शुक्रवार, 30 जनवरी 2009
जे एन यू में २००९-१० सत्र के लिए प्रवेश प्रक्रिया शुरू
जे एन यू की परीक्षा अथवा प्रवेश प्रवेश प्रकिया के बारे में किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए आप निसंकोच मुझे लिख सकते हैं। मुझे आपकी मदद करने में खुशी होगी। विशेष रूप से School of Language, Literature and Culture Studies में BA (Foreign Language), फर्स्ट या सेकंड ईयर के लिए आवेदन करने वाले छात्र किसी भी समस्या के लिए लिखें। उनकी मैं विशेष मदद कर पाऊँगा क्योंकि मैं इसी केन्द्र का छात्र हूँ।
गुरुवार, 15 जनवरी 2009
जे एन यू में सार्वजनिक धूम्रपान पर वाइस चांसलर महोदय को मेरा पत्र
to bbb@mail.jnu.ac.in,
vc@mail.jnu.ac.in
cc rp47@mail.jnu.ac.in,
rp47jnu@gmail.com,
rector_2@mail.jnu.ac.in
date Thu, Jan 15, 2009 at 3:06 AM
subject विश्वविद्यालय परिसर में सार्वजनिक धूम्रपान के बारे में शिकायत
mailed-by gmail.com
आपका शिष्य
सतीश चंद्र सत्यार्थी
१२१, नर्मदा छात्रावास,
जे एन यू, नई दिल्ली - ६७
Copy To: Rector 1
Rector 2
गुरुवार, 4 दिसंबर 2008
गोबर छात्रों के लिए एक्जाम हॉल में करने लायक १७ रोचक काम
विद्यार्थियों के सामने ऐसी नौबत कई बार आती है कि आपको पहले से पता होता है कि इस एक्जाम में आप पहले से फ़ेल हैं और उसमें अपीयर होने या न होने से कई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है। ऐसा कई स्थितियों में हो सकता है - या तो आपकी अटेंडेंस कम हो, या पिछले एक्जाम्स में फ़ेल हों या तैयारी बिलकुल ही न हो। ऐसे में एक्जाम को स्किप मत करें बल्कि उसे मनोरंजन के एक साधन के रूप में इस्तेमाल करें।
ऐसी स्थिति में एक्जाम हॉल में करने लायक १७ रोचक चीजें :-
१. अपने साथ एक तकिया लाएं और एक्जाम हॉल में सो जाएं। एक्जाम खत्म होने के १५ मिनट पहले उठ जाएं और कहें,"अरे! अब शुरु करना चाहिये"। कॉपी पर कुछ कूड़ा कचड़ा लिख कर एक्जाम खत्म होने से पांच मिनट पहले कॉपी जमा कर के निकल जाएं। इससे क्लास में एक मेधावी छात्र के रूप में आपका वजन बढ़ेगा।
२. अगर मैथ या साइंस का एक्जाम है तो निबंध के रूप में उत्तर दें। अगर आर्ट्स/सोशल साइंस का पेपर हो तो संख्याओं, संकेतों और फ़ार्मूलों में उत्तर दें। कुछ क्रियेटिव करें। इंटीग्रेशन और डिफ़रेन्शिएशन के सिंबल्स यूज करें।
३. क्वेश्चन पेपर से हवाई जहाज बनाएं और निरीक्षक की नाक के बाएं सुराख पर निशाना लगाएं।
४. साथ में चीयर करने के लिए कुछ मित्रों को भी लायें। उन्हें एक्जाम हॉल से बाहर खड़ा करें।
५. क्वेश्चन्स को ज़ोर ज़ोर से पढ़ें और खुद से ही तर्क दे देकर बहस भी करें।
६. पेपर मिलने के ५ मिनट के बाद उठकर निरीक्षक को बुलाकर जोर जोर से चिल्लाने लगें, "ये पेपर है या नाटक है। कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है जबकि मैंने सारी क्लासें अटेंड की है। और आप हैं कौन? वो रेगुलर वाले टीचर कहां गये जिनके कानों में बाल थे।"
६. कॉपी में हर सवाल के आगे कोई कारण लिखें कि आप उस सवाल का उत्तर क्यों नहीं दे सकते; जैसे कि यह सवाल मेरी धार्मिक भावनाओं के खिलाफ़ है।
७. वीडियो गेम्स लेकर आयें और फ़ुल वोल्युम पर खेलें। पालतू जानवर लायें तो और भी अच्छा है।
