बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2009

बच्चों के साथ क्या "न" करें : कुछ मजेदार कार्टून







कुछ और रोचक तस्वीरें आप कल की पोस्ट में देख सकते हैं। The fun contd......................

आभार: ये सारी तस्वीरें David और Kelly Sopp की किताब
"Safe Baby Handling Tips" से ली गयी हैं। जब तस्वीरें आपको इतनी पसंद आई हैं तो सोचिए किताब कितनी पसंद आयेगी। आप इस किताब को Amazon पर खरीद सकते हैं।
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शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

कला क्या है

कितना दुःख वह शरीर जज़्ब कर सकता है ?
वह शरीर जिसके भीतर खुद शरीर की टूटन हो
मन की कितनी कचोट कुण्ठा के अर्थ समझ उनके द्वारा अमीर होता जा सकता है ?

अनुभव से समृद्ध होने की बात तुम मत करो
वह तो सिर्फ अद्वितीय जन ही हो सकते हैं
अद्वितीय याने जो मस्ती में रहते हैं चार पहर
केवल कभी चौंककर
अपने कुएँ में से झाँक लिया करते हैं
वह कुआँ जिसको हम लोग बुर्ज कहते हैं

अद्वितीय हर व्यक्ति जन्म से होता है
किन्तु जन्म के पीछे जीवन में जाने कितनों से यह
अद्वितीय होने का अधिकार
छीन लिया जाता है
और अद्वितीय फिर वे ही कहलाते हैं
जो जन के जीवन से अनजाने रहने में ही
रक्षित रहते हैं

अद्वितीय हर एक है मनुष्य
और उसका अधिकार अद्वितीय होने का छीनकर जो खुद को अद्वितीय कहते हैं
उनकी रचनाएँ हों या उनके हों विचार
पीड़ा के एक रसभीने अवलेह में लपेटकर
परसे जाते हैं तो उसे कला कहते हैं !

कला और क्या है सिवाय इस देह मन आत्मा के
बाकी समाज है
जिसको हम जानकर समझकर
बताते हैं औरो को, वे हमें बताते हैं

वे, जो प्रत्येक दिन चक्की में पिसने से करते हैं शुरू
और सोने को जाते हैं
क्योंकि यह व्यवस्था उन्हें मार ड़ालना नहीं चाहती
वे तीन तकलीफ़ों को जानकर
उनका वर्णन नहीं करते हैं
वही है कला उनकी
कम से कम कला है वह
और दूसरी जो है बहुत सी कला है वह

कला बदल सकती है क्या समाज ?
नहीं, जहाँ बहुत कला होगी, परिवर्तन नहीं होगा।

---------- --- रघुवीर सहाय (१९२९-१९९०) के 1984 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कविता संग्रह "लोग भूल गए हैं" से।

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

फॉरेन लैंगुएज में कैरियर बनाएं


किसी भाषा में दक्षता होना अच्छी जॉब प्राप्त करने में हमेशा सहायक होता है। पर किसी फॉरेन लैंगुएज का ज्ञान कैरियर की दौड़ में आपको भीड़ से बहुत आगे निकाल देता है। वैश्वीकरण के इस दौर में, जब हर क्षेत्र में अलग अलग देशों के लोगों के बीच सम्बन्ध बन रहे हैं, एक से अधिक भाषाएँ जानने वालों की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है। खासकर भारत में, जो की पूरी दुनिया की कंपनियों को अपनी सेवाएँ दे रहा है, अंगरेजी के साथ ही कोई अन्य भाषा भी जानने वाले लोगों के लिए अनगिनत अवसर हैं। आज न केवल रोज नई बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भारत आ रही हैं बल्कि भारतीय कम्पनियाँ भी विदेशों में अपनी व्यावसायिक शाखाएं खोल रही हैं। ऐसे में फ्रेंच, जर्मन, इटालियन, जापानीज, चायनीज, और कोरियन जैसी भाषाओं का ज्ञान पर्यटन, मनोरंजन, जनसंपर्क और जनसंचार, अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं, दूतावास, पब्लिशिंग, ट्रांसलेशन और इंटरप्रेटेशन जैसे क्षेत्रों में आपके कैरियर को एक नया आयाम दे सकता है।

