बुधवार, 12 नवंबर 2008

मेरी मातृभाषा : मागधी (मगही)

मेरी मातृभाषा मगही है। मगहीशब्द का विकास मागधीसे हुआ है (मागधी > मागही >मगही) । मगही भारत में कुल १७,४४९,४४६ लोगों द्वारा बोली जाती है। प्राचीन काल में यह मगध साम्राज्य की भाषा थी और भगवान बुद्ध अपने उपदेश इसके प्राचीन रुप "मागधी प्राकृत" में देते थे। मगही का मैथिली और भोजपुरी भाषाओं से भी गहरा संबंध है जिन्हें सामूहिक रूप से "बिहारी भाषाएं कहा जाता है जो इन्डो-आर्यन भाषाएं हैं। मैथिली की पारंपरिक लिपि "कैथी" है पर अब यह समन्यतः देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती है। मगही बिहार के मुख्यतः पटना, गया, जहानाबाद, और औरंगाबाद जिले में बोली जाती है। इसके अलावा यह पलामू, गिरिडीह, हज़ारीबाग, मुंगेर, और भागलपुर, झारखंड के कुछ जिलों तथा पश्चिम बंगाल के मालदा में भी बोला जाता है।

आधुनिक काल में ही मगही के अनेक रुप दृष्टिगत होते हैं। मगही भाषा का क्षेत्र विस्तार अति व्यापक है; अतः स्थान भेद के साथ-साथ इसके रूप बदल जाते हैं । प्रत्येक बोली या भाषा कुछ दूरी पर बदल जाती है। मगही भाषा के निम्नलिखित भेदों का संकेत भाषाविद कृष्णदेव प्रसाद ने किया है :-

आदर्श- मगही

यह मुख्यत: गया जिले में बोली जाती है।

शुद्ध -मगही

इस प्रकार की मगही राजगृह से लेकर बिहारशरीफ के उत्तर चार कोस बयना स्टेशन (रेलवे) पटना जिले के अन्य क्षेत्रों में बोली जाती है

टलहा -मगही

टलहा मगही मुख्य रुप से मोकामा, बड़हिया, बाढ़ अनुमण्डल के इस पार के कुछ पूर्वी भाग और लक्खीसराय थाना के कुछ उत्तरी भाग गिद्धौर और पूर्व में फतुहां में बोली जाती है।

सोनतरिया मगही

सोन नदी के तटवर्ती भू-भाग में पट्ना और गया जिले में सोनतरिया मगही बोली जाती है।

जंगली मगही

राजगृह, गया, झारखण्ड प्रदेश के छोटानागपु (उत्तरी छोटानागपुर मूलत:) और विशेषतौर से हजारीबाग के वन्य या जंगली क्षेत्रों में जंगली मगही बोली जाती है।

भाषाविद ग्रियर्सन महोदय ने मगही के एक अन्य रूप पूर्वी मगहीका उल्लेख किया है। ग्रियर्सन महोदय के अनुसार पूर्वी मगही का क्षेत्र हजारीबाग, मानभूम, दक्षिणभूम, दक्षिणपूर्व रांची तथा उड़ीसा में स्थित खारसावां एवं मयुरभंज के कुछ भाग तथा छत्तीसगढ़ के वामड़ा में है। मालदा जिले के दक्षिण में भी ग्रियर्सन पूर्वी-मगही की स्थिति स्वीकार करते हैं।

मगही भाषा के प्राचीन साहित्येतिहास का प्रारम्भ आठवीं शताब्दी के सिद्ध कवियों की रचनाओं से होता है। सरहपा की रचनाओं का सुव्यवस्थित एवं वैज्ञानिक संस्करण दोहाकोष के नाम से प्रकाशित है जिसके सम्पादक महापणिडत राहुल सांकृत्यायन हैं। सिद्धों की परम्परा में मध्यकाल के अनेक संतकवियों ने मगधी भाषा में रचनायें की। इन कवियों में बाबा करमदास, बाबा सोहंगदास, बाबा हेमनाथ दास आदि अनेक कवियों के नाम उल्लेख हैं।