८. आंसर शीट में कलर पेंसिल्स, क्रेयॉन्स, पेन्ट और खुशबूदार मार्कर्स से लिखें।
९. चप्पल, पगड़ी और तौलिया पहन कर आयें।
१०. पूरा पेपर किसी और भाषा (जैसे चाइनीज य कोरियन) में लिखें और अगर कोई और भाषा नहीं आती तो एक नई भाषा बना दें। गणित के एक्जाम में हमेशा रोमन नम्बर्स यूज करें।
११. निरीक्षक पर निशाना लगाकर कंकड़ फ़ेंकें और बगल वाले पर इल्ज़ाम लगाएं।
१२. जैसे ही पेपर मिले उसे चबा जाएं और हंसने लगें।
१३. एक्जाम शुरू होने के आधे घंटे बाद ही पेपर जमा करने के लिए खड़े हो जायें। एक्जामिनर के यह कहने पर कि, आधा घंटा और वेट करें, बैठ जाएं। बार बार अंगड़ाई लें और दूसरे परिक्षार्थियों को यह कहकर कोसें कि कैसे कैसे कूढ़-मगज पड़े हुए हैं; इतने ईजी पेपर में इतनी देर लगा रहे हैं। ध्यान रखें: अपनी कॉपी खोलकर दिखाने से इनकार कर दें।
१४. अपने साथ एक मुकुट लेकर आयें। बीच बीच में मुकुट पहन कर खड़े हो जायें और कहें,"मैं हूं आज का अर्जुन!"
१५. एक्जाम के दौरान धीरे धीरे "मह्बूबा ओ मह्बूबा...." गुनगुनाते रहें। टीचर के कहने पर भी बन्द न करें। जब आपको जबर्दस्ती बाहर निकाला जाये तो "मस्त बहारों का मैं आशिक......" गाते हुए निकल जायें।
१६. अपने साथ किसी देवी-देवता की छोटी सी मूर्ति लेकर आयें और उसे अपने आगे डेस्क पर रखें। बीच बीच में उसकी पूजा-प्रार्थना करें; हो सके तो अगरबत्ती और कुछ पूजन सामग्री भी लायें।
१७.आंसर शीट के साथ किसी अन्य विषय के नोट्स अटैच कर दे (जैसे हिस्ट्री के पेपर में कैल्कुलस के नोट्स) और आंसर शीट में कमेंट लिख दें,"ज़रूरत के अनुसार रिफ़रेंस के लिए अटैच्ड नोट्स देखें"।
बुधवार, 3 दिसंबर 2008
टोबा टेक सिंह -- सआदत हसन मंटो
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बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्लाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान पागल हिन्दुस्तान के पागलखानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाय और जो हिन्दू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में है उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाय।
मालूम नहीं यह बात माकूल थी या गैर-माकूल थी। बहरहाल, दानिशमंदों के फैसले के मुताबिक इधर-उधर ऊँची सतह की कांफ्रेंसें हुई और िदन आखिर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुकर्रर हो गया। अच्छी तरह छान बीन की गयी। वो मुसलमान पागल जिनके लवाहिकीन (सम्बन्धी ) हिन्दुस्तान ही में थे वहीं रहने दिये गये थे। बाकी जो थे उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया। यहां पाकिस्तान में चूंकि करीब-करीब तमाम हिन्दु सिख जा चुके थे इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिन्दू-सिख पागल थे सबके सब पुलिस की हिफाजत में सरहद पर पहुंचा दिये गये।
उधर का मालूम नहीं। लेकिन इधर लाहौर के पागलखानों में जब इस तबादले की खबर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चीमेगोइयां होने लगी। एक मुसलमान पागल जो बारह बरस से हर रोज बाकायदगी के साथ जमींदार पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा-
-- मोल्हीसाब। ये पाकिस्तान क्या होता है ?
