पृष्ठ

मंगलवार, 28 दिसम्बर 2010

ब्लॉगिंग: ये रोग बड़ा है जालिम: मेरा नया ब्लॉग

ये ब्लोगिंग की लत किसी नशे की लत से कम नहीं होती. ये मैं अपने अनुभव से बता रहा हूँ और मेरा अनुमान है कि आपमें से अधिकाँश लोग मेरी बात से सहमत होंगे. इस पोस्ट में ब्लोगिंग के साथ अपने अब तक के अनुभव को आपसे साझा करूँगा.

ये मेरे नए ब्लॉग या कहें कि ब्लोगिंग की इस पारी की पहली पोस्ट है इसलिए शुरुआत ज़रा बैकग्राउंड से करना सही रहेगा. पहली बार 'ब्लॉग' शब्द शायद २००३-०४ के आसपास सुना था. नया नया एनसीआर (गाजियाबाद) आया था. कम्प्यूटर पहली बार वहीं देखा और यूज किया. तब ब्लॉग का मतलब बस यही समझ में आया था कि इससे मुफ्त में वेबसाईट बन जाती है.. और आपको पुरी दुनिया उसपर देख और पढ़ सकती है.. नेट पर अपना नाम देखने का ही अलग चाव था. फोटो देखना सभव नहीं था क्योंकि डिजिटल कैमरे और स्कैनर तक पहुँच नहीं थी उस वक्त. तो एक ब्लॉग बनाया हमने भी. करना क्या है ये नहीं पता था. तो वही किया जो बहुत से नए ब्लोगर शायद आज भी शुरू में करते हैं. हिन्दी साहित्य के एक पोर्टल पर जाकर दो चार कवियों की कविताएँ कॉपी की और अपने ब्लॉग पर चेप दीं (कॉपीराइट किस चिड़िया का नाम है, नहीं पता था). और सीना चौड़ा करके रूम पर आ गए (ये क्रांतिकारी कार्य साइबर कैफे में २० रूपये कुर्बान करके हुआ था). लगा कोइ बड़ा किला फतह कर लिया है. ब्लॉग ट्रैफिक वगैरह तकनीकी चीजों का पता नहीं था. मुझे तो लग रहा था की लाखों लोग अब मेरे ब्लॉग पर आ रहे होंगे.

उसकी बार जब भी कैफे जाता ब्लॉग को खोलकर देखता और बस मन गदगद हो जाता. फिर २००७ में दिल्ली आया. तब तक वो ब्लॉग तो वहीं का वहीं था.. पर कम्प्युटर के बारे में तकनीकी ज्ञान ठीक-ठाक हो गया था. दुनियादारी की समझ भी थोड़ी बढ़ गयी थी. फिर जे एन यू आया तो एक अच्छा एकेडमिक और वैचारिक वातावरण मिला जिसका प्राइवेट इंस्टीट्यूट्स में अभाव होता है. फिर एक नया ब्लॉग बनाया- नाम रख दिया जेएनयू. कुछ महीने बाद महसूस हुआ की नाम उचित नहीं था. सुनने से जेएनयू का आधिकारिक ब्लॉग मालूम होता था. पर फिर छोड़ दिया लापरवाही में. शुरू में तो ब्लॉग पर काफी जोर-शोर से पोस्टिंग की पर फिर धीरे धीरे आलस बढ़ता गया और साथ में पोस्ट्स के बीच का अंतराल भी. आप देख ही रहे होंगे. और भी एक दो ब्लोग्स थे जो ठहर-ठहर के चलते चलते बंद से ही हो गए.

इस साल के शुरू में कोरिया सरकार की स्कोलरशिप के लिए अप्लाई कर दिया; मिल भी गयी. अगस्त, २०१० में कोरिया आ गया. यहाँ एक तो बात करने वाला कोइ नहीं, सोचने का समय काफी. ब्लोगिंग का कीड़ा फिर कुलबुलाने लगा. सोचा, पैसे हैं अपना डोमेन और वेब होस्टिंग लिया जाए, थोड़ा सीरियसली ब्लोगिंग की जायेगी. कई सारे वेब-होस्टिंग पैकेजेज पर रिसर्च किया. सालाना करीब करीब ५०-६० डॉलर का खर्च था. पर अपने आलसपन पर शक था अभी भी. कहीं एक-दो महीने बाद जोश ठंडा पड़ जाए तो पैसे बेकार.. फिर एक दिन नेट पर भटकते हुए दिल्ली की एक कपनी का विज्ञापन देखा जो मात्र ९० रूपये में .in वाले डोमेन बेच रही थी. हमने फोन लगाया बात हुई और दिल्ली में एक मित्र को बोलकर कंपनी के अकाउंट में पैसे ट्रांसफर करवाए. दो डोमेन खरीदे- www.topikguide.in जो कि कोरिया भाषा क्षमता परीक्षण(TOPIK) की तैयारी से सम्बंधित है और दूसरा scsatyarthi.in जिसके एक सब-डोमेन http://korea.scsatyarthi.in/ पर अपना ब्लॉग बनाने का निश्चय किया. फिलहाल कुछ समय तक गूगल ब्लोगर पर फ्री होस्टिंग की ही सेवा लेने का निर्णय लिया. बाद में मन हुआ तो खुद होस्ट किया जायेगा.