आधुनिक काल में लोकभाषा और लोकसाहित्य सम्बन्धी अध्ययन के परिणामस्वरुप मगही के प्राचीन परम्परागत लोकगीतों, लोककथाओं, लोकनाट्यों, मुहावरों, कहावतों तथा पहेलियों का संग्रह कार्य बड़ी तीव्रता के साथ किया जा रहा है। साथ ही मगही भाषा में युगोचित साहित्य, अर्थात् कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, एकांकी, ललित निबन्ध आदि की रचनाएं, पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन एवं भाषा और साहित्य पर अनुसंधान भी हो रहे हैं।


***********************************************************

मंगलवार, 11 नवंबर 2008

बिहार का महापर्व छठ



छठ बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश मे मनाया जाने वाला एक प्राचीन पर्व है। बिहार में तो इसे सबसे बड़े त्योहार के रूप में मनाया जाता है। माना जाता है कि छठ या सूर्य पूजा महाभारत काल से की जाती रही है। ऐसा माना जाता है कि इस पर्व की शुरुआत अंग देश (आधुनिक भागलपुर) के राजा कर्ण ने की थी। छठ सूर्य की उपासना का पर्व है। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर ( तालाब ) के किनारे यह पूजा की जाती है। छठ वर्ष में दो बार मनाया जाता है: एक बार गर्मियों में, जिसे "चैती छठ" कहते हैं और एक बार दीपावली के करीब एक हफ़्ते बाद जिसे "कार्तिक छठ" कहते है। यह चैत और कार्तिक की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। "कार्तिक छठ" अधिक लोकप्रिय है। इसके दो कारण हैं- पहला, सर्दियों में वैसे भी उत्तर भारत में त्योहारों का माहौल रहता है और दूसरे, छठ में पर्व करने वालों को ३६ घंटे से भी अधिक लंबा उपवास (जिसमें पानी भी नहीं पिया जाता) रखना पड़ता है, जो कि गर्मियों कि तुलना में सर्दियों में आसान है।

चार दिवसीय इस महापर्व की शुरूआत दिवाली के चौथे दिन से शुरू हो जाती है। व्रत की शुरूआत नहाय-खाय से होती है। पूजन सामग्री किसी कारण से जूठी हो, इस कारण पूजन सामग्री को रखने के लिए घरों की सफाई की जाती है। अगर पूजन सामग्री जूठी या अपवित्र हो जाए तो पर्व खंडित हो जाता है और इसे अशुभ माना जाता है।


नहाय-खाय के दिन से ही व्रतधारी जमीन पर सोते हैं। घर में सभी के लिए सात्विक भोजन बनता है। दूसरे दिन पूरे दिन उपवास कर चंद्रमा निकलने के बाद व्रतधारी गुड़ की खीर (रसिया) का प्रसाद खाते हैं। इसके साथ कद्दू (घीया) की सब्जी विशेषतौर पर खायी जाती है। स्थानीय बोलचाल में इसे कद्दू-भात कहते हैं। इस दिन आस-पड़ोस और रिश्तेदारों को भी विशेष तौर पर कद्दू-भात खिलाया जाता है।

कद्दू-भात के साथ ही व्रतधारियों का 36 घंटे का अखंड उपवास शुरू हो जाता है। इस दौरान व्रतधारी अन्न और जल ग्रहण नहीं करते हैं। तीसरे दिन व्रतधारी अस्ताचलगामी सूर्य को नदी तालाब में खड़े होकर अर्ध्य देते हैं। चौथे दिन सुबह उगते सूर्य को कंद-मूल गाय के दूध से अर्ध्य देने के साथ ही यह व्रत सम्पन्न होता है। व्रतधारी व्रत संपन्न होने के बाद सबसे पहले प्रसाद स्वरूप ठेकुआ खाते हैं और उसके बाद अन्न ग्रहण करते हैं।

