शुक्रवार, २९ मई २००९
कोरियन सीखें 4 - शब्दों को पढ़ना शुरू करें
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आज के पाठ में हम कोरियन शब्दों को पढ़ना सीखेंगे और उनका अर्थ भी समझेंगे।
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कोरियन सीखें ३ - सिलेबल सरंचना और उच्चारण
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सतीश चंद्र सत्यार्थी
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बुधवार, ८ अप्रैल २००९
नागार्जुन का काव्य शिल्प
बाबा नागार्जुन का काव्य संसार - अन्तिम भाग
नागार्जुन पर यह आरोप अक्सर लगाया जाता रहा है की अपनी कविताओं में वे छंद और शिल्प के प्रति उदासीन हैं। सबसे पहले हमें यह देखना चाहिए की यह उदासीनता भाषा और शिल्प की अज्ञानता के कारण है या जानबूझकर अपनाई गयी है। नागार्जुन हिन्दी के अलावा संस्कृत, पाली, प्राकृत, बँगला, मैथिली आदि भाषाओं के भी जानकार थे। उन्होंने संस्कृत में काव्य रचना भी की है और हिन्दी में छंदबद्ध कविताएँ भी लिखी हैं। इसलिए यह कहना ग़लत होगा कि उन्हें भाषा-शिल्प का ज्ञान नहीं था। बल्कि उन्होंने कभी अपने कों छंद और शिल्प में बंधने नहीं दिया। वह कविता बतकही की भाषा अपनाते हैं। यह भाषा जहाँ स्थानीय शब्दों से अपने कों रंगती है वहीं अन्य भाषाओं के शब्दों कों समाहित कर काव्य कों एक विविधता प्रदान करती है। नागार्जुन की कविताओं में शिल्प बनावटी या गढा हुआ नहीं है बल्कि सहज और उदार है। उनके काव्य में कबीर के भाषाई अक्खडपन और निराला के व्यंग्य-वैविध्य का अनूठा संगम है।
भाषा के स्तर पर यह नागार्जुन की विशेषता है कि उनकी कविता सीधे जन से जाकर जुड़ती है। नागार्जुन कविता लिखते समय श्रोता के रूप में अपने सामने किसी कला-पारखी अथवा विद्वान कों नहीं रखते बल्कि आम 'जन' कों रखते हैं। शायद यही कारण है कि जहाँ उनकी कविता एक ओर एक अल्पशिक्षित किसान की समझ में आ जाते है है वहीँ बड़े साहित्यिक विद्वान उसे समझने में कठिनाई का अनुभव करते हैं। क्योंकि उनकी कविता कों समझने के लिए पहले साहित्यिक और कलागत पूर्वाग्रहों के चश्मे कों उतारना पड़ता है।
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सन्दर्भ ग्रन्थ
१. मार्क्सवाद और आधुनिक हिंदी कविता - जगदीश्वर चतुर्वेदी
5. सामाजिक चेतना के निर्भय कवि बाबा नागार्जुन - डा0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी का आलेख
6. डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी के ब्लॉग पर प्रकाशित बाबा नागार्जुन से सम्बंधित उनके संस्मरण
कुछ अन्य स्रोत भी हैं पर सबका उल्लेख करना संभव नहीं है। इसके लिए क्षमा चाहता हूँ। पर उन सबके प्रति ह्रदय से आभारी हूँ।
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मंगलवार, ७ अप्रैल २००९
बाबा नागार्जुन की व्यंग्यप्रधान कविताएँ
( पर उससे पहले शायद आप पहला, दूसरा, तीसरा और चौथा भाग भी पढ़ना चाहें ...... )
बाबा नागार्जुन का काव्य संसार - पांचवा भाग
रामराज्य में अबकी रावण नंगा होकर नाचा है
सूरत शकल वही है भइया, बदला केवल ढांचा है
लाज शर्म रह गई न बाकी, गांधीजी के चेलों में
फूल नहीं लाठियाँ बरसती रामराज्य की जेलों में।
पगलाई है, जाने, अगले क्षण क्या सोचे!
इस बाघिन को रखेंगे हम चिड़ियाघर में
ऎसा जन्तु मिलेगा भी क्या त्रिभुवन भर में!