शुरू में बड़ी टेंशन का विषय था कि ब्लॉग हिन्दी में बनाया जाये या अंगरेजी में. लगा अंगरेजी में यह ब्लॉग एक ज्यादा बड़े टारगेट तक पहुँच पायेगा और अधिकाँश इन्टरनेट यूजर्स को अंगरेजी आती ही है. पर फिर लगता यार हिन्दी मातृभाषा है. भले ही कम लोग पढेंगे हिन्दी में पर उनसे जो अपनापन मिलेगा वह अंगरेजी में संभव नहीं. और अंगरेजी में पहले से हर विषय पर पहले से हजार ब्लॉग हैं- कोरिया पर भी; हिन्दी में सामग्री का अभाव है नेट पर.... इस तरह के ढेर सरे तर्क वितर्क.. अंत में हिन्दी की ही जीत हुई. नए ब्लॉग का नाम रखा सुबह की शान्ति के देश में- द कोरियन एक्सपीरिएंस.


आपका स्वागत है इस नए बसेरे पर.. आप थोड़ा उत्साह बढाते रहेंगे तो लिखने का जोश बना रहेगा.. लिखने की शैली बोरिंग है पर झेल लीजिए.. आगे सुधारने की कोशिश करूँगा. खासकर ब्लॉग जगत के पुराने धुरंधरों से विशेष स्नेह और मार्गदर्शन चाहूँगा.. ;)

बुधवार, 26 मई 2010

गोमांस और पोर्क खाने में क्या बुराई है?

[भूमिका के लिए पिछली पोस्ट पढ़ें]
पिछले साल अगस्त में मुझे कोरिया जाने का मौक़ा मिला. कोरिया सरकार ने एक यूथ कैम्प (Youth Camp for Asia's Future) का आयोजन किया था जिसमें एशिया के लगभग सभी देशों से ३०० युवा छात्रों को आमंत्रित किया गया था. इसमें भाग लेने के लिए नई दिल्ली में दक्षिण कोरिया के दूतावास द्वारा भारत से ९ लोगों का चयन किया गया जिसमें एक मैं भी था. १५ दिन की इस यात्रा के दौरान न सिर्फ इतने देशों के युवाओं से विचारों के आदान-प्रदान का मौक़ा मिला बल्कि बहुत सारी संस्कृतियों को एक साथ देखने और अनुभव करने का भी अवसर मिला. हो सकता है कि मैं भविष्य में अपने पैसों से विदेश जाऊं पर जो अनुभव और रोमांच इस यात्रा में मिला वो नहीं लगता कि दुबारा मिल पायेगा. उस कैम्प में बिताये गए क्षण निश्चय ही जीवन के यादगार क्षण थे. खैर इस यात्रा के विषय में अलग से एक विस्तृत लेख लिखा जा सकता है. पर यहाँ यह सब बताने का मकसद कुछ और है.

शायद आपमें से बहुत लोग यह जानते हों कि कोरिया में मांसाहार बहुत प्रचलित है और तकरीबन अधिकतर व्यंजनों में गाय और सूअर के मांस का प्रयोग होता है. पूर्ण शाकाहारी व्यंजनों को तलाशना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण काम था. मैं और मेरे कई अन्य भारतीय मित्र चिकेन और मटन आदि खाते हैं पर वहाँ जाकर हमने भी शाकाहारी ही बनना बेहतर समझा. वैसे वहाँ का शाकाहारी खाना भी देखकर और खुशबू से ही भूख ख़त्म हो जाती थी.