सूर्य उपासना का महापर्व छठ मुख्य रूप से पति और पुत्र की लंबी उम्र के साथ-साथ सुख- समृद्धि के लिए किया जाता है। इस पर्व में सूर्य की आराधना की जाती है। छठ पूजा के नियम इतने कड़े हैं कि इस व्रत को करने से पहले तन-मन से महिलाओं को शुद्ध होना पड़ता है और घर की तमाम चीजों की साफ-सफाई की जाती है। जो लोग छठ पूजा की सामग्री खरीदने में असमर्थ होते हैं वे दूसरों से दान लेकर पूजन सामग्री खरीदते हैं।

पूजन सामग्री

गन्ना, ठेकुआ (मीठा पकवान), नारियल, गागल (टाभ), सरीफा, पानी वाला सिंघाड़ा, पत्ते वाला अदरक, आ॓ल, केला, सेब, संतरा, सुथनी, मूली, पत्ता वाला हल्दी, अनानास, पान का पत्ता, सुपाड़ी, अलता, साठी के चावल चिड़वा, कोसी, दीया, ढकनी, सूप, दौउरा, चांदनी (नया कपड़ा)

बिहार के लोग जहां भी गये अपने साथ छठ की परंपरा को भी ले गए। विभिन्न प्रदेशों और यहाँ तक की दूसरे देशों में रहने वाले बिहारी भी हर्षोल्लास से इस पर्व को मनाते हैं जिससे यह पर्व धीरे-धीरे दूसरे राज्यों में भी लोकप्रिय हो रहा है।



मेरा गृहजिला नालंदा

नालंदा के खंडहर

नालंदा बिहार में पटना से ९० किमी दक्षिण और गया से ६२ किमी की दूरी पर स्थित है। यह विश्व में शिक्षा और संस्कृति के प्राचीनतम केन्द्र "नालंदा विश्वविद्यालय" के लिए प्रसिद्ध है। अब इस महानतम विश्वविद्यालय के सिर्फ़ खंडहर बचे हैं जो १४ हेक्टेयर क्षेत्र में फ़ैले हैं। संस्कृत में नालंदा का अर्थ होता है "ज्ञान देने वाला" (नालम = कमल, जो ज्ञान का प्रतीक है; दा = देना) बुद्ध अपने जीवनकाल में कई बार नालंदा आए और लंबे समय तक ठहरे। जैन धर्म के तीर्थंकर भगवान महावीर निर्वाण भी नालंदा में ही पावापुरी नामक स्थान पर हुआ।

नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना ४७० . में गुप्त साम्राज्य के कुमारगुप्त ने की थी। यह विश्व के प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक था जहां १०,००० शिक्षक और ,००० छात्र रहते थे। यह विश्वविद्यालय स्थापत्य का एक शानदार नमूना था। आज भी इसके अवशेषों के बीच से होकर गुजरने पर आप इसके गौरवशाली अतीत को अनुभव कर सकते हैं। यहां कुल आठ परिसर और दस मन्दिर थे। इसके अलावा कई पूजाघर, झीलें, उद्यान और नौ मंजिल का एक विशाल पुस्तकालय भी था। नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय बौद्ध ग्रन्थों का विश्व में सबसे बड़ा संग्रह था। कहा जाता है कि जब बख्तियार खिलज़ी ने इसमें आग लगवा दी थी तो यह लगातार छः महीने तक जलता रहा था।
नालंदा के खंडहर

नालंदा विश्वविद्यालय में विद्यार्थी विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, तर्कशास्त्र, गणित, दर्शन, तथा हिन्दु और बौद्ध धर्मों का अध्ययन करते थे। यहां अध्ययन करने के लिए चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, इंडोनेशिया, इरान और तुर्की आदि देशो से विद्यार्थी आते थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन्सांग ने भी यहां अध्ययन किया था तथा अपनी यात्रा वृतान्तों में उसने इसका विस्तृत वर्णन किया है।

