बुधवार, 1 अप्रैल 2009

बाबा नागार्जुन का काव्य संसार


अगले हफ्ते मंगलवार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के हिन्दी भाषा विभाग में मुझे बाबा नागार्जुन पर एक संगोष्ठी पत्र जमा करना है, और शुक्रवार को सेमिनार में बोलना भी है। इस कार्य में कई दिनों से लगा हुआ था। लाइब्रेरी में कई धूल पडी किताबों कों झाड़ पोंछ कर पढा, कई वेबसाइट्स और ब्लोग्स की ख़ाक छानी, कविताकोष पर भी समय बिताया. और किसी तरह लिख-लिखा कर आलेख तैयार किया। हालांकि गुणवत्ता से मैं ख़ुद संतुष्ट नहीं हूँ पर फ़िर भी लगा कि क्यों न इसे ब्लॉग पर डाल दिया जाए। अगर यह किसी शोध कार्य में सहायक नहीं भी हो तो कम से कम लोग पढ़कर आनंद तो ले ही सकते हैं। इसलिए इसे आप सब ज्ञानी जनों के लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ। एक आग्रह और है आपसे अगर इसमें सुधार के लिए कुछ सुझाव दे सकें तो बड़ा उपकार होगा मुझपर। इससे मुझे अपने प्रस्तुतीकरण को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी. सुझाव न हो तो भी अपनी ईमानदार टिप्पणी ज़रूर दें कि आलेख आपको कैसा लगा।

चूंकि यह आलेख बहुत लंबा है, आप इसे पढ़ते हुए बोर न हों इसलिए इसे छह खंडों में प्रस्तुत करूंगा। अंत में जिन जिन विद्वतजनों की सामग्रियों (किताब, ब्लॉग अथवा वेबसाईट) से मैंने लिखने में मदद ली है उनका ह्रदय से आभारी हूँ। अन्तिम खंड के साथ उन सबका सन्दर्भ देने की भी कोशिश करूंगा।

बाबा नागार्जुन - एक परिचय
नागार्जुन हिन्दी कविता के प्रगतिवादी युग के प्रखरतम कवि के रूप में जाने जाते हैं। वे हिन्दी कविता धारा के उन प्रमुख स्तम्भों में हैं जिन्होंने कविता कों न सिर्फ रचा बल्कि उसको जिया भी। हिन्दी काव्य साहित्य में उनका प्रवेश एक ऐसे क्रन्तिकारी कवि के रूप में होता है जो सच्चे अर्थों में सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है। नागार्जुन जीवन और साहित्य दोनों में पीड़ित जन के पक्षधर रहे हैं। उनकी कविताएँ 'जन' से निकलकर आती हैं और 'जन' की भाषा में 'जन' तक पहुँचती हैं। वे कोरे लेखक ही नहीं थे। जन आंदोलनों में भाग लेकर जेल यात्राएं भी की थीं।
नागार्जुन के व्यक्तित्व निर्माण में तत्कालीन राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक परिस्थितियों की मुख्य भूमिका रही है। और इसकी प्रतिक्रया भी उनके सम्पूर्ण साहित्य में देखी जा सकती है। नागार्जुन के हिन्दी साहित्य में पदार्पण का युग एक ऐसा युग था जिसमें जिसमें राजनीतिक उथल पुथल के साथ समाज अब भी पुरानी रुढियों में जकडा हुआ था। एक और अंग्रेजों का दमन निरंतर बढ़ रहा था तो दूसरी ओर समाज में व्याप्त बुराइयां जैसे बाल विवाह, परदा प्रथा, अशिक्षा, विधवा समस्या आदि के कारण स्त्रियों की दशा शोचनीय थी। धार्मिक रुढ़िग्रस्तता, अंधविश्वास, आदि भी बढ़ते जा रहे थे। स्वतन्त्रता के बाद भी स्थितियों में तनिक भी परिवर्तन नहीं आया था। बल्कि राजनीति और अधिक भ्रष्ट हो गई थी। ऐसे में नागार्जुन जैसा संवेदनशील साहित्यकार कैसे इन स्थितियों से अछूता रह सकता था। वे स्वयं एक गरीब, निम्न-मध्यम-वर्गीय परिवार में पैदा हुए थे और अपने चारों ओर गरीबी , अपमान, दैन्य, विषमता में तड़पते किसानों, मजदूरों कों देखा था। अतः अमन और शान्ति की कविता न लिखना उनकी विवशता है। वे लिखते भी है-  

