डियाँ घिसते फादर।
पढ़ना–लिखना व्यर्थ हैं¸ दिन भर खेलो खेल¸
होते रहु दो साल तक फस्र्ट इयर में फेल।
फस्र्ट इयर में फेल¸ जेब में कंघा डाला¸
साइकिल ले चल दिए¸ लगा कमरे का ताला।
कहें काका कविराय¸ गेटकीपर से लड़कर¸
मुफ़्त सिनेमा देख¸ कोच पर बैठ अकड़कर।
प्रोफ़ेसर या प्रिंसिपल बोलें जब प्रतिकूल¸
लाठी लेकर तोड़ दो मेज़ और स्टूल।
मेज़ और स्टूल¸ चलाओ ऐसी हाकी¸
शीशा और किवाड़ बचे नहिं एकउ बाकी।
कहें 'काका कवि' राय¸ भयंकर तुमको देता¸
बन सकते हो इसी तरह 'बिगड़े दिल नेता।'
दिल पे मत लिया कर यार!
गुरुवार, 13 नवंबर 2008
जे एन यू - जहाँ सवाल करना सिखाया जाता है।
छात्र न सिर्फ़ कैरियर, समाज़ और राजनीति जैसे विषयों पर शिक्षकों से खुलकर बात करते हैं बल्कि अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को भी उनके साथ शेयर करते हैं और शिक्षकगण यथा-सम्भव उन्हें दूर करने का प्रयास करते हैं।
प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्म का संगम - राजगीर

दर्शनीय स्थल

गृद्धकूट पर्वत - इस पर्वत पर बुद्ध ने कई महत्वपूर्ण उपदेश दिये थे। जापान के बुद्ध संघ ने इसकी चोटी पर एक विशाल "शान्ति स्तूप" का निर्माण करवाया है जो आजकल पर्यटकों के आकर्षण का मूख्य केन्द्र है। स्तूप के चारों कोणों पर बुद्ध की चार प्रतिमाएं स्थपित हैं। स्तूप तक पहुंचने के लिए पहले पैदल चढ़ाई करनी पड़ एक "रज्जू मार्ग" भी बनाया गया है जो यात्रा को और भी रोमांचक बना देता है।

वेणु वन - बाँसों के इस रमणीक वन में बसे "वेणुवन विहार" को बिम्बिसार ने भगवान बुद्ध के रहने के लिए बनवाया था।


राजगीर का मलमास मेला
मलमास मेले का ग्रामीण स्वरूप
बुधवार, 12 नवंबर 2008
मेरी मातृभाषा : मागधी (मगही)
आधुनिक काल में ही मगही के अनेक रुप दृष्टिगत होते हैं। मगही भाषा का क्षेत्र विस्तार अति व्यापक है; अतः स्थान भेद के साथ-साथ इसके रूप बदल जाते हैं । प्रत्येक बोली या भाषा कुछ दूरी पर बदल जाती है। मगही भाषा के निम्नलिखित भेदों का संकेत भाषाविद कृष्णदेव प्रसाद ने किया है :-
आदर्श- मगही
यह मुख्यत: गया जिले में बोली जाती है।
शुद्ध -मगही
इस प्रकार की मगही राजगृह से लेकर बिहारशरीफ के उत्तर चार कोस बयना स्टेशन (रेलवे) पटना जिले के अन्य क्षेत्रों में बोली जाती है
टलहा -मगही
टलहा मगही मुख्य रुप से मोकामा, बड़हिया, बाढ़ अनुमण्डल के इस पार के कुछ पूर्वी भाग और लक्खीसराय थाना के कुछ उत्तरी भाग गिद्धौर और पूर्व में फतुहां में बोली जाती है।
सोनतरिया मगही
सोन नदी के तटवर्ती भू-भाग में पट्ना और गया जिले में सोनतरिया मगही बोली जाती है।
जंगली मगही
राजगृह, गया, झारखण्ड प्रदेश के छोटानागपु (उत्तरी छोटानागपुर मूलत:) और विशेषतौर से हजारीबाग के वन्य या जंगली क्षेत्रों में जंगली मगही बोली जाती है।
भाषाविद ग्रियर्सन महोदय ने मगही के एक अन्य रूप ’पूर्वी मगही’ का उल्लेख किया है। ग्रियर्सन महोदय के अनुसार पूर्वी मगही का क्षेत्र हजारीबाग, मानभूम, दक्षिणभूम, दक्षिणपूर्व रांची तथा उड़ीसा में स्थित खारसावां एवं मयुरभंज के कुछ भाग तथा छत्तीसगढ़ के वामड़ा में है। मालदा जिले के दक्षिण में भी ग्रियर्सन पूर्वी-मगही की स्थिति स्वीकार करते हैं।
मगही भाषा के प्राचीन साहित्येतिहास का प्रारम्भ आठवीं शताब्दी के सिद्ध कवियों की रचनाओं से होता है। सरहपा की रचनाओं का सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक संस्करण दोहाकोष के नाम से प्रकाशित है जिसके सम्पादक महापणिडत राहुल सांकृत्यायन हैं। सिद्धों की परम्परा में मध्यकाल के अनेक संतकवियों ने मगधी भाषा में रचनायें की। इन कवियों में बाबा करमदास, बाबा सोहंगदास, बाबा हेमनाथ दास आदि अनेक कवियों के नाम उल्लेख हैं।
आधुनिक काल में लोकभाषा और लोकसाहित्य सम्बन्धी अध्ययन के परिणामस्वरुप मगही के प्राचीन परम्परागत लोकगीतों, लोककथाओं, लोकनाट्यों, मुहावरों, कहावतों तथा पहेलियों का संग्रह कार्य बड़ी तीव्रता के साथ किया जा रहा है। साथ ही मगही भाषा में युगोचित साहित्य, अर्थात् कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, एकांकी, ललित निबन्ध आदि की रचनाएं, पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन एवं भाषा और साहित्य पर अनुसंधान भी हो रहे हैं।
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मंगलवार, 11 नवंबर 2008
बिहार का महापर्व छठ

