शुक्रवार, 14 नवंबर 2008

कालिज स्टूडैंट - काका हाथरसी

अपने छात्र दोस्तों के लिए काका हाथरसी की एक चुटीली कविता प्रस्तुत रहा हूँ.


फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸

लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट।

कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸

दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती।

कहें काका कविराय¸ बुद्धि पर डाली चादर¸

मौज कर रहे पुत्र¸ हड्डियाँ घिसते फादर।
पढ़ना–लिखना व्यर्थ हैं¸ दिन भर खेलो खेल¸

होते रहु दो साल तक फस्र्ट इयर में फेल।

फस्र्ट इयर में फेल¸ जेब में कंघा डाला¸

साइकिल ले चल दिए¸ लगा कमरे का ताला।

कहें काका कविराय¸ गेटकीपर से लड़कर¸

मुफ़्त सिनेमा देख¸ कोच पर बैठ अकड़कर।
प्रोफ़ेसर या प्रिंसिपल बोलें जब प्रतिकूल¸

लाठी लेकर तोड़ दो मेज़ और स्टूल।

मेज़ और स्टूल¸ चलाओ ऐसी हाकी¸

शीशा और किवाड़ बचे नहिं एकउ बाकी।
कहें 'काका कवि' राय¸ भयंकर तुमको देता¸

बन सकते हो इसी तरह 'बिगड़े दिल नेता।'


दिल पे मत लिया कर यार!

4 टिप्‍पणियां:

  1. काका जी का अंदाज़ सबसे निराला है। उनको पढ़ना सदा ही चेहरे पर मुस्कान ला देता है।

    जवाब देंहटाएं
  2. बढिया गुरु जी...मजा आ गया आपसे मिलके...
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  3. पहले भी बहुत बार पढ़ा है ..दुबारा पढ़वाने का धन्यवाद .

    जवाब देंहटाएं

आपकी टिप्पणियाँ मेरे लिए आशीर्वाद की तरह हैं जो निश्चय ही मेरा उत्साहवर्धन करेंगी चाहे वो सकारात्मक हों या नकारात्मक.