११९३ में बख्तियार खिलज़ी ने बिहार पर आक्रमण किया। जब वह नालंदा पहुंचा तो उसने नालंदा विश्वविद्यालय के शिक्षकों से पूछा कि यहां पवित्र ग्रन्थ कुरान है नहीं। जवाब नहीं में मिलने पर उसने नालंदा विश्वविद्यालय को तहस नहस कर दिया और पुस्तकालय में आग लगा दी। इरानी विद्वान मिन्हाज लिखता है कि कई विद्वान शिक्षकों को ज़िन्दा जला दिया गया और कईयों के सर काट लिये गए। इस घटना को कई विद्वानों द्वारा बौद्ध धर्म के पतन के एक कारण के रूप में देखा जाता है। कई विद्वान यह भी कहते हैं कि अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों के नष्ट हो जाने से भारत आने वाले समय में विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और गणित जैसे क्षेत्रों मे पिछड़ गया।
नालंदा के खंडहर

यहां घूमने लायक स्थान हैं - नालंदा विश्वविद्यालय खंडहर परिसर मे चैत्यों, विहारों आदि के अवशेष, नव नालंदा महाविहार, नालंदा संग्रहालय , और बड़गांव। बड़गांव नालंदा का निकटतम गांव है जहां एक तालाब के किनारे प्राचीन सूर्य मन्दिर है। यह स्थान छठ के लिए प्रसिद्ध है। नालंदा से थोड़ी दूर पर सिलाव स्थित है जो स्वादिष्ट "खाज़ा" के लिए प्रसिद्ध है) सिलाव से थोड़ा और आगे चलने पर एक और प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है - राजगृह (रजगीर) इसकी बारे में जानकारी मैं एक अलग पोस्ट में दूंगा।
नालंदा के खंडहर

मेरा राज्य बिहार

बिहार उत्तरी भारत का एक राज्य है जिसकी राजधानी पटना है क्षेत्रफ़ल की दृष्टि से यह भारत का १२वां बड़ा (९९२०० वर्ग किमी) तथा जनसंख्या (८२,९९८,५०९) की दृष्टि से ३रा बड़ा राज्य है। बिहार के उत्तर में नेपाल, पूर्व में पश्चिम बंगाल, पश्चिम में उत्तर प्रदेश और दक्षिण में झारखन्ड है बौद्ध धर्म में बौद्ध भिक्षुओं के ठहरने के स्थान को विहार कहते हैं। इतिहासकारों के अनुसार इस क्षेत्र में बौद्ध विहारों की संख्या काफी थी, अतः तुर्कों ने इसे विहारों का प्रदेश कहा है जो बाद में बिहार हो गया।

हिन्दी और उर्दू बिहार की आधिकारिक भाषाएं हैं परन्तु अधिकांश लोग बोलचाल में बिहारी भाषा ( मागधी, मैथिली, भोजपुरी और अंगिका) का प्रयोग करते हैं। प्राचीन काल में बिहार भारत में शक्ति, शासन, शिक्षा और संस्कृति का केन्द्र था। भारत का प्रथम और सबसे विस्तृत और शक्तिशाली साम्राज्य "मौर्य साम्राज्य" यहीं स्थापित हुआ था। विश्व का सबसे शान्तिप्रिय धर्म "बौद्ध धर्म" भी बिहार की ही देन है। जनक, जरासंध, कर्ण, सीता, कौटिल्य, चन्द्रगुप्त, मनु, याज्ञबल्कय, मण्डन मिश्र, भारती, मैत्रेयी, कात्यानी, अशोक, बिन्दुसार , बिम्बिसार, से लेकर बाबू कुंवर सिंह, बिरसा मुण्डा, बाबू राजेन्द्र प्रसाद, रामधारी सिंह दिनकर, नार्गाजून और जाने कितने महान एवं तेजस्वी पुत्र एवं पुत्रियों को अपने मिट्टी में जन्म देकर भारत को विश्व के सांस्कृतिक पटल पर अग्रणी बनाने में बिहार का सर्वाधिक स्थान रहा है।