चार दिवसीय इस महापर्व की शुरूआत दिवाली के चौथे दिन से शुरू हो जाती है। व्रत की शुरूआत नहाय-खाय से होती है। पूजन सामग्री किसी कारण से जूठी न हो, इस कारण पूजन सामग्री को रखने के लिए घरों की सफाई की जाती है। अगर पूजन सामग्री जूठी या अपवित्र हो जाए तो पर्व खंडित हो जाता है और इसे अशुभ माना जाता है।

नहाय-खाय के दिन से ही व्रतधारी जमीन पर सोते हैं। घर में सभी के लिए सात्विक भोजन बनता है। दूसरे दिन पूरे दिन उपवास कर चंद्रमा निकलने के बाद व्रतधारी गुड़ की खीर (रसिया) का प्रसाद खाते हैं। इसके साथ कद्दू (घीया) की सब्जी विशेषतौर पर खायी जाती है। स्थानीय बोलचाल में इसे कद्दू-भात कहते हैं। इस दिन आस-पड़ोस और रिश्तेदारों को भी विशेष तौर पर कद्दू-भात खिलाया जाता है।
कद्दू-भात के साथ ही व्रतधारियों का 36 घंटे का अखंड उपवास शुरू हो जाता है। इस दौरान व्रतधारी अन्न और जल ग्रहण नहीं करते हैं। तीसरे दिन व्रतधारी अस्ताचलगामी सूर्य को नदी व तालाब में खड़े होकर अर्ध्य देते हैं। चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को कंद-मूल व गाय के दूध से अर्ध्य देने के साथ ही यह व्रत सम्पन्न होता है। व्रतधारी व्रत संपन्न होने के बाद सबसे पहले प्रसाद स्वरूप ठेकुआ खाते हैं और उसके बाद अन्न ग्रहण करते हैं।
सूर्य उपासना का महापर्व छठ मुख्य रूप से पति और पुत्र की लंबी उम्र के साथ-साथ सुख- समृद्धि के लिए किया जाता है। इस पर्व में सूर्य की आराधना की जाती है। छठ पूजा के नियम इतने कड़े हैं कि इस व्रत को करने से पहले तन-मन से महिलाओं को शुद्ध होना पड़ता है और घर की तमाम चीजों की साफ-सफाई की जाती है। जो लोग छठ पूजा की सामग्री खरीदने में असमर्थ होते हैं वे दूसरों से दान लेकर पूजन सामग्री खरीदते हैं।
पूजन सामग्री
गन्ना, ठेकुआ (मीठा पकवान), नारियल, गागल (टाभ), सरीफा, पानी वाला सिंघाड़ा, पत्ते वाला अदरक, आ॓ल, केला, सेब, संतरा, सुथनी, मूली, पत्ता वाला हल्दी, अनानास, पान का पत्ता, सुपाड़ी, अलता, साठी के चावल व चिड़वा, कोसी, दीया, ढकनी, सूप, दौउरा, चांदनी (नया कपड़ा)
बिहार के लोग जहां भी गये अपने साथ छठ की परंपरा को भी ले गए। विभिन्न प्रदेशों और यहाँ तक की दूसरे देशों में रहने वाले बिहारी भी हर्षोल्लास से इस पर्व को मनाते हैं जिससे यह पर्व धीरे-धीरे दूसरे राज्यों में भी लोकप्रिय हो रहा है।