फॉरेन लैंगुएज कोर्सेज और वांछित योग्यता
फॉरेन लैंगुएज में मुख्यतः तीन प्रकार के कोर्स उपलब्ध हैं - सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और डिग्री कोर्सेज। सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और एडवांस डिप्लोमा पार्ट टाइम कोर्स हैं और कई विश्विद्यालयों (जैसे - जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, बीएचयू, विश्वभारती आदि), विभिन्न देशों के सांस्कृतिक और शैक्षिक केन्द्रों (जैसे- मैक्समूलर भवन, अलायंस फ़्रैन्काइज आदि) और प्राइवेट संस्थानों द्वारा करवाए जाते हैं। ये एक-एक साल के कोर्स हैं जिनमें प्रयोगमूलक भाषा के शिक्षण पर जोर दिया जाता है। सर्टिफिकेट कोर्स के लिए न्यूनतम योग्यता १२वीं होती है जबकि डिप्लोमा के लिए उस भाषा में सर्टिफिकेट ज़रूरी होता है।

बीए, एम ए, एम फिल और पी एच डी जैसे कोर्स विश्विद्यालयों द्वारा करवाए जाते हैं जिनमें एडमिशन सामान्यतः प्रवेश परीक्षा के माध्यम से होता है। इन कोर्सेज में सिर्फ़ भाषा नहीं बल्कि सम्बंधित देश के इतिहास, भूगोल, समाज और साहित्य की भी जानकारी दी जाती है। भारत में जो विश्वविद्यालय फॉरेन लैंगुएज कोर्सेज ऑफर करते हैं उनमें मुख्य हैं - जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय , बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, विश्वभारती विश्वविद्यालय , पुणे विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय, बॉम्बे विश्वविद्यालय आदि।

जॉब प्रोस्पेक्ट्स और कैरियर ऑप्शन्स

विदेशी भाषा सीखने के बाद आप ट्रांसलेटर या इन्टरप्रेटर के रूप में फ्रीलांस तो काम कर ही सकते हैं साथ ही बहुर्राष्ट्रीय कंपनियों, सरकारी विभागों, दूतावासों आदि में स्थायी नौकरी भी प्राप्त कर सकते हैं. यूएनओ, वर्ल्ड बैंक, यूनिसेफ जैसे अंतर्राष्ट्रीय सगठनों में भी लैंगुएज एक्सपर्ट्स के लिए काफी जॉबस हैं. इंडिया में एचपी, ओरेकल, जीई, एल जी, सैमसंग, ह्युन्दाई आदि कम्पनियाँ हर साल भारी तादाद में भाषा विशेषज्ञों को रिक्रूट करती है. इसके अलावा पर्यटन और होटल इंडस्ट्री में भी अनगिनत अवसर हैं. आप इन्टरनेशनल मीडिया हाउसेस (प्रिंट, रेडियो या टीवी) में भी काम कर सकते हैं या फ़िर फिल्मों के लिए सबटाइटल लिख सकते हैं. इसके अलावा भारत में अभी लैंगुएज टीचर्स की भारी कमी है चाहे वो प्राइवेट संस्थान हों या सरकारी कॉलेज और यूनिवर्सिटीज. आने वाले समय में अधिकांश विश्वविद्यालन लैंगुएज कोर्सेज शुरू करने वाले हैं जिसके लिए भारे संख्या में शिक्षकों की आवश्यकता होगी.

जहाँ तक वेतनमान का प्रश्न है तो एक ट्रांसलेटर के रूप में आप ३ रु. - ६ रु. प्रति शब्द, इन्टरप्रेटर के रूप में २५०० रु. -१०००० रु. प्रतिदिन और परमानेंट प्रोफेशनल के रूप में २०००० रु. - ६०००० रु. तक की कमाई से शुरू कर सकते हैं. बाकी आपकी लैंगुएज एबिलिटी, कम्प्युटर ज्ञान आदि पर भी निर्भर करता है.