पर प्राचीन काल के विशाल साम्राज्यों का गढ़ रहा यह प्रदेश वर्तमान में देश की अर्थव्यवस्था के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक गिना जाता है यहां की साक्षरता दर मात्र ४७% है। आज बिहार के लोग काम की तलाश में सिर्फ़ दूसरे राज्यों में जाने को विवश हैं बल्कि वहां नस्लवादी भेदभाव के भी शिकार हो रहे हैं।


बिहार का गौरवशाली अतीत

बिहार का ऐतिहासिक नाम मगध है बिहार की राजधानी पटना का ऐतिहासिक नाम पाटलिपुत्र है प्राचीन काल में मगध का साम्राज्य देश के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था यहां से मौर्य वंश, गुप्त वंश तथा अन्य कई राजवंशो ने देश के अधिकतर हिस्सों पर राज किया मौर्य वंश के शासक सम्राट अशोक का साम्राज्य पश्चिम में अफ़ग़ानिस्तान तक फैला हुआ था मौर्य वंश का शासन 325 ईस्वी पूर्व से 185 ईस्वी पूर्व तक रहा छठी और पांचवीं सदी इसापूर्व में यहां बौद्ध तथा जैन धर्मों का उद्भव हुआ अशोक ने, बौद्ध धर्म के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उसने अपने पुत्र महेन्द्र को बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए श्रीलंका भेजा उसने उसे पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) के एक घाट से विदा किया जिसे महेन्द्र के नाम पर में अब भी महेन्द्रू घाट कहते हैं बाद में बौद्ध धर्म चीन तथा उसके रास्ते जापान तक पहुंच गया

मध्यकाल में बारहवीं सदी में बख्तियार खिलजी ने बिहार पर आधिपत्य जमा लिया। उसके बाद मगध देश की प्रशासनिक राजधानी नहीं रहा। जब शेरशाह सूरी ने, सोलहवीं सदी में दिल्ली के मुगल बाहशाह हुमांयु को हराकर दिल्ली की सत्ता पर कब्जा किया तब बिहार का नाम पुनः प्रकाश में आया पर यह अधिक दिनों तक नहीं रह सका। अकबर ने बिहार पर कब्जा करके बिहार का बंगाल में विलय कर दिया। इसके बाद बिहार की सत्ता की बागडोर बंगाल के नवाबों के हाथ में चली गई।

1857 के प्रथम सिपाही विद्रोह में बिहार के बाबू कुंवर सिंह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई 1912 में बंगाल विभाजन के फलस्वरूप बिहार नाम का राज्य अस्तित्व में आया 1935 में उड़ीसा इससे अलग कर दिया गया स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बिहार के चंपारण के विद्रोह को, अंग्रेजों के खिलाफ बग़ावत फैलाने में अग्रगण्य घटनाओं में से एक गिना जाता है स्वतंत्रता के बाद बिहार का एक और विभाजन हुआ और सन् 2000 में झारखंड राज्य इससे अलग कर दिया गया भारत छोड़ो आंदोलन में भी बिहार की गहन भूमिका रही।

भौगोलिक स्थिति

यह क्षेत्र गंगा तथा उसकी सहायक नदियों के मैदानों में बसा है झारखंड के अलग हो जाने के बाद बिहार की भूमि मुख्यतः नदियों के मैदान एवं कृषियोग्य समतल भूभाग है बिहार गंगा के पूर्वी मैदान मे स्थित है। गंगा नदी राज्य के लगभग बीचों बीच होकर बहती है उत्तरी बिहार बागमती,कोशी, गंडक, सोन और उनकी सहायक नदियों का समतल मैदान है


बिहार के उत्तर में हिमालय पर्वत श्रेणी (नेपाल) है तथा दक्षिण में छोटानागपुर पठार (जिसका हिस्सा अब झारखंड है ) उत्तर से कई नदियां तथा जलधाराएं बिहार होकर प्रवाहित होती है और गंगा में विसर्जित होती हैं इन नदियों में, वर्षा में बाढ़ एक बड़ी समस्या है

