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शुक्रवार, 13 मार्च 2009

मेरी पहली कविता - "कल शाम"

साहित्य पढने का शौक बचपन से ही रहा। लिखने की एक इच्छा भी मन में दबी रही, हमेशा। पर कभी कोशिश नहीं की, कुछ दोस्तों के मजाक उडाने के डर से और कुछ अपने आलस की वजह से। कभी कुछ छोटा-मोटा लिखा भी तो उसे पर्सनल डायरी की कैद से आजाद नहीं करा पाया। पहली बार साहस करके अपने ब्लॉग पर डाल रहा हूँ। अभी कल की लिखी कविता है। अब आप पूछेंगे की अचानक यह साहस कहाँ से आ गया तो इसका पूरा श्रेय जाता है हेम ज्योत्स्ना जी को जिन्होंने मेरे अन्तर में कैद एक छोटे से लेखक/कवि को बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया, इसका साहस दिया। अंत में एक बात और, अगर मेरी कविता में कुछ कमी या ग़लत महसूस हो तो कृपया निसंकोच मुझे बताएं। इससे मुझे अपने आपको बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। तो ये लीजिये आप सब सुधी जनों की अदालत में पेश है ये मेरी पहली अर्जी।

कल शाम


कल शाम

गिर के बिखर गए थे,
बालकनी में,
नीम के कुछ सूखे पत्ते
ज्यों तेरी खिलखिलाती हंसी

टटकी धूप की एक किरण
खिड़कियों से आकर, नींद में
छू गयी थी माथे को
ज्यों तेरा भींगा स्पर्श

दीवाल-घड़ी भी
गिर कर फर्श पर
ज़रा अटक गयी थी
ज्यों तेरे रूठने की अदा

छत की मुंडेर पर आकर
ठहर गयी थी,
इतराती सोंधी शाम
ज्यों तेरा खिड़की पे आके ठहर जाना

महुए के पीछे से चाँद, और
शाखों से लिपटी चांदनी ने
देखा था तिरछी नजरों से
ज्यों तेरा शोख निगाहों से देखना

सांझिल हवा का एक झोंका,
जबरन घुस आया था
कमरे में
ज्यों तुम्हारी याद.

कल शाम

~~~~~~~~~~ सतीश चंद्र सत्यार्थी

17 टिप्पणियां:

  1. सांझिल हवा का एक झोंका,
    जबरन घुस आया था
    कमरे में
    ज्यों तुम्हारी याद.
    अच्छी लगी आपकी यह रचना याद किसी की यूँ ही जबरन आ जाती है हम चाहे या न चाहे किसी भी बात से जुड़ के ....

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  2. uff kal shaam itnaa kuchh ho gaya aur mujhe abhee pata chal laanat hai mujh par. hujoor aap to sitam dhane lage hain, likhte rahein.

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  3. आप तो पहली ही बार में कड़ापा बरसा रहे हैं.
    इसी तरह लिखते रहिये

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  4. "महुए के पीछे से चाँद, और
    शाखों से लिपटी चांदनी ने
    देखा था तिरछी नजरों से
    ज्यों तेरा शोख निगाहों से देखना"

    बहुत अच्छा लिखा है.

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  5. प्रथम प्रयास सार्थक रहा आपका । कल्पनाशीलता को शब्द माध्यम से कविता रूपी जामा पहनाने में सफल रहे हैं । कहीं कही कविता शब्दों की वजह से कमजोर पड़ती दिख रही पर । सतीश भई इतने सुंदर भाव के सामने बहुत मामूली बात है । आप लिखते रहिये । शुभवर्तमान

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  6. बहुत अच्छा लिखा है । ब्लॉग को बहुत अच्छी तरह से विकसित और समृद्ध किया है । बढ़ते रहो ।

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  7. ख़ूबसूरत पंक्तियाँ.
    शुरुआत अच्छी है.

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  8. बहुत बढीया कविता, सायद लय नही है। पर नए तरह का कविता अच्छा लगा।

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  9. Ye kya likh rahe ho, yaar.
    mere khayaal se to galat kaam men haath aajmaa rahe ho.

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  10. कुछ शब्द उतरकर
    आसमां से
    बिखर गये कागज पर...
    औ’ रच गई कविता..
    यूँ, जैसे तेरी मुस्कान..

    कल शाम..



    -सही है..विशुद्ध भाव-जारी रहिये...बधाई!!

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  11. पहली कविता तो बड़ी खूबसूरत लिखी है आपने...चित्र उकेरती हुयी. शब्द बड़े अच्छे चुने हैं.

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  12. अरे भैया, पहली कविता ही इतनी गज़ब है तो आगे क्या होगा? बधाई!

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  13. पढ़ने ले नही लग रहा है कि किसी ने पहली बार कविता लिखी है । मुझे तो लगता है कि पहली कविता से ही आप कहर बरपाना शुरू कर दिये है । प्रयास कामयाब होगा । शुक्रिया

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  14. पढ़ने ले नही लग रहा है कि किसी ने पहली बार कविता लिखी है । मुझे तो लगता है कि पहली कविता से ही आप कहर बरपाना शुरू कर दिये है । प्रयास कामयाब होगा । शुक्रिया

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