सोमवार, 24 जनवरी 2011
यूरोपियन यूनियन पर्यवेक्षक दल को बिनायक सेन के मुकदमे की कार्रवाई के निरीक्षण की अनुमति मिलनी चाहिए?
| प्रतिक्रिया : |
मंगलवार, 28 दिसम्बर 2010
ब्लॉगिंग: ये रोग बड़ा है जालिम: मेरा नया ब्लॉग
ये मेरे नए ब्लॉग या कहें कि ब्लोगिंग की इस पारी की पहली पोस्ट है इसलिए शुरुआत ज़रा बैकग्राउंड से करना सही रहेगा. पहली बार 'ब्लॉग' शब्द शायद २००३-०४ के आसपास सुना था. नया नया एनसीआर (गाजियाबाद) आया था. कम्प्यूटर पहली बार वहीं देखा और यूज किया. तब ब्लॉग का मतलब बस यही समझ में आया था कि इससे मुफ्त में वेबसाईट बन जाती है.. और आपको पुरी दुनिया उसपर देख और पढ़ सकती है.. नेट पर अपना नाम देखने का ही अलग चाव था. फोटो देखना सभव नहीं था क्योंकि डिजिटल कैमरे और स्कैनर तक पहुँच नहीं थी उस वक्त. तो एक ब्लॉग बनाया हमने भी. करना क्या है ये नहीं पता था. तो वही किया जो बहुत से नए ब्लोगर शायद आज भी शुरू में करते हैं. हिन्दी साहित्य के एक पोर्टल पर जाकर दो चार कवियों की कविताएँ कॉपी की और अपने ब्लॉग पर चेप दीं (कॉपीराइट किस चिड़िया का नाम है, नहीं पता था). और सीना चौड़ा करके रूम पर आ गए (ये क्रांतिकारी कार्य साइबर कैफे में २० रूपये कुर्बान करके हुआ था). लगा कोइ बड़ा किला फतह कर लिया है. ब्लॉग ट्रैफिक वगैरह तकनीकी चीजों का पता नहीं था. मुझे तो लग रहा था की लाखों लोग अब मेरे ब्लॉग पर आ रहे होंगे.
उसकी बार जब भी कैफे जाता ब्लॉग को खोलकर देखता और बस मन गदगद हो जाता. फिर २००७ में दिल्ली आया. तब तक वो ब्लॉग तो वहीं का वहीं था.. पर कम्प्युटर के बारे में तकनीकी ज्ञान ठीक-ठाक हो गया था. दुनियादारी की समझ भी थोड़ी बढ़ गयी थी. फिर जे एन यू आया तो एक अच्छा एकेडमिक और वैचारिक वातावरण मिला जिसका प्राइवेट इंस्टीट्यूट्स में अभाव होता है. फिर एक नया ब्लॉग बनाया- नाम रख दिया जेएनयू. कुछ महीने बाद महसूस हुआ की नाम उचित नहीं था. सुनने से जेएनयू का आधिकारिक ब्लॉग मालूम होता था. पर फिर छोड़ दिया लापरवाही में. शुरू में तो ब्लॉग पर काफी जोर-शोर से पोस्टिंग की पर फिर धीरे धीरे आलस बढ़ता गया और साथ में पोस्ट्स के बीच का अंतराल भी. आप देख ही रहे होंगे. और भी एक दो ब्लोग्स थे जो ठहर-ठहर के चलते चलते बंद से ही हो गए.
इस साल के शुरू में कोरिया सरकार की स्कोलरशिप के लिए अप्लाई कर दिया; मिल भी गयी. अगस्त, २०१० में कोरिया आ गया. यहाँ एक तो बात करने वाला कोइ नहीं, सोचने का समय काफी. ब्लोगिंग का कीड़ा फिर कुलबुलाने लगा. सोचा, पैसे हैं अपना डोमेन और वेब होस्टिंग लिया जाए, थोड़ा सीरियसली ब्लोगिंग की जायेगी. कई सारे वेब-होस्टिंग पैकेजेज पर रिसर्च किया. सालाना करीब करीब ५०-६० डॉलर का खर्च था. पर अपने आलसपन पर शक था अभी भी. कहीं एक-दो महीने बाद जोश ठंडा पड़ जाए तो पैसे बेकार.. फिर एक दिन नेट पर भटकते हुए दिल्ली की एक कपनी का विज्ञापन देखा जो मात्र ९० रूपये में .in वाले डोमेन बेच रही थी. हमने फोन लगाया बात हुई और दिल्ली में एक मित्र को बोलकर कंपनी के अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करवाए. दो डोमेन खरीदे- www.topikguide.in जो कि कोरिया भाषा क्षमता परीक्षण(TOPIK) की तैयारी से सम्बंधित है और दूसरा scsatyarthi.in जिसके एक सब-डोमेन http://korea.scsatyarthi.in/ पर अपना ब्लॉग बनाने का निश्चय किया. फिलहाल कुछ समय तक गूगल ब्लोगर पर फ्री होस्टिंग की ही सेवा लेने का निर्णय लिया. बाद में मन हुआ तो खुद होस्ट किया जायेगा.