तो उसने बड़े गौरो फिक्र के बाद जवाब दिया-
-- हिन्दुस्तान में एक ऐसी जगह है जहां उस्तरे बनते हैं।
ये जवाब सुनकर उसका दोस्त मुतमइन हो गया।
इसी तरह एक और सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा--
-- सरदार जी हमें हिन्दुस्तान क्यों भेजा जा रहा है - हमें तो वहां की बोली नहीं आती।
दूसरा मुस्कराया-
-- मुझे तो हिन्दुस्तान की बोली आती है - हिन्दुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ -आकड़ फिरते हैं।
एक मुसलमान पागल ने नहाते-नहाते 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' का नारा इस जोर से बुलन्द किया कि फर्श पर फिसल कर गिरा और बेहोश हो गया।
बाज पागल ऐसे थे जो पागल नहीं थे। उनमें अकसरियत ऐसे कातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफसरों को दे- दिलाकर पागलखाने भिजवा दिया था कि फांसी के फंदे से बच जायें। ये कुछ-कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान क्या तकसीम हुआ और यह पाकिस्तान क्या है, लेकिन सही वाकेआत से ये भी बेखबर थे। अखबारों से कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे। उनकी गुफ्तगू (बातचीत) से भी वो कोई नतीजा बरआमद नहीं कर सकते थे। उनको सिर्फ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्ना है, जिसको कायदे आजम कहते हैं। उसने मुसलमानों के लिए एक अलाहेदा मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्तान है। यह कहां है ?इसका महल-ए-वकू (स्थल) क्या है इसके मुतअल्लिक वह कुछ नहीं जानते थे। यही वजह है कि पागल खाने में वो सब पागल जिनका दिमाग पूरी तरह माउफ नहीं हुआ था, इस मखमसे में गिरफ्तार थे कि वो पाकिस्तान में हैं या हिन्दुस्तान में। अगर हिन्दुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है। अगर वो पाकिस्तान में है तो ये कैसे हो सकता है कि वो कुछ अरसा पहले यहां रहते हुए भी हिन्दुस्तान में थे। एक पागल तो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान, और हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ्तार हुआ कि और ज्यादा पागल हो गया। झाडू देते-देते एक दिन दरख्त पर चढ़ गया और टहनी पर बैठ कर दो घंटे मुस्तकिल तकरीर करता रहा, जो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के नाजुक मसअले पर थी। सिपाहियों ने उसे नीचे उतरने को कहा तो वो और ऊपर चढ़ गया। डराया, धमकाया गया तो उसने कहा-
-- मैं न हिन्दुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में। मैं इस दरख्त पर ही रहूंगा।
एक एम. एससी. पास रेडियो इंजीनियर में, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिल्कुल अलग-थलग, बाग की एक खास रविश (क्यारी) पर सारा दिन खामोश टहलता रहता था, यह तब्दीली नमूदार हुई कि उसने तमाम कपड़े उतारकर दफादार के हवाले कर दिये और नंगधंडंग़ सारे बाग में चलना शुरू कर दिया।
यन्यूट के एक मौटे मुसलमान पागल ने, जो मुस्लिम लीग का एक सरगर्म कारकुन था और दिन में पन्द्रह-सोलह मरतबा नहाता था, यकलख्त (एकदम) यह आदत तर्क (छोड़)कर दी। उसका नाम मुहम्मद अली था। चुनांचे उसने एक दिन अपने जिंगले में ऐलान कर दिया कि वह कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना है। उसकी देखादेखी एक सिख पागल मास्टर तारासिंह बन गया। करीब था कि उस जिंगले में खून-खराबा हो जाय, मगर दोनों को खतरनाग पागल करार देकर अलहदा-अलहदा बन्द कर दिया गया।
लाहौर का एक नौजवान हिन्दू वकील था जो मुहब्बत में मुब्तिला होकर पागल हो गया था। जब उसने सुना कि अमृतसर हिन्दुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुख हुआ। इसी शहर की एक हिन्दू लड़की से उसे मुहब्बत हो गयी थी। गो उसने इस वकील को ठुकरा दिया था, मगर दीवानगी की हालत में भी वह उसको नहीं भूला था। चुनांचे वह उन तमाम मुस्लिम लीडरों को गालियां देता था, जिन्होंने मिल मिलाकर हिन्दुस्तान के दो टुकड़े कर दिये-- उसकी महबूबा हिन्दुस्तानी बन गयी और वह पाकिस्तानी।
जब तबादले की बात शुरू हुई तो वकील को कई पागलों ने समझाया कि वह दिल बुरा न करे,उसको हिन्दुस्तान वापस भेज दिया जायेगा। उस हिन्दुस्तान में जहां उसकी महबूबा रहती है। मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था-- इस ख्याल से कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी।
यूरोपियन वार्ड में दो एंग्लो-इण्डियन पागल थे। उनको जब मालूम हुआ कि हिन्दुस्तान को आजाद करके अंग्रेज चले गये हैं तो उनको बहुत रंज हुआ। वह छुप-छुप कर इस मसअले पर गुफ्तगू करते रहते कि पागलखने में उनकी हैसियत क्या होगी। यूरापियन वार्ड रहेगा या उड़ जायगा। ब्रेकफास्ट मिलेगा या नहीं। क्या उन्हें डबलरोटी के बजाय ब्लडी इण्डियन चपाती तो जहरमार नहीं करनी पड़ेगी ?
