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"हम तो जेएनयू को समझे थे घर जैसी पवित्र चीज़
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मह की गूँज की तरह गलियों में बहता है
गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है..........."
यह बात सच है कि जेएनयू आने से पहले 'यूनिवर्सिटी' के बारे में हमारे ख़याल दूसरे थे। यह बात सच है कि जेएनयू आने से पहले 'अध्यापक' के बारे में हमारे ख़याल दूसरे थे। यह बात सच है कि जेएनयू आने से पहले 'छात्रसंघ'' के बारे में हमारे ख़याल दूसरे थे। यह बात सच है कि जेएनयू आने से पहले 'पॉलिटिक्स' के बारे में हमारे ख़याल दूसरे थे। यह बात सच है कि जेएनयू आने से पहले 'जेंडर और कास्ट' के बारे में हममें से कई लोग दूसरे तरह का ख़याल रखते थे। यह बात सच है कि जेएनयू आने से पहले हमको 'साम्प्रदायिकता' के खतरे की समझ इस तरह से नहीं थी। यह बात सच है कि जेएनयू आने से पहले अपने बारे में हमारे ख़याल कुछ धुंधले धुंधले थे।
ऐसा नहीं है कि जेएनयू में आने के बाद सीखने के लिए कुछ बच नहीं जाता। ऐसा नहीं है कि जेएनयू के भीतर कमियाँ कमजोरियां नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि जेएनयू के भीतर सब कुछ अच्छा ही है। जेएनयू तमाम कमजोरियों से दूर, तमाम अच्छाइयों से लैस कोई आइलैंड नहीं है। बावजूद इसके हम पूरी शिद्दत से यह कहना चाहते हैं कि जेएनयू ने हमें वो तमाम बातें और चीज़ें सिखाईं जो अगर हम कहीं और होते तो सीखने में बड़ा वक्त लग जाता और हममें से कई लोग जिन्हें शायद न सीख पाते।
आख़िर कुछ तो सोचा होगा जी पार्थसारथी (जेएनयू के पहले चांसलर) और मुनिस रज़ा (पूर्व चांसलर) जैसे लोगों ने, जब वे इस यूनिवर्सिटी का आर्किटेक्ट डिजायन कर रहे थे। कुछ कि रहा ही होगा उनके मन में जब वे कहते थे कि जेएनयू के भीतर हम पक्की पगडंडियाँ इसलिए नहीं बनाएंगे कि जेएनयू के छात्र अपना रास्ता ख़ुद बनाएंगे और ये कि जेएनयू के छात्रों को बने बनाए रास्तों पर चलने की ज़रूरत नहीं है। आख़िर कोई बात तो दिमाग में रही ही होगी जब यूनिवर्सिटी की उदघोषणा को नेहरू के भाषण के उस अंश से ग्रहण किया गया, जो कहती है कि "एक विश्वविद्यालय जो खडा होगा मानवता के लिए, न्याय के लिए, सहिष्णुता के लिए......." सत्तर के दशक के उन छात्रों के दिमाग में कोई न कोई तस्वीर तो रही होगी, जब उनहोंने रात-रातभर जागकर और बहस कर जेएनयू छात्र संघ संविधान की नींव रखी, जीबीएम और यूजीबीएम की परम्परा डाली। मोहम्मद हसन, नामवर सिंह, रोमिला थापर, बिपन चंद्र, कृष्ण भारद्वाज, योगेन्द्र सिंह, मुनिस राजा, मीनाक्षी मुखर्जी... जैसे अध्यापकों के मन में कोई एक प्रोजेक्ट तो रहा ही होगा जो उन्होंने ऐसा उन्नत पाठ्यक्रम (कोर्स करिकुलम) डिजायन किया, जिसके सामने आज भी कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड पानी भरते हैं। यूनिवर्सिटी की शुरुआत से ही गाँव-गिराँव के लड़के-लड़कियों को २० डिप्रेवेशन प्वाइंट देना 'दया' की बात तो ज़रूर ही नहीं रही होगी। आज कानून पास हो जाने के बाद भी शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण और महिलाओं की भागीदारी के मद्देनज़र ये याद करना ज़रूरी लगता है कि यह जेएनयू ही है जिसने पिछले तीन दशकों से लगातार सामाजिक, आर्थिक रूप से पिछडे छात्रो को दाखिला देने का एक रिकोर्ड कायम किया है। आख़िर क्या बात है?