शुरू में बड़ी टेंशन का विषय था कि ब्लॉग हिन्दी में बनाया जाये या अंगरेजी में. लगा अंगरेजी में यह ब्लॉग एक ज्यादा बड़े टारगेट तक पहुँच पायेगा और अधिकाँश इन्टरनेट यूजर्स को अंगरेजी आती ही है. पर फिर लगता यार हिन्दी मातृभाषा है. भले ही कम लोग पढेंगे हिन्दी में पर उनसे जो अपनापन मिलेगा वह अंगरेजी में संभव नहीं. और अंगरेजी में पहले से हर विषय पर पहले से हजार ब्लॉग हैं- कोरिया पर भी; हिन्दी में सामग्री का अभाव है नेट पर.... इस तरह के ढेर सरे तर्क वितर्क.. अंत में हिन्दी की ही जीत हुई. नए ब्लॉग का नाम रखा सुबह की शान्ति के देश में- द कोरियन एक्सपीरिएंस.
आपका स्वागत है इस नए बसेरे पर.. आप थोड़ा उत्साह बढाते रहेंगे तो लिखने का जोश बना रहेगा.. लिखने की शैली बोरिंग है पर झेल लीजिए.. आगे सुधारने की कोशिश करूँगा. खासकर ब्लॉग जगत के पुराने धुरंधरों से विशेष स्नेह और मार्गदर्शन चाहूँगा.. ;)
| प्रतिक्रिया : |
बुधवार, 26 मई 2010
गोमांस और पोर्क खाने में क्या बुराई है?
| प्रतिक्रिया : |
शनिवार, 22 मई 2010
ब्लोगर्स कृपया भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान दें
| प्रतिक्रिया : |
शुक्रवार, 29 मई 2009
कोरियन सीखें 4 - शब्दों को पढ़ना शुरू करें
http://koreanacademy.blogspot.com/
आज के पाठ में हम कोरियन शब्दों को पढ़ना सीखेंगे और उनका अर्थ भी समझेंगे।
| प्रतिक्रिया : |
कोरियन सीखें ३ - सिलेबल सरंचना और उच्चारण
http://koreanacademy.blogspot.com/
सतीश चंद्र सत्यार्थी
| प्रतिक्रिया : |
बुधवार, 8 अप्रैल 2009
नागार्जुन का काव्य शिल्प
बाबा नागार्जुन का काव्य संसार - अन्तिम भाग
नागार्जुन पर यह आरोप अक्सर लगाया जाता रहा है की अपनी कविताओं में वे छंद और शिल्प के प्रति उदासीन हैं। सबसे पहले हमें यह देखना चाहिए की यह उदासीनता भाषा और शिल्प की अज्ञानता के कारण है या जानबूझकर अपनाई गयी है। नागार्जुन हिन्दी के अलावा संस्कृत, पाली, प्राकृत, बँगला, मैथिली आदि भाषाओं के भी जानकार थे। उन्होंने संस्कृत में काव्य रचना भी की है और हिन्दी में छंदबद्ध कविताएँ भी लिखी हैं। इसलिए यह कहना ग़लत होगा कि उन्हें भाषा-शिल्प का ज्ञान नहीं था। बल्कि उन्होंने कभी अपने कों छंद और शिल्प में बंधने नहीं दिया। वह कविता बतकही की भाषा अपनाते हैं। यह भाषा जहाँ स्थानीय शब्दों से अपने कों रंगती है वहीं अन्य भाषाओं के शब्दों कों समाहित कर काव्य कों एक विविधता प्रदान करती है। नागार्जुन की कविताओं में शिल्प बनावटी या गढा हुआ नहीं है बल्कि सहज और उदार है। उनके काव्य में कबीर के भाषाई अक्खडपन और निराला के व्यंग्य-वैविध्य का अनूठा संगम है।
भाषा के स्तर पर यह नागार्जुन की विशेषता है कि उनकी कविता सीधे जन से जाकर जुड़ती है। नागार्जुन कविता लिखते समय श्रोता के रूप में अपने सामने किसी कला-पारखी अथवा विद्वान कों नहीं रखते बल्कि आम 'जन' कों रखते हैं। शायद यही कारण है कि जहाँ उनकी कविता एक ओर एक अल्पशिक्षित किसान की समझ में आ जाते है है वहीँ बड़े साहित्यिक विद्वान उसे समझने में कठिनाई का अनुभव करते हैं। क्योंकि उनकी कविता कों समझने के लिए पहले साहित्यिक और कलागत पूर्वाग्रहों के चश्मे कों उतारना पड़ता है।
>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>.<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<
सन्दर्भ ग्रन्थ
१. मार्क्सवाद और आधुनिक हिंदी कविता - जगदीश्वर चतुर्वेदी
5. सामाजिक चेतना के निर्भय कवि बाबा नागार्जुन - डा0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी का आलेख
6. डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी के ब्लॉग पर प्रकाशित बाबा नागार्जुन से सम्बंधित उनके संस्मरण
कुछ अन्य स्रोत भी हैं पर सबका उल्लेख करना संभव नहीं है। इसके लिए क्षमा चाहता हूँ। पर उन सबके प्रति ह्रदय से आभारी हूँ।
| प्रतिक्रिया : |