एक सिख था जिसको पागलखाने में दाखिल हुए पन्द्रह बरस हो चुके थे। हर वक्त उसकी जबान पर अजीबोगरीब अल्फाज सुनने में आते थे, 'ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी बाल आफ दी लालटेन।' वो न दिन में सोता था न रात में। पहरेदारों का कहना था कि पन्द्रह बरस के तवील अर्से में एक एक लम्हे के लिए भी नहीं सोया। लेटा भी नहीं था। अलबना किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था।
हर वक्त खड़ा रहने से उसके पांव सूज गये थे। पिंडलियां भी फूल गयीं थीं। मगर इस जिस्मानी तकलीफ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुतअिल्लक जब कभी पागलखाने में गुफ्तगू होती थी तो वह गौर से सुनता था। कोई उससे पूछता कि उसका क्या खयाल है तो बड़ी संजीदगी से जवाब देता, 'ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट।'
लेकिन बाद में आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट की जगह आफ दी टोबा टेकसिंह गवर्नमेंट ने ले ली और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है जहां का वो रहने वाला है। लेकिन किसी को भी नहीं मालूम था कि वो पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में। जो यह बताने की कोशिश करते थे वो खुद इस उलझाव में गिरफ्तार हो जाते थे कि स्याल कोटा पहले हिन्दुस्तान में होता था, पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है। क्या पता है कि लाहौर जो अब पाकिस्तान में है कल हिन्दुस्तान में चला जायगा या सारा हिन्दुस्तान हीं पाकिस्तान बन जायेगा। और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता था कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों किसी दिन सिरे से गायब नहीं हो जायेंगे।
उस सिख पागल के केस छिदरे होके बहुत मुख्तसर रह गये थे। चूंकि वह बहुत कम नहाता था इसलिए दाढ़ी और बाल आपस में जम गये थे जिनके बाइस (कारण) उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गयी थी। मगर आदमी बेजरर (अहानिकारक) था। पन्द्रह बरसों में उसने किसी से झगड़ा-फसाद नहीं किया था। पागलखाने के जो पुराने मुलाजिम थे वो उसके मुतअलिक इतना जानते थे कि टोबा टेकसिंह में उसकी कई जमीनें थीं। अच्छा खाता-पीता जमींदार था कि अचानक दिमाग उलट गया। उसके रिश्तेदार लोहे की मोटी-मोटी जंजीरों में उसे बांधकर लाये और पागलखाने में दाखिल करा गये।
महीने में एक बार मुलाकात के लिए ये लोग आते थे और उसकी खैर-खैरियत दरयाफ्त करके चले जाते थे। एक मुप्त तक ये सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान हिन्दुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उनका आना बन्द हो गया।
उसका नाम बिशन सिंह था। मगर सब उसे टोबा टेकसिंह कहते थे। उसको ये मालूम नहीं था कि दिन कौन-सा है, महीना कौन-सा है या कितने दिन बीत चुके हैं। लेकिन हर महीने जब उसके अजीज व अकारिब (सम्बन्धी) उससे मिलने के लिए आते तो उसे अपने आप पता चल जाता था। चुनांचे वो दफादार से कहता कि उसकी मुलाकात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर खूब साबुन घिसता और सिर में तेल लगाकर कंघा करता। अपने कपड़े जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवा के पहनता और यूं सज-बन कर मिलने वालों के पास आता। वो उससे कुछ पूछते तो वह खामोश रहता या कभी-कभार 'ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी वेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी लालटेन ' कह देता। उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक उंगली बढ़ती-बढ़ती पन्द्रह बरसों में जवान हो गयी थी। बिशन सिंह उसको पहचानता ही नहीं था। वह बच्ची थी जब भी आपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आंख में आंसू बहते थे।पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का किस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है। जब इत्मीनान बख्श (सन्तोषजनक) जवाब न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब- दिन बढ़ती गयी। अब मुलाकात नहीं आती है। पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलने वाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज भी बन्द हो गयी थी जो उसे उनकी आमद की खबर दे दिया करती थी।
उसकी बड़ी ख्वाहिश थी कि वो लोग आयें जो उससे हमदर्दी का इजहार करते थे ओर उसके लिए फल, मिठाइयां और कपड़े लाते थे। वो उनसे अगर पूछता कि टोबा टेकसिंह कहां है तो यकीनन वो उसे बता देते कि पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में, क्योंकि उसका ख्याल था कि वो टोबा टेकसिंह ही से आते हैं जहां उसकी जमीनें हैं।
पागलखाने में एक पागल ऐसा भी था जो खुद को खुदा कहता था। उससे जब एक दिन बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेकसिंह पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में तो उसने हस्बेआदत (आदत के अनुसार) कहकहा लगाया और कहा--
-- वो न पाकिस्तान में है न हिन्दुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म नहीं लगाया।
बिशन सिंह ने इस खुदा से कई मरतबा बड़ी मिन्नत समाजत से कहा कि वो हुक्म दे दे ताकि झंझट खत्म हो, मगर वो बहुत मसरूफ था, इसलिए कि उसे ओर बेशुमार हुक्म देने थे। एक दिन तंग आकर वह उस पर बरस पड़ा, 'ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ वाहे गुरूजी दा खलसा एन्ड वाहे गुरूजी की फतह। जो बोले सो निहाल सत सिरी अकाल।' उसका शायद यह मतलब था कि तुम मुसलमान के खुदा हो, सिखों के खुदा होते तो जरूर मेरी सुनते। तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेकसिंह का एक मुसलमान दोस्त मुलाकात के लिए आया। पहले वह कभी नहीं आया था। जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ हट गया और वापस आने लगा मगर सिपाहियों ने उसे रोका-- -- ये तुमसे मिलने आया है - तुम्हारा दोस्त फजलदीन है।
बिशन सिंह ने फजलदीन को देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फजलदीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा।
-- मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूं लेकिन फुर्सत ही न मिली। तुम्हारे सब आदमी खैरियत से चले गये थे मुझसे जितनी मदद हो सकी मैने की। तुम्हारी बेटी रूप कौर...। वह कुछ कहते कहते रूक गया । बिशन सिंह कुछ याद करने लगा --
-- बेटी रूप कौर ।
फजलदीन ने रूक कर कहा-
-- हां वह भी ठीक ठाक है। उनके साथ ही चली गयी थी।
बिशन सिंह खामोश रहा। फजलदीन ने कहना शुरू किया-
-- उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम्हारी खैर-खैरियत पूछता रहूं। अब मैंने सुना है कि तुम हिन्दुस्तान जा रहे हो। भाई बलबीर सिंह और भाई बिधावा सिंह से सलाम कहना-- और बहन अमृत कौर से भी। भाई बलबीर से कहना फजलदीन राजी-खुशी है। वो भूरी भैंसे जो वो छोड़ गये थे उनमें से एक ने कट्टा दिया है दूसरी के कट्टी हुई थी पर वो छ: दिन की हो के मर गयी और और मेरे लायक जो खिदमत हो कहना, मै। हर वक्त तैयार हूं और ये तुम्हारे लिए थोड़े से मरून्डे लाया हूं।
बिशन सिंह ने मरून्डे की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फजलदीन से पूछा- -- टोबा टेकसिंह कहां है?
--टोबा टेकसिंह... उसने कद्रे हैरत से कहा-- कहां है! वहीं है, जहां था।
बिशन सिंह ने पूछा-- पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में?