इंदिरा गांधी द्वारा अपनी महत्वाकांक्षाओं के आगे अपने पिता के सुकर्मों पर पानी फेरे जाने को वे इस तरह व्यक्त करते हैं -
सत्ता की मस्ती में, भूल गई बाप को?
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!
क्या हुआ आपको? क्या हुआ आपको?
छात्रों के लहू का चस्का लगा आपको
काले चिकने माल का मस्का लगा आपको
किसी ने टोका तो ठस्का लगा आपको
अन्ट-शन्ट बक रही जनून में
शासन का नशा घुला ख़ून में
फूल से भी हल्का
समझ लिया आपने हत्या के पाप को
इन्दु जी, क्या हुआ आपको
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!
वहीं दूसरी जगह वे कहते हैं -
लाइए, मैं चरण चूमूं आपके
किए पूरे सभी सपने बाप के
लाइए, मैं चरण चूमूं आपके |
मोरारजी देसाई के लिए 'भाई भले मोरार जी' कविता का यह अंश देखिये -
गिरवी कौन रखेगा हमको सात समंदर पार जी
वोटों की राजनीति पर व्यंग्य करते हुए टिकट पाने की घुड़दौड़ का दृश्य नागार्जुन कुछ यों प्रस्तुत करते हैं -
सिंडीकेटी प्रभुओं की पगधूर झार के
दिल्ली से लौटे हैं कल टिकट मार के
खिले हैं दांत दाने ज्यों अनार के
आए दिन बहार के।
और वोट पाने की जुगत भी देखिये -
बटोरो वोट
बैंक बैलेंस बढाओ
राजघाट पर बापू की वेदी के आगे अश्रु बहाओ।
नागार्जुन ने सिर्फ़ राजनीति को ही नहीं बल्कि उस नौकरशाही को भी आड़े हाथों लिया है जो ऑफिस में तो गांधी की फोटो टांगते हैं और भीतर से धूर्त हैं। रिश्वत और कदाचार में घिरी नौकरशाही को कुछ यों रगड़ते हैं बाबा नागार्जुन -
राधे चक्कर लगा काटने सुबह से हो गई शाम
सौदा पटा बड़ी मुश्किल से पिघले नेता राम
पूजा पाकर साध गए चुप्पी हाकिम हुक्काम
भारत सेवक जी को था अपनी सेवा से काम
खुला चोर बाजार, बढ़ा चोकरचूनी का दाम
भीतर झरा गयी ठठरी, बाहर झुलसी चाम
भूखी जनता की खातिर आजादी हुई हराम।
नेताओं के कारनामों से देश की जो स्थिति हो रही है उसका वर्णन कुछ इस प्रकार है -
घटक तंत्र का भ्रूणपात ही खेल रहे हैं
जोड़-तोड़ के सौ-सौ पापड बेल रहे हैं
भारत माता को खादी में ठेल रहे हैं।
देश की इस दुर्दशा से नागार्जुन क्षुब्ध तो हैं पर साथ ही कहीं न कहीं उनके मन में आशा की एक किरण भी है कि क्रान्ति का जो बीज जन-मानस के दिलों में सुगबुगा रहा है वह एक दिन ऊपर ज़रूर आयेगा। और इन आतताइयों के शाषण को उखाड़ फेंकेगा।
कंचन क्रांति, मंचन क्रांति, वंचन क्रांति, किंचन क्रांति
फल्गु सी प्रवाहित होगी, भीतर भीतर तरल भ्रान्ति।
अगला भाग इस श्रृंखला का अन्तिम भाग होगा जिसमें बाबा नागार्जुन के काव्य शिल्प की चर्चा होगी और उन विद्वतजनों के प्रति मेरा आभार (सन्दर्भ सूची) भी होगा जिनके स्रोतों से मैंने इस श्रृखला को तैयार करने में मदद ली थी।
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सोमवार, ६ अप्रैल २००९
बाबा नागार्जुन का काव्य संसार - चौथा भाग
नागार्जुन के काव्य में आर्थिक यथार्थ
रखो ठीक बैलेंस, बल्कि कुछ बचत दिखाओ/ छोटे बड़े
मगरमच्छों को अभय दान दो/ धन्वंतरियों के उन अगणित
अमृत्घतों पर, देखो कोई नज़र न डाले।
श्रम कठोर मांगती है। च्च्च्ती आई है सदा से धरती
कर्षण विकर्षण सिंचन परिसिंचन।
नागार्जुन 'जन-लक्ष्मी' की कल्पना करते हैं जिस पर सबका हक़ बराबर हो।
मद्रास में/ दिखाई नहीं पड़ेंगे लखनऊ में सत्यमूर्ति।
सुभाष और जे एम सेनगुप्त क्या सीमित रहेंगे
भवानीपुर और श्याम बाज़ार की दूकान तक। तिलक
नहीं निकलेंगे पूजा से बाहर ?