राज्य का औसत तापमान गृष्म ऋतु में 35-45 डिग्री सेल्सियस तथा जाड़े में 5-15 डिग्री सेल्सियस रहता है जाड़े का मौसम नवंबर से मध्य फरवरी तक रहता है अप्रैल में गृष्म ऋतु आरंभ हो जाती है जो जुलाई के मध्य तक चलती है जुलाई-अगस्त में वर्षा ऋतु का आगमन होता है जिसका अवसान अक्टूबर में होने के साथ ही ऋतु चक्र पूरा हो जाता है

उत्तर में भूमि प्रायः सर्वत्र उपजाऊ एवं कृषियोग्य है धान, गेंहू, दलहन, मक्का, तिलहन,तम्बाकू,सब्जी तथा कुछ फलों की खेती की जाती है हाजीपुर का केला एवं मुजफ्फरपुर की लीची बहुत प्रसिद्ध है|

संस्कृति

बिहार की संस्कृति मैथिली, मगही, भोजपुरी,बज्जिका, तथा अंग संस्कृतियों का मिश्रण है नगरों तथा गांवों की संस्कृति में अधिक फर्क नहीं है नगरों के लोग भी पारंपरिक रीति रिवाजों का पालन करते है प्रमुख पर्वों में महाशिवरात्री,नागपंचमी,दशहरा, दिवाली,छठ, श्री पंचमी,होली, मुहर्रम, ईद तथा क्रिसमस हैं सिक्खों के दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म स्थान होने के कारण पटना में उनकी जयन्ती पर भी भारी श्रद्धार्पण देखने को मिलता है

बिहार के जिले

यहां कुल कमिश्नरियां हैं जिनमें कुल ३८ जिले हैं :-

मगध अरवल जिला, औरंगाबाद जिला, गया जिला, जहानाबाद जिला, नवादा जिला

पटना भोजपुर जिला, बक्सर जिला, नालंदा जिला, पटना जिला, भभुआ जिला, सासाराम जिला

तिरहुत पूर्वी चंपारण जिला, पश्चिम चंपारण जिला, शिवहर जिला, मुजफ्फरपुर जिला, सीतामढी जिला, वैशाली जिला


सारण छपरा जिला, गोपालगंज जिला, सीवान जिला


दरभंगा
बेगूसराय जिला, दरभंगा जिला, मधुबनी जिला, समस्तीपुर जिला

कोसी मधेपुरा जिला, सहरसा जिला, सुपौल जिला

पूर्णिया अररिया जिला, कटिहार जिला, किशनगंज जिला

पूर्णियां जिला

भागलपुर बाँका जिला, भागलपुर जिला

मुंगेर जमुई जिला, खगड़िया जिला, मुंगेर जिला, लखीसराय जिला,

शेखपुरा जिला


बिहार सरकार की आधिकारिक साइट पर जाएं

बिहार पर्यटन विभाग की साइट


*******************************************************

बुधवार, 5 नवंबर 2008

पंडित भीमसेन जोशी को भारत रत्न

भीमसेन जोशी और पूर्व राष्ट्रपति कलाम


सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित भीमसेन जोशी को सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित करने का फ़ैसला किया है.

मंगलवार को राष्ट्रपति भवन की ओर से इस आशय की घोषणा की गई.

राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है,'' राष्ट्रपति को पंडित भीमसेन जोशी को भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा करते हुए हर्ष हो रहा है.''

86 वर्षीय भीमसेन जोशी किराना घराने के महत्वपूर्ण गायक हैं.

उन्होंने 19 साल की उम्र से गाना शुरू किया था और वो पिछले सात दशकों से शास्त्रीय गायन कर रहे हैं.

इस स्वर-साधक ने अपने तप से भारतीय शास्त्रीय संगीत को अनूठी ऊँचाइयाँ दी हैं.

शास्त्रीय संगीत के पंडितों का कहना है कि गायन का जो अंदाज़ भीमसेन जोशी के पास है वो समकालीन भारतीय संगीत में बहुत कम ही लोगों के मिला है.

वर्ष 1922 में जन्मे पंडित जोशी किराना घराने से संबंध रखते हैं.

उन्हें मुख्य रूप से उनके खयाल शैली और भजन के लिए जाना जाता है.