--हिन्दुस्तान में...। नहीं-नहीं पाकिस्तान में...।
फजलदीन बौखला-सा गया। बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया-- ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान एन्ड हिन्दुस्तान आफ दी हए फिटे मुंह।
तबादले की तैयारियां मुकम्मल हो चुकी थीं। इधर से उधर और उधर से इधर आने वाले पागलों की फेहरिस्तें (सूचियां) पहुंच गयी थीं, तबादले का दिन भी मुकरर्र हो गया था। सख्त सर्दियां थीं। जब लाहौर के पागलखाने से हिन्दू-सिख पागलों से भरी हुई लारियां पुलिस के मुहाफिज दस्ते के साथ् रवाना हुई तो मुतअल्लिका (संबंधित ) अफसर भी हमराह थे। वाहगा के बार्डर पर तरफैन के (दोनों तरफ से) सुपरिटेंडेंट एक दूसरे से मिले और इब्तेदाई कार्रवाई खत्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया जो रात भर जारी रहा।
पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफसरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था। बाज तो बाहर निकलते ही नहीं थे। जो निकलने पर रजामन्द होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था क्योंकि इधर-उधर भाग उठते थे। जो नंगे थे उनको कपड़े पहनाये जाते, तो वो फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते क़ोई गालियां बक रहा है, कोई गा रहा है। आपस में लड़-झगड़ रहे हैं, रो रहे हैं, बक रहे हैं। कान पड़ी आवाज सुनायी नही देती थी-- पागल औरतों का शेरोगोगा अलग था और सर्दी इतने कड़ाके की थी कि दांत बज रहे थे।
पागलों की अकसरियत इस तबादले के हक में नहीं थी। इसलिए कि उनकी समझ में आता था कि उन्हें अपनी जगह से उखाड़कर कहां फेंका जा रहा है। चन्द जो कुछ सोच रहे थे-- 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' के नारे लगा रहे थे। दो-तीन मरतबा फसाद होते-होते बचा, क्योंकि बाज मुसलमान और सिखों को ये नारे सुनकर तैश आ गया।
जब बिशन सिंह की बारी आयी ओर वाहगा के उस पार मुतअल्लका अफसर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा-- टोबा टेकसिंह कहां है? पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में? -मुतअल्लका अफसर हंसा--पाकिस्तान में।
यह सुनकर विशनसिंह उछलकर एक तरफ हटा और दौड़कर अपने बाकी मांदा साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ ले जाने लगे। मगर उसने चलने से इन्कार कर दिया, और जोर-जोर से चिल्लाने लगा--टोबा टेकसिंह कहां है ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी टोबा टेकसिंह एन्ड पाकिस्तान।
उसे बहुत समझाया गया कि देखों अब टोबा टेकसिंह हिन्दुस्तान में चला गया है। अगर नहीं गया तो उसे फौरन वहां भेज दिया जायगा। मगर वो न माना। जब उसको जबरदस्ती दूसरी तरफ ले जाने की कोशिश की गयी तो वह दरम्यान में एक जगह इस अन्दाज में अपनी सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे वहां से कोई ताकत नहीं हटा सकेगी।
आदमी चूंकि बेजरर था इसलिए उससे मजीद जबरदस्ती न की गयी। उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया और बाकी काम होता रहा। सूरज निकलने से पहले साकित व साकिन (शान्त) बिशनसिंह हलक से एक फलक शगाफ (आसमान को फाड़ देने वाली ) चीख निकली -- इधर-उधर से कई अफसर दौड़ आये औ
र देखा कि वो आदमी जो पन्द्रह बरस तक दिन-रात अपनी टांगों पर खड़ा रहा, औंधे मुंह लेटा था। उधर खारदार तारों के पीछे हिन्दुस्तान था-- इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान। दरमियान में जमीन के इस टुकड़े पर, जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेकसिंह पड़ा था।
स्त्री देह - पाब्लो नेरूदा की कलम से

स्त्री देह, सफ़ेद पहाड़ियाँ, उजली रानें
तुम बिल्कुल वैसी दिखती हो जैसी यह दुनिया
समर्पण में लेटी--
मेरी रूखी किसान देह धँसती है तुममें
और धरती की गहराई से लेती एक वंशवृक्षी उछाल ।
अकेला था मैं एक सुरंग की तरह, पक्षी भरते उड़ान मुझ में
रात मुझे जलमग्न कर देती अपने परास्त कर देने वाले हमले से
ख़ुद को बचाने के वास्ते एक हथियार की तरह गढ़ा मैंने तुम्हें,
एक तीर की तरह मेरे धनुष में, एक पत्थर जैसे गुलेल में
गिरता है प्रतिशोध का समय लेकिन, और मैं तुझे प्यार करता हूँ
चिकनी हरी काई की रपटीली त्वचा का, यह ठोस बेचैन जिस्म दुहता हूँ मैं
ओह ! ये गोलक वक्ष के, ओह ! ये कहीं खोई-सी आँखें,
ओह ! ये गुलाब तरुणाई के, ओह ! तुम्हारी आवाज़ धीमी और उदास !
ओ मेरी प्रिया-देह ! मैं तेरी कृपा में बना रहूंगा
मेरी प्यास, मेरी अन्तहीन इच्छाएँ, ये बदलते हुए राजमार्ग !
उदास नदी-तालों से बहती सतत प्यास और पीछे हो लेती थकान,
और यह असीम पीड़ा !