रविवार, 15 फ़रवरी 2009

ससुराल गेंदा फूल



मुझे याद है मैंने जब पहली बार देहली ६ के गाने "ससुराल गेंदा फूल" को सुना था तो मैं दो मिनट तक हंसता रहा था. हुआ ऐसा था की जेएनयू के जर्मन सेंटर के मेरे एक मित्र मेरे कमरे में बैठे हुए थे. बातें करते करते अचानक वो ये गाना गुनगुनाने लगे. कुछ तो गाने के शब्द ऐसे थे और कुछ उनका गाने का लहजा कि मुझे हंसी आ गयी. हंसी रुकने पर मैंने पूछा कि कोई नई भोजपुरी एल्बम ख़रीदी है क्या? एक्चुअली वो मित्र बिहार गया जिले से है और भोजपुरी गानों के शौकीन हैं. इसपर उनहोंने आश्चर्य से मुझसे पूछा कि आपने अभी तक ये गाना नहीं सुना है क्या? आजकल तो सभी एफएम चैनलों पर देहली ६ का यही गाना छाया हुआ है.

मैं तुंरत कम्प्युटर पर बैठा और इस गाने को डाउनलोड किया. जब सुना तो सचमुच मन खुश हो गया. गीत की लय लोकगीत जैसी है पर बीट्स क़दमों को थिरकने पर मजबूर कर देते हैं. ऐ आर रहमान साहब का संगीत सचमुच काबिले तारीफ़ है. गीत को रेखा भारद्वाज, श्रद्धा पंडित और सुजाता मजुमदार ने गाया भी बड़ी खूबसूरती से है. लेकिन सबसे अधिक प्रशंसा के पात्र हैं इस गीत के लेखक प्रसून जोशी. शब्दों के प्रयोग को देखकर गुलज़ार की याद हो आती है. प्रसून जोशी सचमुच दूर की रेस के घोडे हैं .

गीत के बोल कुछ इस तरह हैं :-

सास गारी देवे, देवर जी समझा लेवे
ससुराल गेंदा फूल
सैंया छेड़ देवें, ननद चुटकी लेवे
ससुराल गेंदा फूल


छोड़ा बाबुल का अंगना, भावे डेरा पिया का हो
सास गारी देवे, देवर समझा लेवे
ससुराल गेंदा फूल

सैंया है व्यापारी, चले हैं परदेश
सुरतिया निहारूं, जियरा भारी होवे
ससुराल गेंदा फूल


बुशर्ट पहनके, खाइके बीडा पान
पूरे रायपुर से अलग है, सैंया जी की शान
ससुराल गेंदा फूल


इस गीत में "ससुराल गेंदा फूल" का मतलब मैं नहीं समझ पाया. आपलोगों को कुछ समझ आए तो बताइयेगा.
ये हो सकता है कि नायिका का व्यापारी पति उसे छोड़कर परदेश चला गया है जिससे ससुराल गेंदा फूल की तरह हो गया है जिसमें सुन्दरता तो है लेकिन खुशबू नहीं है. सैंया के बिना ससुराल बिना खुशबू के फूल की तरह है.

और क्या अर्थ हो सकते हैं? आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा.

शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

जे एन यू में २००९-१० सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया शुरू

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में २००९-१० सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया शुरू हो गयी है | आवेदन पत्र प्राप्त करने की अन्तिम तिथि १६ मार्च है | डाक द्वारा आवेदन पत्र ६ मार्च तक प्राप्त किए जा सकते हैं | आवेदन पत्र जमा करने की अन्तिम तिथि भी १६ मार्च, २००९ है। विभिन्न कोर्सेज के लिए प्रवेश परीक्षा देश भर में १५ मई से १८ मई तक आयोजित की जायेगी। विशेष जानकारी के लिए जे एन यू की आधिकारिक वेबसाईट देखें ।

