बुधवार, 29 अक्टूबर 2008

जे एन यू एस यू चुनाव पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने नवम्बर को होनेवाले जे एन यू छात्र संघ के चुनाव पर अगले फैसले तक रोक लगा दी है। यह फ़ैसला जी. सुब्रमनियम की उस याचिका पर सुनवाई के बाद दिया गया जिसमे जे एन यू पर यह आरोप लगाया गया था की यहाँ छात्र संघ के चुनाव लिंगदोह कमिटी द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुसार नहीं हो रहे हैं। लिंगदोह कमिटी ने कई मानदंडों का यहाँ के चुनाव में अनुसरण नहीं किया जा रहा था जैसे उम्र की सीमा, दुबारा चुनाव नहीं लड़ना आदि। सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के तुंरत बाद जे एन यू एस यू की आपात बैठक हुई जिसमे सभी छात्र संगठनों ने जे एन यू की मजबूत लोकतान्त्रिक परम्परा को कुचलने की इस कोशिश की निंदा की गयी। अगले दिन यूनिवर्सिटी की जनरल बॉडी की मीटिंग बुलाई गयी जिसमे पिछली युनियन का कार्यकाल तीन महीने के लिए बढ़ा दिया गया और लिंगदोह कमिटी की सिफारिशों को लागू करने के खिलाफ एक ज्वाइंट स्ट्रगल कमिटी का गठन किया गया। यह कमिटी अगले तीन महीनों में विभिन्न कार्यक्रमों के जरिये इस फैसले के विरूद्ध जनमत तैयार करेगी और इसे कोर्ट में चुनौती देगी।

यह सच है की अधिकांश कॉलेज और विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति हिंसा, धनबल, बाहुबल और भ्रष्टाचार के कारण असली राजनीति में जाने की प्रयोगाशालामात्र बनकर रह गयी है पर जे एन यू एक ऐसा विश्वविद्यालय है जहाँ छात्र राजनीति आज भी लोकतान्त्रिक मूल्यों को सिर्फ़ सहेजे हुए है बल्कि दिनोंदिन उन्हें और भी सशक्त बना रही है। यहाँ के चुनाव में विश्वविद्यालय प्रशासन कोई भूमिका नही निभाता; चुनाव का पूरा संचालन छात्रों के द्वारा निर्वाचित एक स्वतंत्र और निष्पक्ष इलेक्शन कमिटी द्वारा किया जाता है। जहाँ तक धनबल और बाहुबल के प्रयोग की बात है तो आपको यह जानकर आश्चर्य होगा की आज भी यहाँ चुनाव हाथ से बने पोस्टरों और पर्चों से लड़ा जाता है और यहाँ के चुनावी इतिहास में मारपीट की घटनाएँ उँगलियों पर गिनने लायक हैं। जे एन यू में आज तक शायद ही कभी कोई आपराधिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति चुनाव जीता हो। जे एन यू में छात्र राजनीति के कारण यहाँ शिक्षा की गुणवत्ता में कोई कमी आई हो या शैक्षिक माहौल पर कोई असर पडा हो, ऐसा भी नहीं है।

आज इक्कीसवीं सदी में भी अगर जे एन यू में बी ए और एम ए जैसे कोर्सेज़ की फीस मात्र ५०० रुपये प्रतिवर्ष है तो इसके पीछे कुछ योगदान यहाँ की सशक्त छात्र राजनीति का भी है। आज अगर सुदूर पिछडे गावों के गरीब छात्र भी बिना अपने घरवालों पर कोई आर्थिक बोझ डाले विश्वा-स्तर की गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त कर पा रहे हैं तो इसके पीछे कुछ योगदान यहाँ की सशक्त छात्र राजनीति का भी है

ऐसे में सरकार और सुप्रीम कोर्ट का बिना तथ्यों और परिस्थितियों को जाने समझे एक ही डंडे का प्रयोग सबको हांकने के लिए करना सचमुच निराशाजनक है।