कैसे लिखूं शान्ति की कविता, 
अमन-चैन कों कैसे कड़ियों में बांधूं, 
मैं दरिद्र हूँ पुष्ट-पुष्ट की यह दरिद्रता 
कटहल के छिलके जैसी खुरदरी 
जीभ से मेरा लहू चाटती आई 
मैं न अकेला........... 
मुझ जैसे तो लाख लाख हैं, कोटि कोटि हैं।

हालांकि ऐसा नहीं है कि उन्होंने राग-बोध की कविताएँ नहीं लिखीं पर शोषण और अन्याय के प्रति विद्रोह और आम जन की पक्षधरिता उनके काव्य का मूल भाव है।
उन्होंने इतनी तीखी कविताएँ लिखीं कि व्यंग्य कहीं कहीं अतितीक्ष्ण बनकर औचित्य की सीमा का उल्लंघन कर बैठता है। जब चारों तरफ़ सामाजिक विसंगतियां हों वर्ग-भेद, वर्ग-शोषण, वर्ग संघर्ष अपने चरम पर हों तो उनकी कविताएँ भी कैसे सभ्रांत संस्कारों से आच्छादित हो सकती हैं। इसलिए उनकी कविता की भूमि ढोस खुरदरी है जो उनकी ठेठ 'आखिन देखी' की उपज है और ऐसे में उनकी तीखी नज़र से उपजा एकदम तीखा व्यंग्य यदि औचित्य की सीमा का अतिक्रमण भी कर जाता है तो वह हमें अखरना नहीं चाहिए। क्योंकि नागार्जुन एक ऐसी शख्सियत हैं जो एकदम कुंठारहित बेबाक शब्दों में बिना किसी डर के अपनी बात रखने की हिम्मत रखते हैं।
नागार्जुन का काव्य

नागार्जुन की कविताओं कों हम मुख्यतः चार श्रेणियों में रख सकते हैं। पहली, रागबोध की कविताएँ जिनमें प्रकृति-सौंदर्य और प्रेम कविताओं कों रखा जा सकता है। दूसरी, यथार्थपरक कविताएँ जिनमें सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक यथार्थ कों दर्शाती कविताएँ हैं। तीसरे, राष्ट्रीयता से युक्त कविताएँ और चौथे व्यंग्य प्रधान कविताएँ।


अब कल के खंड में नागार्जुन की राग-बोध की कविताओं पर चर्चा होगी। आपको बता दूँ कि अगर यह खंड न पढा तो आप बहुत पछताएंगे। इसलिए अपनी उपस्थिति दर्ज करना न भूलें. 

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर बधाई . आगे की कड़ी का इंतजार रहेगा .

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  2. प्रियवर सतीश चन्द्र सत्यार्थी जी!
    बाबा नागार्जुन का व्यक्तित्व तो इतनी विविधता लिए हुए हैं कि उनका बखान करना एक दुष्कर कार्य है।
    उनकी कृतियों को ही अगर देखें तो उनकी भाषा और शैली
    उनकी हर कविता तथा उपन्यास में भिन्नता लिए हुए होगी।
    संगोष्ठी में आप निर्भीकता से भाग लें।
    मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं।

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  3. बहुत ही अच्छा लगा, ब्चेनी से अगली कडी का इन्तजार..
    धन्यवाद

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  4. डॉ अंजना बक्शी10 मई 2011 को 12:13 pm बजे

    बाबा के व्यक्तित्व - कृतित्व के तमाम पहलुओ से मिलवाने का शुक्रिया .
    खूबसूरत ब्लॉग ...........ढेर सारी बधाई

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  5. धन्य वाद भाई जी .....
    यह हमारे लघु शोध पत्र ( Assignment ) बनाने में कितना काम आ रहा है.....
    पुन : धन्य वाद भाई..
    ध्रुव कुमार ( दि . वि .)

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