अब परेशानी यह हुई कि वहाँ हमेशा खाने से पहले हमें किसी न किसी कोरियाई या किसी अन्य विदेशी मित्र को कुछ सवालों के जवाब देने पड़ते थे. जैसे- "ज्यादातर भारतीय लोग मांस क्यों नहीं खाते", "जब मुर्गा/बकरा खाते हैं तो गाय और सूअर का मांस खान में क्या बुराई है; दोनों तो जीवित प्राणी ही हैं", "मुस्लिम सूअर का मांस नहीं खाते और हिन्दू गाय का मांस क्यों नहीं खाते".

मैं इन सवालों का अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार ऐसा तर्कपूर्ण उत्तर देने की कोशिश करता था जिससे उनकी जिज्ञासा भी शांत हो जाए और भारतीय संस्कृति के प्रति उनके मन में कोई गलतफहमी भी न रहे. पर कई बार मैं ऐसा करने में असफल भी रहता था. ऐसे प्रश्न अक्सर विदेशी, खासकर उतर एशियाई लोग हम भाषा के छात्रों से पूछते हैं. अगर आप ऐसी स्थिति में हों तो क्या उत्तर देंगे??

शनिवार, 22 मई 2010

ब्लोगर्स कृपया भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान दें


काफी दिनों से लिखना बंद था. पता नहीं क्यों जिस उत्साह से ब्लोगिंग की दुनिया में आया था धीरे-धीरे वो कम होता गया और एक समय ऐसा आया जब कुछ नया लिखने की जो उथल-पुथल सी मचती थी मन में वो खत्म सी हो हाई. इसका सबसे बड़ा कारण तो मेरा आलस्य और रचनात्मकता का अभाव है पर लगता है कुछ और भी कारण अवश्य हैं. खैर, जाने दीजिए इस बारे में फिर कभी......... 
ब्लॉग पर लिखना बंद रहा पर पढ़ने का मोह कभी नहीं त्याग पाया. ज्यादा नहीं कुछेक ब्लॉग. ईमानदारी से कहूँ तो .... छोडिये फिर कभी कहूँगा....... लिखने का कीड़ा काफी दिनों से मन में कुलबुला रहा था. समझ में नहीं आ रहा था क्या लिखूं...... बस अभी ही मन में एक विचार आया.... कोइ महान विचार नहीं... सरल सीधा सा है......

चूँकि मैं विदेशी भाषा का विद्यार्थी हूँ इसलिए विदेशियों से हर दिन पाला पड़ता रहता है. और ऐसी जगह पर हूँ जहां दूसरे देशों से पढने आये छात्र काफी संख्या में हैं तो परमानेंट विदेशी मित्र भी कई हैं. इनमें से अधिकाँश के  मन में भारत और भारतीय संस्कृति से जुडी बातों में  गहरी दिलचस्पी होती है. छोटी-छोटी बातों में... बहुत सवाल घुमड़ते रहते हैं इनके मन में. भारत के धर्मों, त्योहारों, रीति-रिवाजों के बारे में. परेशानी तब होती है जब ये विद्यार्थी इन सवालों की बौछार हम पर करते हैं. हम विदेशी भाषाओं के विद्यार्थियों पर कुछ ज्यादा इसलिए क्योंकि हम उनकी भाषा में उन्हें समझा सकते हैं.  जैसे यदि कोई कोरियाई व्यक्ति यदि मुझसे मिल गया और उसे पता लग गया कि मैं कोरियाई भाषा जानता हूँ तो बस सवालों की बौछार शुरू. अब इमानदारी की बात यह है कि हममें से अधिकाँश लोगों को इन सवालों के तर्कपूर्ण उत्तर खुद नहीं मालूम होते. अभी हम कुछ दोस्त (ज्यादातर भाषा-विद्यार्थी) गंगा ढाबा पर बैठकर चाय पीते हुए गप-शप कर रहे थे तो यही चर्चा निकल आई. कोई कह रहा था.... यार, गाइडिंग में बड़ी प्रॉब्लम होतीहै... कोई कह रहा था....यार, बड़ी शर्म आती है जब भारत कि संस्कृति से जुड़े सवालों के उत्तर नहीं दे पाते.......क्यों है ऐसा... कहीं कैरियर की होड ने युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से दूर तो नहीं कर दिया है? अगर ऐसा है तो यह वाकई खतरनाक है. 