जेएनयू 'जेएनयू' क्यों है? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि यहाँ सिर्फ़ २६३ रूपए में एडमिशन मिल जाता है? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि यहाँ आप सिर्फ़ १५ रूपए प्रति माह फीस देकर होस्टल में रह लेते हैं? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि सेशनल और मिड टर्म के समय रात में नींद हराम हो जाती है, तब भी न जाने हम कैसे पास हो जाया करते हैं? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि यहाँ छात्र संघ का चुनाव बड़े दिलचस्प तरीके से होता है, जहाँ घमासान वैचारिक राजनीतिक बहसों और विरोध के वाबजूद विरोधी पार्टियों के नेता कार्यकर्ता अगली सुबह एक ही ब्रेकफास्ट टेबल पर पाये जाते हैं? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि यहाँ लड़के और लडकियां दिन हो या रात, कहीं भी बेरोकटोक घूम सकते हैं? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि गंगा ढाबे पर बैठकर आप प्याले में तूफ़ान खडा कर देते हैं? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि रात में रिंग रोड का सफ़र शायद दुनिया का सबसे सुहाना सफ़र है? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि पूरी रात पीएसआर पर बैठ कर गुजार देने के बाद उगते सूरज को देखना अच्छा लगता है? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि गोपालन जी की लाइब्रेरी कैंटीन दिल्ली का सबसे सस्ता खाना खिलाती है? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि यहाँ गरीब छात्रों को एमसीएम (Merit-cum-Means Scholarship) मिला करता है? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि यहाँ जीएसकैश (जेंडर सेंसितैजेशन कमिटी फॉर अगेंस्ट सेक्सुअल हरासमेंट) है? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि यहाँ दिल्ली का सबसे घना जंगल, सबसे गहरी गुफा, सबसे ऊंची चट्टान, सबसे खूबसूरत पक्षी, और तमाम तरह के कीडे-मकोडे मिलते हैं? क्या जेएनयू सिर्फ इसलिए 'जेएनयू' है कि 'आपके लिए, आपके साथ सदैव' का बिल्ला लगाने वाली दिल्ली पुलिस की वें यहाँ नहीं घूमा करती? क्या जेएनयू इसलिए 'जेएनयू' है कि तमाम होस्टल्स के साथ-साथ इसका नॉर्थ गेट कभी बंद नहीं होता (ईस्ट गेट की बात दूसरी है, वहाँ हमारे वी सी साहब रहते हैं).
ये सब जेएनयू है। यह सब और............. और भी बहुत कुछ, वही सब कुछ है जो जेएनयू की आत्मा का निर्माण करता है। यह वही सब है जो जेएनयू को 'जेएनयू ' बनाता है। इसमें एक भी चीज आप खत्म कर देंगे तो शायद जेएनयू 'जेएनयू नहीं रह जायेगा। इसमें किसी पर भी हमला 'जेएनयू' की आत्मा पर हमला है, जेएनयू की पहचान पर हमला है, पीढियों की मेहनत और सपने पर हमला है। हमें हर हर हमले का जवाब देना होगा।
चंदू (पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष) ने कुछ तो सोचा होगा जब '९५ में वे फीस वृद्धि के खिलाफ प्रशासन से जूझ गए थे। '९३ की उस युनियन ने कुछ तो सोचा ही होगा जिसने '८३ के ख़त्म कर दिए गए डिप्रेवेशन प्वाइंट को फ़िर से शुरू कराने के लिए एतिहासिक लड़ाई लड़ी थी। उन तमाम सारी यूनियंस की कुछ तो समझदारी रही ही होगी जिन्होंने हमारी फीस को २६३ रु से २६४ रु नहीं होने दिया।