सोमवार, 24 नवंबर 2008
नकलची विद्यार्थियों के लिए खुशखबरी
उन विद्यार्थियों कि मदद के लिए या यों कहें कि उनके आन्दोलन को अपना "समर्थन" देने के लिए एक बहुत हे रोचक लेख लिख रहा हूँ। जल्द ही आपके सामने आयेगा।
तब तक इंतजार का आनंद लीजिये
शनिवार, 15 नवंबर 2008
मुझे इन चाटों से बचाओ - जे एन यू
सबसे पहले "चाट" शब्द पर थोड़ा प्रकाश डालना या यूं कहें कि इसका स्पष्टीकरण देना ज़रूरी है। वर्ना कुछ लोग इसे अंग्रेजी वाले "चैट" का हिन्दी रुपन्तरण अथवा चाट-पकौड़े वाली चाट समझने की भूल भी कर सकते हैं। अब हर किसी को अपने जितना अकलमंद तो नहीं समझ सकते न! हां तो, यहां चाट शब्द "चाटना" क्रिया से बना है; लेकिन वो "लिक" वाला चाटना नहीं। इसका सीधा मतलब है किसी को जबर्दस्ती भाषण (बकवास) पिला पिला कर बोर करना। यह चाट प्रजाति हर जगह पाई जाती है; चाहे गली-मुहल्ला हो, ऑफ़िस हो या फ़िर स्कूल कॉलेज। इन्हें यह भ्रम होता है कि ये अरस्तू और सुकरात से भी बड़े विचारक और विवेकानन्द से भी बड़े वक्ता हैं। ये दुनिया के अज्ञानियों को ज्ञान बांटना अपना कर्तव्य या यों कहें कि अधिकार समझते हैं। इन्हें लगता है कि इनके वचनामृत सुनकर लोग लोग धन्य हो जाएंगे।
हमारे जे एन यू में चाटों की एक दीर्घकालीन परंपरा रही है। यहां पाये जाने वाले चाटों की मुख्य किस्में इस प्रकार हैं:-
हल्का चाट :- ये आमतौर पर नये या फ़िर चाट विद्या में मंदबुद्धि चाट होते हैं। ये चाटते कम हैं और बदनाम ज्यादा होते हैं। ये अगर रास्ते में मिल जायें तो आठ-दस फ़ालतू के सवाल चेंप देंगे। सवालों की प्रकृति बड़ी निर्दोष किस्म की होगी; जैसे "हॉस्टल से आ रहे हैं क्या?" (और क्या किताबें लेके काशी से आऊंगा), "अभी आ रहा था तो रास्ते में आपके क्लास का एक लड़का दिखा था" (तो मैं क्या करूं) इत्यादि। आपको चिढ़ बहुत आयेगी मगर जवाब तो देना ही पड़ेगा। इन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि आप क्लास के लिए लेट हो रहे हैं या आपका एक्जाम छूट रहा है। हां, एक बात और, ये दिन में जितनी बार आपसे मिलेंगे उतनी बार हाथ मिलाएंगे और "कैसे हैं" इस मुद्रा में पुछेंगे जैसे वर्षों के बिछुड़े भाई मिलें हों।
कड़ा चाट :- ऐसे चाटों का मानना होता है कि अवसर का इंतजार मत करो बल्कि उसे तलाशो। इनके अनुसार तसल्ली से बातचीत तो कमरे पर ही हो सकती है, इसलिए ये सीधे आपके कमरे पर ही पधारते हैं। पधारने का समय ऐसा अनुकूल होता है कि आप कोई बहाना बनाकर छूट भी नहीं सकते; जैसे, जब आप लंच के बाद सोने के लिए बिस्तर पर बस लेटने ही वाले हों या फ़िर छुट्टी का दिन हो और आप कमरे में पायजामा और बनियान में आराम से अखबार वगैरह पढ़ रहे हों। ये आते ही पहला वाक्य बोलेंगे "अरे, आपको फ़ालतू डिस्टर्ब किया। दर असल कमरे में बैठकर बोर हो रहा था। अब हॉस्टल में दो-चार बातें करने लायक आदमी ही कितने हैं (आप जैसे बेवकूफ़ को छोड़कर)।" और आप फ़ॉर्मलिटी निभाते हुए कहेंगे "अरे नहीं, अच्छे आये; मैं भी बोर ही हो रहा था"। इसके बाद उनका चाट भाषण शुरू होगा। बिषय उनके ही महान जीवन से जुड़े होंगे; जैसे, कैसे उनके फलाना