बस यही सब सोच रहा था लौटते हुए. दिमाग में आया क्यों न ब्लॉग पर कुछ लिखा जाए इस बारे में. जिन प्रश्नों का हमें सामना करना पड़ता है उन्हें ब्लॉग-जगत की अदालत में रखा जाए. मेरी योजना है कि एक-एक करके मैं इन सांस्कृतिक गुत्थियों और प्रश्नों को यहाँ रखूंगा और इन पर आपकी खरी और विस्तृत राय की अपेक्षा रहेगी. इसमें कोइ शक नहीं कि हिन्दी जगत के सर्वश्रेष्ठ बुद्धेजीवी ब्लॉग-जगत पर हैं.  और अगर आप सब इस कार्य में अपना योगदान देते हैं तो यह कहीं न कहीं, भले ही बहुत छोटे स्तर पर ही सही, भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. इस श्रृंखला में भारत के सभी धर्मों, क्षेत्रों और भाषाओं से जुड़े मुद्दे शामिल होंगे. सभी ब्लोगर बंधुओं और खासकर वरिष्ठ ब्लोगरों से इस बारे में राय चाहूँगा.


शुक्रवार, 29 मई 2009

कोरियन सीखें 4 - शब्दों को पढ़ना शुरू करें

हिन्दी माध्यम में उपलब्ध इस नए पाठ के लिए यहाँ जाएँ :-
http://koreanacademy.blogspot.com/

आज के पाठ में हम कोरियन शब्दों को पढ़ना सीखेंगे और उनका अर्थ भी समझेंगे।

कोरियन सीखें ३ - सिलेबल सरंचना और उच्चारण

हिन्दी माध्यम में उपलब्ध इस पाठ के लिए यहाँ जाएँ :-
http://koreanacademy.blogspot.com/

सतीश चंद्र सत्यार्थी

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

नागार्जुन का काव्य शिल्प

बाबा नागार्जुन का काव्य संसार - अन्तिम भाग

नागार्जुन पर यह आरोप अक्सर लगाया जाता रहा है की अपनी कविताओं में वे छंद और शिल्प के प्रति उदासीन हैं। सबसे पहले हमें यह देखना चाहिए की यह उदासीनता भाषा और शिल्प की अज्ञानता के कारण है या जानबूझकर अपनाई गयी है। नागार्जुन हिन्दी के अलावा संस्कृत, पाली, प्राकृत, बँगला, मैथिली आदि भाषाओं के भी जानकार थे उन्होंने संस्कृत में काव्य रचना भी की है और हिन्दी में छंदबद्ध कविताएँ भी लिखी हैं इसलिए यह कहना ग़लत होगा कि उन्हें भाषा-शिल्प का ज्ञान नहीं था बल्कि उन्होंने कभी अपने कों छंद और शिल्प में बंधने नहीं दिया वह कविता बतकही की भाषा अपनाते हैं यह भाषा जहाँ स्थानीय शब्दों से अपने कों रंगती है वहीं अन्य भाषाओं के शब्दों कों समाहित कर काव्य कों एक विविधता प्रदान करती है नागार्जुन की कविताओं में शिल्प बनावटी या गढा हुआ नहीं है बल्कि सहज और उदार है उनके काव्य में कबीर के भाषाई अक्खडपन और निराला के व्यंग्य-वैविध्य का अनूठा संगम है

भाषा के स्तर पर यह नागार्जुन की विशेषता है कि उनकी कविता सीधे जन से जाकर जुड़ती है नागार्जुन कविता लिखते समय श्रोता के रूप में अपने सामने किसी कला-पारखी अथवा विद्वान कों नहीं रखते बल्कि आम 'जन' कों रखते हैं शायद यही कारण है कि जहाँ उनकी कविता एक ओर एक अल्पशिक्षित किसान की समझ में जाते है है वहीँ बड़े साहित्यिक विद्वान उसे समझने में कठिनाई का अनुभव करते हैं क्योंकि उनकी कविता कों समझने के लिए पहले साहित्यिक और कलागत पूर्वाग्रहों के चश्मे कों उतारना पड़ता है

>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>>.<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<<


सन्दर्भ ग्रन्थ

१. मार्क्सवाद और आधुनिक हिंदी कविता - जगदीश्वर चतुर्वेदी

२. प्रगतिवादी हिंदी साहित्य -- डॉ. कृष्ण लाल "हंस"

३. आधुनिक हिंदी साहित्य का इतिहास - दच्चन सिंह

4. नागार्जुन - कवि और कथाकार - सत्यनारायण

5. सामाजिक चेतना के निर्भय कवि बाबा नागार्जुन - डा0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर जी का आलेख

6. डॉ. रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी के ब्लॉग पर प्रकाशित बाबा नागार्जुन से सम्बंधित उनके संस्मरण



कुछ अन्य स्रोत भी हैं पर सबका उल्लेख करना संभव नहीं है। इसके लिए क्षमा चाहता हूँ। पर उन सबके प्रति ह्रदय से आभारी हूँ।