जे एन यू की परीक्षा अथवा प्रवेश प्रवेश प्रकिया के बारे में किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए आप निसंकोच मुझे लिख सकते हैं। मुझे आपकी मदद करने में खुशी होगी। विशेष रूप से School of Language, Literature and Culture Studies में BA (Foreign Language), फर्स्ट या सेकंड ईयर के लिए आवेदन करने वाले छात्र किसी भी समस्या के लिए लिखें। उनकी मैं विशेष मदद कर पाऊँगा क्योंकि मैं इसी केन्द्र का छात्र हूँ।

गुरुवार, 15 जनवरी 2009

जे एन यू में सार्वजनिक धूम्रपान पर वाइस चांसलर महोदय को मेरा पत्र

from Satish Chandra Satyarthi
to bbb@mail.jnu.ac.in,
vc@mail.jnu.ac.in
cc rp47@mail.jnu.ac.in,
rp47jnu@gmail.com,
rector_2@mail.jnu.ac.in
date Thu, Jan 15, 2009 at 3:06 AM
subject विश्वविद्यालय परिसर में सार्वजनिक धूम्रपान के बारे में शिकायत
mailed-by gmail.com



आदरणीय उप-कुलपति महोदय,
नमस्कार
मैं आपके ही विश्वविद्यालय का एक छात्र हूँ और एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय पर आपकी मदद चाहता हूँ|
जैसा कि आपको पता होगा कि सरकार द्वारा सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर रोक लगा दी गयी है और जहाँ तक मेरी समझ है, हमारा विश्वविद्यालय परिसर भी "सार्वजनिक स्थान" की परिभाषा के अन्दर आता है| इसके बावजूद भी हमारे कैम्पस में तम्बाकू- सिगरेट की दो दुकाने (एक विश्वविद्यालय स्वास्थय केन्द्र के पास और दूसरी गोदावरी बस स्टाप के पास) खुलेआम तम्बाकू- सिगरेट बेच रही हैं और लोग पूरे कैम्पस में धुंआ उडाते दिख जाते हैं चाहे वह बस स्टाप हो अथवा परिसर में बने ढाबे| यहाँ तक कि स्कूल भवनों के अन्दर बनी कैंटीनों के अन्दर भी लोग सिगरेट के कश लगाते रहते हैं | इससे धूम्रपान न करने वाले छात्रों को भी इसके दुष्परिणामों का शिकार होना पड़ रहा है | विडंबना तो यह है कि ये दोनों दुकानें विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा दिए गए लाइसेंस पर ऐसा गैरकानूनी कार्य कर रही हैं | और क्यूबा, गाजा, नंदीग्राम और न्यूक्लियर डील पर हाय तौबा मचाने वाले छात्र संघ के नेताओं की आँखे भी नाक के नीचे जारी इस अपराध पर बंद हैं | यह विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा छात्रों के स्वास्थय के साथ खिलवाड़ और धूम्रपान न करने वाले छात्रों के स्वच्छ हवा में साँस लेने के मानवाधिकार का हनन नहीं है?

स्वास्थय विभाग द्वारा जारी नोटिस में स्पष्ट कहा गया है कि संस्थान के प्रमुख की यह जिम्मेदारी है कि धूम्रपान कानून के उल्लंघन संबधी शिकायतों के निष्पादन की जिम्मेदारी एक अधिकारी को दी जाए और उनके संपर्क सूत्रों की सूचना हर जगह लगाई जाए, पर हमारे परिसर में तो "धूम्रपान निषेध" के बोर्ड भी एकाध जगहों पर ही दिखते हैं | क्या इस प्रकार हम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को एक "विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय" बनाने के स्वप्न को पूरा कर पाएंगे?

मैं श्रीमान से अनुरोध करता हूँ कि इस मामले को अतिशीघ्र संज्ञान में लें और इसपर त्वरित कार्रवाई करें |

आपका शिष्य

सतीश चंद्र सत्यार्थी
१२१, नर्मदा छात्रावास,
जे एन यू, नई दिल्ली - ६७


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Rector 2