जरूर......... बात थी; कि एक ऐसा विश्वविद्यालय बनाएंगे जिसमें ऐसे लोग भी आ सकें, रह सकें, पढ़ सकें, बढ़ सकें, जिनके लिए जेएनयू के बाहर दिल्ली में सरवाइव करना भी मुश्किल होता। .....बात थी कि कालीकट, वारंगल, गुंटूर, कुन्नूर, नागरकोइल, जोरहाट, धनबाद, पूर्णिया, चंदौली, बिजनौर, झुंझूनू, सिलीगुड़ी, इटानगर, इम्फाल, अमरावती, आसनसोल, शोलापुर, कटिहार, आजमगढ़, टीकमगढ़, बस्तर, अनंतनाग और कश्मीर, कारगिल, चंबा, पिथौरागढ़, मयूरभंज, कालाहांडी के साथ-साथ श्रीलंका और नेपाल से चप्पल फटकारते हुए आने वाला नौजवान जब यहाँ आए तो उसे चप्पल पहनने को लेकर कोई तंज (हीनभावना) न हो।
पढ़ते तो यहाँ ऐसे भी लोग हैं जिनका पूरा परिवार विदेशों में रहता है या जिनके माता-पिता मंत्री-संत्री हैं। पढ़ते तो यहाँ ऐसे भी लोग हैं जो जरूरत पड़ने पर अपनी छात्रवृति का पैसा बचाकर घर भेज देते हैं। पढ़ती तो यहाँ ऐसी लड़कियां भी हैं जिन्होंने जेएनयू आने से पहले कभी जींस नहीं पहना। और ऐसी भी जो आठवीं से पहले घुड़सवारी सीख चुकी थीं। लेकिन ऐसे मौके शायद कम ही आए हैं या आने दिया गया है जब अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि को लेकर कोई बेहतर-कमतर की जहनियत पाले हो।
आज इसी जेएनयू पर हमला है। बात सिर्फ़ प्रोस्पेक्टस का दाम बढ़ने की नहीं है, ये भी नहीं की होस्टल में मीटर लग आरहे हैं, बिल लिया जायेगा। शायद यह भी नहीं कि पी एस आर पर फिल्में बनेंगी और यूनिवर्सिटी मुनाफा कमाएगी। बात जैसा कि तमाम संगठन और छात्र संघ के लोग कह रहे हैं, उस मानसिकता की है जो विश्वविद्यालय और उसके संसाधनों के मुनाफा कमाने के स्रोत के रूप में देखती है। जेएनयू प्रशासन इसी मानसिकता का मास्टरमाइंड है। जेएनयू वीसी और रेक्टर ने इसी मानसिकता में पीएचडी की हुई है जिसे कुछ अध्यापकों ने ठीक ही 'मोंटेक-मनमोहन मानसिकता' कहा है। वो मानसिकता जो हर चीज को किराये पर उठा देना चाहती है, हर सुविधा का यूजर चार्ज लेना चाहती है, हर बात से मुनाफा कमाना चाहती है।
जिस तरह आरक्षण से छेड़छाड़ की जा रही है, विकलांग छात्रों के अधिकारों को रौंदा जा रहा है, जेएनयू की डेमोग्राफी और ईकोलोजी को बदलने की कोशिश की जा रही है, सोची-समझी योजना के तहत टुकड़े-टुकड़े में निजीकरण लागू किया जा रहा है, खम्भे उखाड-गाडे जा रहे हैं, रिफ्लेक्टरस और साइनबोर्डस में जेएनयू को बदल देने की कोशिश है। प्रशासन की यह पूरी साजिश, यह कोशिश उस सबके ख़िलाफ़ है जिसके लिए जेएनयू बना था, जिसके लिए '७० से लेकर अब तक लोग लड़े हैं, जिसको बनाने में छात्रों से लेकर ईमानदार प्रगतिशील अध्यापकों ने भी खून पसीना जलाया है। इसे रोकना होगा।
हम छात्रों की संख्या, हमारी एकता ही हमारी ताकत और हमारा हथियार है. आइये इस ताकत को इकट्ठा करें, हथियार को धार दें और प्रशासन पर हल्ला बोल दें। ये मालूम है कि लड़ाई एक दिन की नहीं है। जेएनयू 'जेएनयू' बना भी एक दिन में नहीं और वैस चांसलर व उनके लोग अपने एक कार्यकाल में उसको बिगड़ भी नहीं पाएंगे। हम उनको ऐसा करने भी नहीं देंगे। हम इस लड़ाई को आख़िर तक लडेंगे।
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