महान राष्ट्रीय नेताओं, कलाकारों और साहित्यकारों के प्रति लिखी गयी उनकी श्रद्धायुक्त कविताओं को देखकर भी उनके राष्ट्रप्रेम का पता चलता है। पर इसका पूरा प्रमाण ६५ जुर ७१ के पाकिस्तानी आक्रमणों के दौरान लिखी गयी उनकी कविताओं में मिल जाता है। ६२ में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण किए जाने के बाद अब तक कम्युनिस्ट रहे नागार्जुन का कम्युनिस्टों से मोहभंग होता है और वे माओ को जमकर गरियाते हैं। यहाँ उन्होंने यह दिखा दिया कि किसी भी व्यक्ति के लिए देशहित विचारधारा से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
पुत्र हूँ भारतमाता का
और कुछ नहीं हिन्दुस्तानी हूँ महज
प्राणों से भी प्यारे हैं मुझे अपने लोग
प्राणों से भी प्यारी है मुझे अपनी भूमि।
पाकिस्तानी सेना पर व्यंग्य करते हुए वे कहते हैं -
बाहरी शक्ति जिसका संबल
देखो पीटकर भागे कैसे
वे पाकिस्तानी दानव दल।
नागार्जुन उन क्रांतिकारियों को भी आवाज देते हैं जो शोषण के ख़िलाफ़ मुक्ति के अभियान में लगे हैं-
सर्वहारा स्वयं अपना करेगा अधिकार स्थापित
दूहकर वह प्रांत जोंकों की मिटा देगा धरा की प्यास
करेगा आरम्भ अपना स्वयं ही इतिहास।
राष्ट्रीय हित के अलावा नागार्जुन ने अंतर्राष्ट्रीय सर्वहारा वर्ग के कल्याण के लिए भी कविताएँ लिखीं।
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शनिवार, ४ अप्रैल २००९
बाबा नागार्जुन का काव्य संसार - तीसरा भाग
यथार्थपरक कविताएँ
दे रहे थे गति
रबड़-विहीन ठूंठ पैडलों को
चला रहे थे
एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन चक्र
कर रहे थे मात त्रिविक्रम वामन के पुराने पैरों को
नाप रहे थे धरती का अनहद फासला
घण्टों के हिसाब से ढोये जा रहे थे !
साबुन की सुगन्धित टिकिया / लगाएंगे सर में चमेली का तेल
या कि हम उम्र छोकरी कों टिकली ला देंगे।
बिड़ला, टाटा और डालमियां की तीसों दिन दीवाली है
जोर-जुल्म की आंधी चलती, बोल नहीं कुछ सकते हो,
समझ नहीं पाता हूँ कि हुकूमत गोरी है या काली है।
कलाधर या रचयिता होना नहीं पर्याप्त है
पक्षधर की भुमिका धारण करो............ ।
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गुरुवार, २ अप्रैल २००९
बाबा नागार्जुन का काव्य संसार - दूसरा भाग
गतांक से आगे ........................