शनिवार, 25 अक्टूबर 2008

मेरा गांव



गांव शब्द सुनते ही हम अपने मन में एक तस्वीर सी बना लेते हैं - कमर पे घड़ा रखे कुँए से पानी भरकर आती औरतें, खेतों से हल-बैल लेकर लौटते किसान, गांव के बहार के मैदान में गिल्ली-डंडा खेलते बच्चे, दिए और लालटेन की रोशन में बच्च्चों को सुलातीं दादी मां, आँगन से उठाते चूल्हे के धुएँ की सोंधी खुशबू और दूर खेतों से आती किसी ट्यूबवेल के चलने की आवाज़॥यदि हम भी मेट्रोपोलिटन सिटीज़ में पैदा हुए होते तो शायद गावों की यही तस्वीर हमारे मन में भी रहती। और शायद यह अच्छा भी होता ? आख़िर अपना गाँव भे तो कभी ऐसा हुआ करता होगा।
मेरे गांव का नाम 'अलावां' है लेकिन बोलने की सुविधा के लिए लोगों ने इसे 'अलामा' बना दिया है। यह बिहार के नालंदा जिले में बसा - हज़ार की आबादी वाला एक छोटा सा गांव है। इसमें से तकरीबन एक-डेढ़ हज़ार तो - सल् से कम उम्र के बच्चे ही होंगे। सब भगवान् की देन है!! गांव आधुनिकीकरण की और अपने कदम बढ़ा चुका है। शहर या क़स्बा तो नहीं कह सकते पर ऊपर की तस्वीर के अनुसार गांव भी नहीं है। गांव से नज़दीकी बाज़ार तक पक्की सड़क, सरकारी हैंडपंप, बिजली और टेलीफोन के खम्भे, ईंट के मकान, क्रिकेट खेलते बच्चे, और गांव के बाहर के चौक पर पॉलिटिक्स पर बहस करते किसान। बीच बीच में किसी घर से मोबाइल के रिंग की आवाज़ भी जायेगी। इक्का-दुक्का जींस-टीशर्ट पहने लड़कियां भी दिख जायेंगी। भले ही चहरे और शरीर के हाव-भाव वही सलवार कुरते वाले ही होंगे।

कभी-कभी लगता है की विकास की कीमत कुछ ज्यादा ही चुकानी पड़ रही है हम अपनी पहचान, अपनी महक, अपना अस्तित्व खो रहे हैं। मुझे सरकारी हैंडपंप के पानी में पुराने कुँए के पानी वाली मिठास कभी नहीं मिली। टाँगे पर बैठकर एक घंटे में बाज़ार पहुँचने का आनंद जीप या बस से पन्द्रह मिनट में पहुँचने में कभी नहीं मिला। और खेत से तुंरत लाई गयी 'तोरी' और 'लौकी' की सब्जी वाला स्वाद बाज़ार के पनीर और मशरूम में कभी नहीं मिला।

पर कुछ चीज़ें मुझे अब भी पहले जैसी लगती हैं गांव में। जब भी छुट्टियों में गांव जाता हूँ तो कुछ चीजें ज़रूर करने की कोशिश करता हूँ। जैसे- सर्दियों में पुआल जलाकर आग तापना (सेंकना), घर में चौकी-पलंग वाले बिस्तर पर सोकर दालान में पुआल पर बिस्तर बिछाकर सोना। सचमुच वह आनंद आपको इम्पोर्टेड गद्दों में भी नहीं मिलेगा। गर्मियों में मैं बिजली रहने पर भी छत के ऊपर खुले में सोना पसंद करता हूँ (शुक्र है की वहां दिल्ली जितने मच्छर नहीं हैं) चांदनी रात में दूर कहीं रेडियो पर कोई पुराना गीत बज रहा हो और छत पर लेटकर तारों के अंतरजाल को देखते रहने के आनद को शब्दों में समेत पाना सचमुच मुश्किल है।

कभी-कभी गाँव में तेज़ी से हो रहे बदलावों से मन क्षुब्ध तो होता है पर पता नहीं क्यों गांव के प्रति लगाव और आकर्षण दिनों-दिन और बढ़ता ही जाता है। शायद गुजरते, फिसलते पलों को ज्यादा से ज्यादा समेत लेने, जी लेने, रोक लेने की ख्वाहिश और आने वाले वक्त के प्रति मन में छुपे भय के कारण ऐसा हो।

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

पिछले सालों के टॉपिक एक्जाम पेपर्स

१० वी टॉपिक परीक्षा का ग्रामर और राइटिंग का पेपर
१० वी टॉपिक परीक्षा का लिसनिंग और रीडिंग का पेपर
११ वी टॉपिक परिक्षा का ग्रामर और राइटिंग का पेपर
११ वे टॉपिक परिक्षा का लिसनिंग और रीडिंग का पेपर
१२ वी टॉपिक परिक्षा का ग्रामर और राइटिंग का पेपर
१२ वी टॉपिक परिक्षा का लिसनिंग और रीडिंग का पेपर
१३ वी टॉपिक परिक्षा का ग्रामर और राइटिंग का पेपर



मेरा विश्वविद्यालय : जे.एन.यू.



जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय न सिर्फ़ भारत बल्कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में से एक है। यह राजधानी नई दिल्ली मे अरावली पहाडी की तराई मे २०० एकड क्षेत्र में फैला हुआ है। यह एक पूर्णतः आवासीय केन्द्रीय विश्वविद्यालय है। इसकी स्थापना १९६५ में हुई थी। इसकी स्थापना के पीछे उद्देश्य एक ऐसा विश्वविद्यालय की स्थापना करना था जहां देश और समाज के हर वर्ग के छात्रों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर की गुणवत्ता वाली शिक्षा और शैक्षिक माहौल उब्लब्ध कराया जाये। और यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जे.एन.यू. अपने इस उद्येश्य की प्राप्ति में पूरी तरह सफ़ल रहा है। आज यह सिर्फ़ भारत बल्कि एशिया के उन विशिष्ट संस्थानों में से एक है जहां विभिन्न वैग्यानिक और समजिक विषयों पर उच्च स्तर पर शोधकार्य चल रहा है।

जे.एन.यू. में करीब ६००० छात्र और करीब ५०० शिक्षक हैं। यहं कुल १० स्कूल ३ स्पेशल सेंटर्स हैं.

स्कूल

स्कूल ऑफ़ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स
स्कूल ऑफ़ सोशल साइन्सेज़
स्कूल ऑफ़ इन्टरनेशनल स्टडीज़
स्कूल ऑफ़ एन्वायरन्मेंट स्टडीज़
स्कूल ऑफ़ लैंगुएज, लिटरेचर & कल्चरल स्टडीज़
स्कूल ऑफ़ कम्प्युटर & सिस्तक साइन्सेज़
स्कूल ऑफ़ बायोटेक्नोलोजी
स्कूल ऑफ़ फिजिकल साइन्सेज़
स्कूल ऑफ़ इन्फोर्मेशन टेक्नोलॉजी
स्कूल ऑफ़ लाइफ साइन्सेज़

स्पेशल सेंटर्स

स्पेशल सेंटर फॉर संस्कृत स्टडीज़
स्पेशल सेंटर फॉर मोलेकुलर मेडीसिन
सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ ला & गवर्नेंस


जे.एन.यू. अपने विभिन्न कोर्सेज़ मे एडमिशन के लिए प्रतिवर्ष एक कठोर प्रवेश परीक्षा आयोजित करता है जिसमें देशभर से हज़ारों मेधावी छात्र शामिल होते हैं। जे.एन.यू सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछडे क्षेत्रों और वर्गों से आने वाले छात्रों तथा बालिकाओं को प्रवेश में विशेष प्राथमिकता देता है। इस कारण यहां दिल्ली, पंजाब, और महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्यों की तुलना में बिहार, बंगाल, यू.पी और उत्तर-पूर्वी प्रदेशों के छात्र अधिक संख्या में हैं। वैसे जे.एन.यू मे हर वर्ग और प्रान्त के छात्र सद्भाव और भाइचारे के साथ रहते हैं। इस प्रकार यह एक छोटे भारत का रूप प्रस्तुत करता है। जे.एन.यू कैंपस को चार क्षेत्रों में बांटा गया है - पूर्वांचल, पश्चिमाबाद,. दक्षिणापुरम और उत्तराखण्ड। जे.एन.यू. के छात्रावासों के नाम भी भारत की सभी नदियों के नाम पर रखे गये हैं; जैसे - नर्मदा, माही-मांडवी, सतलज, झेलम, गंगा, यमुना, गोदावरी, साबरमती, ताप्ती, लोहित, चन्द्रभागा, ब्रह्मपुत्र, महानदी इत्यादि। सभी फ़ुल टाइम छात्रों को छात्रावास और मेस की सुविधा दी जाती है।


शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

मेरे बारे में


मेरा नाम सतीश चन्द्र सत्यार्थी है। मैं बिहार के नालंदा जिले का रहने वाला हूं। मैंने अपनी स्कूली शिक्षा अपने गृह जिले से पूरी की है और अभी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कोरियन भाषा केंद्र में बी.. द्वितीय वर्ष का छात्र हूं। मेरी रूचियां हैं- साहित्य पढना और नई नई भाषाएं सीखना। हालांकि अभी तक मुझे हिन्दी, अंग्रेजी, कोरियन और तुर्की के अलावा और कोइ भाषा नहीं सीख पाया हूं पर मेरा प्रयास है कि जे.एन.यू. मे अपने अध्ययनकाल के दौरान कुछ और भाषाओं जैसे- ग्रीक, हीब्रू, जापानी और जर्मन आदि की कम से कम बेसिक जानकारी प्राप्त करूंगा तथा संस्कृत और उर्दू का गहन अध्ययन करूंगा। देखते हैं हो पाता है या नहीं। खाली समय मे मैं संगीत सुनना पसंद करता हूं; खसकर पुराने हिंदी फिल्मी गीत और गज़लें। गुलाम अली और मेंहदी हसन मेरे पसंदीदा गज़ल गायक हैं। मेरी सबसे बडी कमज़ोरी यह है कि मैं बहुत बडा आलसी हूं। हर काम को कल और परसों पर डालने कि कोशिश करता हूं। और क्या बताऊं अपने बारे में ....................................................................कुछ जानना हो तो लिखियेगा; शाम को इधर ही मिलता हूं।

मेरे अध्ययन की भाषा

जैसा कि अबतक आप जान गये होंगे कि मैं जे.एन.यू के कोरियन सेंटर से कोरियन भाषा में बी.. कर रहा हूं। इस लेख में मैं आपको इस भाषा के बारे में थोडी और जानकारी देना चाहता हूं।

कोरियन दक्षिण और उत्तरी कोरिया दोनों देशों की राजभाषा है। यह दुनिया में लगभग करोड लोगों के द्वारा बोली जाती है तथा विश्व मे सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं मे १३वें स्थान पर आती है। इसके वर्गीकरण को लेकर लैंग्युएज साइंटिस्ट्स में विवाद है। कुछ लोग इसे अल्टाइक फैमिली मे रख्ते हैं तो कुछ इसे लैंगुएज आइसोलेट मानते हैं। इसकी वाक्यसंरचना हिन्दी की तरह कर्ता+कर्म+क्रिया है। इस भाषा कि लिपि "हंगल" है जिसका आविष्कार १४४९ . में किंग सेजोंग के द्वारा किया गया था। इसके पहले कोरिया मे चीनी भाषा बोली जाती थी। हंगल की खोज ने कोरिया मे साक्षरता को बढाने मे बहुत योगदान दिया है क्योंकि यह चीनी भाषा कि तुलना मे अत्यंत सरल है। इसे दुनिया कि सबसे साइंटिफिक लेखन पद्धतियों मे से एक माना जाता है। हंगल में कुल २४ अक्षर है जिनमें से १० स्वर और १४ व्यंजन हैं।

कोरियन पर आज भी चीनी भाषा का प्रभाव साफ़ दिखाई पडता है। कोरियन के तकरीबन ६०% शब्द चीनी उत्पत्ति के हैं जिन्हे कोरिया मे "हान्जा" कहा जाता है। खासकर पारंपरिक लेखन में आज भी मुख्यतः चाइनीज़ कैरेक्टर्स का इस्तेमाल किया जाता है। अखबारों तथा साहित्यिक रचनाओं में भी "हान्जा" का प्रयोग प्रचलित है। अतः कुछ महत्वपूर्ण चाइनीज़ कैरेक्टर्स को जाने बिना कोरियन भाषा मे दक्षता हासिल नहीं की जा सकती।

मेरा अध्ययन केन्द्र

मेरा अध्ययन केन्द्र (सेंटर)

मेरे सेंटर का नाम "सेंटर फ़ॉर जापानी कोरियन एण्ड नॉर्थ ईस्ट एशियन स्टडीज़ (सी.जे.के.एन...एस.)" है। लेकिन सुविधा के दृष्टिकोण से हम छात्र इसे "कोरियन सेंटर" कह्ते हैं। यह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय केभाषा, साहित्य और संस्कृति अध्ययन केन्द्र (एस.एल.एल.सी.एस)’ के अन्तर्गत आता है जो कि भारत में भाषा शिक्षण का अग्रणी संस्थान है। कोरियन सेंटर दक्षिण एशिया के उन गिने-चुने संस्थानों में से एक है जहां कोरियन भाषा पढाई जाती है। भारत मे यह एकमात्र संस्थान है जहां कोरियन में बी.. और एम.. पाठयक्रम उपलब्ध हैं। इसके अलावा कुछ अन्य संस्थान जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय, मगध विश्वविद्यालय आदि कोरियन मे सर्टिफ़िकेट और डिप्लोमा कोर्सेज़ करवाते हैं।