शिक्षक के एक्जाम में सारे प्रश्न सही करने के बाद भी (*गाली*) शिक्षक ने फ़ेल कर दिया या फ़िर कैसे गांव मे उन्होंने दारोगा पर गोली चला दी इत्यादि। आप ये सोच कर अनमने ढंग से सिर्फ़ "हाँ", "हूँ" करते रहेंगे कि मेरा ज्यादा इंटरेस्ट नहीं देखकर ये जल्दी चला जायेगा। लेकिन वो चाट ही क्या जो इतनी जल्दी हार मान ले। आखिरकार आप ऊब कर कहेंगे,"चलिये, गंगा ढाबे पर चाय पीकर आते हैं"। ये सोचकर कि शायद ये महाशय चाय पीकर उधर से ही अपने कमरे में चले जायेंगे। इसी सुखद कल्पना में चाय और पकौड़े के पैसे भी आप ही दे देंगे। लेकिन आप यह देखकर सर पीट लेंगे कि श्रीमान आपके साथ-साथ ही वापस आपके कमरे का रुख करते हैं।
राजनीतिक चाट :- ये किसी छात्र संगठन से जुड़े होते हैं । इनको आप हुलिये से भी पह्चान सकते हैं: बढी हुई दाढ़ी, कंधे पर झोला और पैरों में हवाई चप्पल। ऐसा लगेगा सारी दुनिया को बदलने का जिम्मेदारी इन्ही के कंधों पर है। ये अपको कैंपस में यहां-वहां भटकते हुए, ढाबों पर (शिकार की तलाश में) अथवा किसी धरना, प्रदर्शन या भूख हड़ताल में दिख जाएंगे। इनका भाषण रेडिमेड होता है और मौका देखते ही न्यूक्लियर डील, आतंकवाद, या बम विस्फ़ोटों के ऊपर आधे पौन घंटे का भाषण पेल देंगे। ये छोटी से छोटी बात को भी इतने जोरदार और उत्तेजक तरीके से बोलेंगे कि अपको लगेगा कि शायद तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ गया है। उदाहरण के लिए किसी लड़के ने चलती बस से थूक दिया और वो गलती से किसी पर पड़ गया । इसपर उनका भाषण होगा,"यह कोई छोटी घटना नहीं है, आप इसकी गहराई में जाएं तो यह समाजवादी आंदोलन को धूमिल करने और कुचलने की कोशिश है। यहां बस पर बैठा छात्र पूंजीवाद का प्रतीक है और फ़ूटपाथी विद्यार्थी समाजवाद और प्रगतिशील विचरधारा का। हमारी जे एन यू प्रशासन से माँग है कि (क) इस मामले की जांच के लिए एक उच्च्स्तरीय कमिटी बनाई जाए, (ख) पीड़ित छात्र को अगली दो परीक्षाओं में बिना बैठे ही पास कर दिया जाये और (ग) कैम्पस मे थूक फेंकने वालों (खासकर बस से) पर पोटा और मकोका के तहत मुकदमा चलाया जाए। हमारी पार्टी यह भी चाहेगी की पूरे देश में इस मुद्दे एक सार्थक बहस हो। आज शाम इसी मुद्दे पर हम माही हॉस्टल मेस मे एक मीटिंग कर रहे हैं जिसमें हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष फलानाप्रसाद डिमकानादास भी आ रहे हैं। आपको ज़रूर आना है (यह वाक्य वो इस तरह से बोलेगा कि आपको लगेगा कि आपके बिना उनकी पार्टी और आंदोलन चल ही नहीं पाएंगे)।" अब इतने ज़बर्दस्त तरीके से चाटे जाने के बाद भी अगर आप उनकी मीटिंग में सोच रहे हैं तो मैं आपकी "झेलू" प्रतिभा को प्रणाम करता हूं। राजनीतिक चाटों से पिंड छुड़ाना भी उतना ही मुश्किल है। अगर आपने बीच में बोल कि, "अब मैं चलूंगा। मुझे जरा नेहरू प्लेस जाना है" तो वे तपाक से बोलेंगे, "अरे याद आया, नेहरु प्लेस तो मुझे भी जाना था। चलिये साथ में चलते हैं।" अब अगर आपको सही में जाना भी होग तो भी आप प्लैन रद्द ही कर देंगे।
परसों सोमवार से एक्ज़ाम है बाकी पोस्ट तीन चार दिन में पूरी करूंगा।




