अपने छात्र दोस्तों के लिए काका हाथरसी की एक चुटीली कविता प्रस्तुत रहा हूँ.
फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸
लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट।
कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸
दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती।
कहें काका कविराय¸ बुद्धि पर डाली चादर¸
मौज कर रहे पुत्र¸ हड्डियाँ घिसते फादर।
पढ़ना–लिखना व्यर्थ हैं¸ दिन भर खेलो खेल¸
होते रहु दो साल तक फस्र्ट इयर में फेल।
फस्र्ट इयर में फेल¸ जेब में कंघा डाला¸
साइकिल ले चल दिए¸ लगा कमरे का ताला।
कहें काका कविराय¸ गेटकीपर से लड़कर¸
मुफ़्त सिनेमा देख¸ कोच पर बैठ अकड़कर।
प्रोफ़ेसर या प्रिंसिपल बोलें जब प्रतिकूल¸
लाठी लेकर तोड़ दो मेज़ और स्टूल।
मेज़ और स्टूल¸ चलाओ ऐसी हाकी¸
शीशा और किवाड़ बचे नहिं एकउ बाकी।
कहें 'काका कवि' राय¸ भयंकर तुमको देता¸
बन सकते हो इसी तरह 'बिगड़े दिल नेता।'
दिल पे मत लिया कर यार!
शुक्रवार, 14 नवंबर 2008
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काका जी का अंदाज़ सबसे निराला है। उनको पढ़ना सदा ही चेहरे पर मुस्कान ला देता है।
जवाब देंहटाएंbahut hi badhiya:)
जवाब देंहटाएंबढिया गुरु जी...मजा आ गया आपसे मिलके...
जवाब देंहटाएंसादर
पहले भी बहुत बार पढ़ा है ..दुबारा पढ़वाने का धन्यवाद .
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