कोरियन सेंटर मे कुल १० शिक्षक और करीब १०० छात्र हैं। भारतीय शिक्षकों मे श्रीमती वैजयंती राघवन, श्री रविकेश मिश्रा, डॉ. नीरजा समजदार, श्री कौशल कुमार, श्रीमती पुष्पा तिवारी और श्री पी.एन.अजीता हैं तथा कोरियन शिक्षकों में डॉ किम, ली सौन्ग ग्यौन्ग, मिस छो, मिस ना आदि हैं। सभी शिक्षक अपने अपने क्षेत्र के जाने माने विद्वान हैं तथा कोरियन भाषा के शिक्षण में भारत ही नहीं बल्कि विश्व के अग्रणी प्रोफ़ेसर्स कि श्रेणी में आते हैं। हमारे शिक्षक सिर्फ़ भाषा शिक्षण को सरल और रोचक बनाने के लिये हमेशा शोधरत रह्ते हैं बल्कि उन्होंने भारतीय छात्रों की ज़रूरत के अनुकूल कोरियन भाषा कि पुस्तकें भी लिखी हैं जो कि सभी छात्रों को सेंटर के द्वारा मुफ़्त वितरित की जाती हैं।


जे.एन.यू, कोरियन सेंटर के बी..(प्रथम वर्ष)और बी..(द्वितिय वर्ष) पाठयक्रमों के लिये प्रतिवर्ष प्रवेश परीक्षा आयोजित करता है जिसमें पूरे भारत से हजारों प्रतिभवान छात्र शामिल होते हैं। आज से कुछ वर्ष पहले तक भारतीय छात्रों के बीच कोरियन भाषा के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी लेकिन पिछ्ले कुछ वर्षों में प्लेसमेंट के ऊंचे ग्राफ और बहुत सारी स्कॉलरशिप्स की वजह से करियन भाषा के लिये अप्लाई करने वाले छात्रों की संख्या मे भारी वृद्धि है। आज स्थिति यह है कि कोरियन सेंटर अधिक से अधिक मेधावी और उर्जावान छात्रों को आकर्षित कर रहा है। इस सेंटर के छात्र सिर्फ़ अपने सेंटर के कोर्सेज़ मे अव्वल ग्रेड लाते हैं बल्कि अन्य सेन्टर्स और स्कूल्स के ऑप्शनल कोर्सेज़ में भी उच्चतम अंक प्राप्त करते हैं। कई बार यह अन्य सेन्टर्स के छात्रों के लिए ईर्ष्या की वजह भी बन जाता है। लेकिन कोरियन सेंटर के छात्रों की सफ़लता का एक कारण यह है कि वे जे.एन.यू के पढने के सुअवसर तथा अपने समय का पूरा सदुपयोग करते हैं तथा व्यर्थ बात में अपना समय नष्ट करते हुए लक्ष्य पर अपना ध्यान केन्द्रित रखते हैं। यही वजह है कि आज कोरियन सेंटर के कै छात्र एल.जी, सैमसंग, ह्यून्डई, ऑरेकल, विप्रो और इन्फ़ोसिस जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों मे कार्यरत हैं तो कई छात्र विभिन्न स्कॉलरशिप्स पर कोरिया मे अध्ययन कर रहे हैं।

कोरियन सेंटर के विकास और विस्तार में कोरिया की सरकार के साथ साथ वहां की कंपनियां भी योगदान दे रही हैं और उम्मीद है कि आने वाले एक-दो वर्षों मे यहां एम.फिल. और पी.एचडी. की पढाई भी शुरू हो जायेगी। कोरियन सेंटर सिर्फ़ कोरियन भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार में अपन योगदान दे रहा है बल्कि यह दोनों देशों के सामाजिक और संस्कृतिक संबंधों को प्रगाढ करने मे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारत और कोरिया के रजनीतिक, आर्थिक, और संस्कृतिक संबंधों के बीच भाषा एक बडी बाधा है। ऐसे में ऐसे कुशल छात्रो की सख्त ज़रूरत है जो दोनों देशों के बीच की भाषाई दूरी को कम कर सकें। और कोरियन सेंटर इस क्षेत्र मे अपना सकारात्मक योगदान दे रहा है।