......................................... नागार्जुन की कविताओं कों हम मुख्यतः चार श्रेणियों में रख सकते हैं। पहली, रागबोध की कविताएँ जिनमें प्रकृति-सौंदर्य और प्रेम कविताओं कों रखा जा सकता है। दूसरी, यथार्थपरक कविताएँ जिनमें सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक यथार्थ कों दर्शाती कविताएँ हैं। तीसरे, राष्ट्रीयता से युक्त कविताएँ और चौथे व्यंग्य प्रधान कविताएँ।
प्राकृतिक सौन्दर्य की कविताएँ
घुम्मकड़ी नागार्जुन के जीवन की एक अविभाज्य विशेषता है। अपने यायावरी जीवन के कारण उन्होंने देश-देशांतर के अनुभव बटोरे और प्रकृति कों अनेक रंगों में देखा। प्राकृतिक सौंदर्य की उनकी सर्वाधिक प्रशंसित कविताओं में 'बादल कों गिरते देखा है' कविता है। बादलों पर लिखी इस कविता में उन्होंने मैदानी भागों से आकर हिमालय की गोद में बसी झीलों में क्रीडा कौतुक करते हंसों, निशाकाल में शैवालों की हरी दरी पर प्रणयरत चकवा-चकवी के दृश्यबंध तो प्रस्तुत किए ही साथ ही कहीं पगलाए कस्तूरी मृग कों कविता में ला खडा किया -
के पीछे धावित हो होकर
अपने ऊपर चिढ़ते देखा है
बादल कों घिरते देखा है।
शिशिर की यह सुनहरी, यह प्रकृति का उल्लास
रोम रोम बुझा लेना ताजगी की प्यास।
पावस की नमी का चांद
तिक्त स्मृतियों का विकृत विष वाष्प जैसे सूंघता है चाँद
जागता था, विवश था अब धुंधला है चाँद
प्रकृति का वर्णन करते हुए कभी-कभी वे भावाकुल हो उठते हैं। कभी वे जन-जीवन में हरियाली भरने वाले पावस कों बारम्बार प्रणाम भेजने लगते हैं -
पावस तुम्हे प्रणाम
ताप्ताप्त वसुधा, दुःख भंजन
पावस तुम्हे प्रणाम
ऋतुओं के प्रतिपालक रितुवर
पावस तुम्हे प्रणाम
अतुल अमित अंकुरित बीजधर
पावस तुम्हे प्रणाम
प्रणय भाव की कविताएँ
किसी हथेली का स्पर्श
तन गई रीढ़
महसूस हुई कन्धों को
पीछे से,
किसी नाक की सहज उष्ण निराकुल साँसें
तन गई रीढ़
कौंधी कहीं चितवन
रंग गए कहीं किसी के होठ
निगाहों के ज़रिये जादू घुसा अन्दर
तन गई रीढ़
तिमिर का सीना
जोत की फाँक
यह तुम थीं
सिकुड़ गई रग-रग
झुलस गया अंग-अंग
बनाकर ठूँठ छोड़ गया पतझर
उलंग असगुन-सा खड़ा रहा कचनार
अचानक उमगी डालों की सन्धि में
छरहरी टहनी
पोर-पोर में गसे थे टूसे
यह तुम थीं
नौस्टैल्जिक कविताएँ
सिन्दूर तिलकित भाल वैसे तो प्रणय भाव की कविता है पर इस कविता के भीतर उभरी हुई 'होमसिकनेस' को स्पष्ट महसूस किया जा सकता है।
याद आता मुझे अपना वह तरौनी ग्राम
याद आतीं लीचियां, वे आम
याद आते धान याद आते कमल, कुमुदनी और ताल मखान
याद आते शस्य श्यामल जनपदों के रूप-गुन अनुसार ही
रखे गए वे नाम।
तालाब के दो फेरे लगाए
सुबह-सुबह
गँवई अलाव के निकट
घेरे में बैठने-बतियाने का सुख लूटा
सुबह-सुबह
आंचलिक बोलियों का मिक्स्चर
कानों की इन कटोरियों में भरकर लौटा
सुबह-सुबह
जैसा कि आप जानते हैं कि जिस काव्य के लिए नागार्जुन कों जाना जाता है वह है यथार्थ का चित्रण करता काव्य। आप इसका उपयोग एक टाइम मशीन के रूप में कर सकते हैं। कल के खंड में नागार्जुन की यथार्थपरक कविताओं पर चर्चा होगी। आप सादर आमंत्रित हैं।
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