पंडित जोशी का जन्म कर्नाटक के गडक ज़िले के एक छोटे से शहर में हुआ था. उनके पिता एक स्कूल शिक्षक थे.

पंडित जोशी को वर्ष 1999 में पद्मविभूषण, 1985 में पद्मभूषण और 1972 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था.

उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है.

बीआर चोपड़ा का निधन



भारतीय फ़िल्म जगत के मशहूर निर्माता-निर्देशक बीआर चोपड़ा का लंबी बीमारी के बाद बुधवार सुबह मुंबई में निधन हो गया.

वह 94 साल के थे। उनके परिवार में एक बेटा और दो बेटियाँ हैं. ‘धूल के फूल’, ‘वक्त’, ‘नया दौर’, ‘क़ानून’, ‘हमराज’, ‘इंसाफ़ का तराज़ू’ और ‘निकाह’ जैसी कई सफल फ़िल्में बीआर चोपड़ा की देन हैं। पर बड़े पर्दे पर ही नहीं, बीआर चोपड़ा ने छोटे पर्दे को भी जो दिया, वो उनके बाद शायद कोई न दे सके। महाभारत की कथा पर महाभारत नाम से ही एक ऐसा धारावाहिक बीआर चोपड़ा ने बनाया जिसकी प्रसिद्धि का पैमाना आज भी धारावाहिक जगत में मानक के तौर पर देखा जाता है.
मशहूर निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा उनके छोटे भाई है.

महान फ़िल्मकार

<span title=
नया दौर जैसी फ़िल्म बीआर चोपड़ा की देन है

बीआर चोपड़ा के नाम से मशहूर बलदेव राज चोपड़ा का जन्म 22 अप्रैल 1914 को पंजाब के लुधियाना में हुआ था.

उन्होंने लाहौर विश्विवद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एमए किया था. उन्होंने अपना करियर फ़िल्म पत्रकार के रूप में शुरू किया था.

वर्ष 1955 में बीआर चोपड़ा ने अपने फ़िल्म निर्माण कंपनी बीआर फ़िल्म्स बनाई. इस बैनर की ओर से उन्होंने ‘नया दौर’ बनाई.

बीआर चोपड़ा ने विधवा पुनर्विवाह और वेश्यावृत्ति जैसी सामाजिक समस्या को अपनी फ़िल्मों का विषय बनाया. उनकी ज़्यादातर फ़िल्में किसी न किसी सामाजिक मुद्दे पर आधारित थी.

फ़िल्म जगत में दिए गए उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें फ़िल्मों का सबसे बड़े सम्मन ‘दादा साहब फाल्के’ से सम्मानित किया.

भारत के लिए ओबामा की जीत के मायने


अर्ध –अश्वेत बराक ओबामा का अमेरिका का 44 वां राष्ट्रपति बनना भले ही उस देश के लिए ऎतिहासिक दिन हो, लेकिन भारत के लिए ओबामा की विजय कुछ चिंता का विषय बन सकती है।

विभिन्न विषयों पर ओबामा के बयानों में यह बात झलकती है कि वे दुनिया में नई ताकत के रूप में उभरते भारत (और चीन) को अमेरिका के “सुपर पावर” होने के लिए खतरा मानते हैं।

चाहे भारत द्वारा चंद्रयान छोड़ा जाना हो या अमेरिका में भारतीय कंपनियों द्वारा “आउटसोर्सिंग” के जरिए काम करना हो, ओबामा ने हर बार भारत-आलोचक रुख अपनाया है। इसके अलावा, चुनाव अभियान के दौरान हिलेरी क्लिंटन पर भारत-समर्थक होने और उन्हें चंदा देने वाले अमेरिकी-भारतीयों पर ओबामा खेमे के अनर्गल आरोपों तथा आलोचना ने भी काफी हंगामा किया था जिसके लिए ओबामा को माफी भी मांगनी पड़ी थी।


चंद्रयान पर ओबामा की प्रतिक्रिया:

जहां अमेरिकी प्रशासन ने आधिकारिक रूप से भारत द्वारा प्रथम मानवरहित अंतरिक्ष यान चंद्रमा पर भेजे जाने पर बधाई दी थी, वहीं ओबामा की तत्काल प्रतिक्रिया यह थी कि भारत का यह कदम और इससे पहले चीन की अंतरिक्ष में प्रगति, अमेरिका की अंतरिक्ष पर एकछ्त्र नियंत्रण की राह में खतरा थे। ओबामा ने कहा था कि अमेरिका को अपने वैज्ञानिक उन्नति और तेज करनी होगी “ताकि अन्य देशों को उसकी तकनीकी बराबरी करने से रोका जा सके।”

हिलेरी क्लिंटन और भारतीय अमेरिकियों के खिलाफ अभियान:


अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के पहले चरण में ओबामा और हिलेरी क्लिंटन के बीच टक्कर थी डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनने के लिए। उस दौरान ओबामा खेमे ने हिलेरी के खिलाफ एक जहर उगलता पर्चा जारी किया था जिसमें बिल और हिलेरी क्लिंटन तथा उनके मित्र, एक धनी भारतीय अमेरिकी व्यवसाई संत सिंह चटवाल की कटु आलोचना की गई थी।

पर्चे में हिलेरी के भारतीय मूल के अमेरिकियों से अच्छे संबंधों पर व्यंग्य करते हुए उन्हें "पंजाब की डॆमोक्रेटिक सिनेटर" कहा गया था।

ओबामा खेमे के इस पर्चे में आरोप लगाए गए थे कि “बिल और हिलेरी क्लिंटन ऎसी कंपनियों से पैसे लेकर भाषण देने के प्रस्ताव स्वीकार करते हैं जो आउटसोर्सिंग कर भारतीयों को अमेरिकियों के हिस्से की नौकरी देती हैं, हिलेरी क्लिंटन ने भारतीय कंपनी में पैसा लगाया है, चटवाल उन्हें चुनाव प्रचार के लिए धन उपलब्ध कराते हैं, चटवाल आर्थिक अपराधी हैं, उन्हें भारत में गिरफ्तार किया गया था और वे जमानत पर रिहा होने के बाद भाग कर वियेना चले गए थे, हिलेरी और बिल क्लिंटन भारतीय समुदाय से अच्छे रिश्तों की वजह से व्यक्तिगत और चुनावी आर्थिक फायदा उठाते हैं, बिल क्लिंटन ने एक भारतीय कंपनी में लाखों डॉलर निवेश किए हैं और हिलेरी क्लिंटन ऎसी कंपनियों से चुनावी चंदा लेती हैं जो अमेरिकियों की नौकरी छीन कर भारतीयों को देती है, हिलेरी क्लिंटन भारतीय व्यवसाइयों के हितों की रक्षक हैं और अमेरिकियों की नौकरी बचाने की उन्हें चिंता नहीं।”


इस पर्चे के बंटने पर न सिर्फ भारतीय मूल के अमेरिकी बल्कि डेमोक्रेटिक समर्थक भी इस पर्चे की कटु भाषा से नाराज हो गए। इतना तूफान उठा कि ओबामा को अपने खेमे द्वारा जारी इस पर्चे के लिए माफी मांगनी पड़ी।

भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियों को “आउटसोर्सिंग” का विरोध:
बराक ओबामा आरंभ से ही भारतीय कंपिनियों को अमेरिका से आउटसोर्स कर काम दिए जाने के कट्टर विरोधी रहे हैं। अपने चुनाव अभियान के दौरान उन्होंने बार- बार यह बात दोहरायी कि “बेंगलुरू और बीजिंग” को अमेरिकी कंपनियों द्वारा आउटसोर्स कर काम दिया जाना बंद होना चाहिए ताकि अमेरिकी लोगों को वह काम मिल सके।

हिलेरी क्लिंटन से डॆमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी छीनने के तुरंत बाद उन्होंने घोषणा की थी कि वे “भारतीय और चीनी कंपनियों को अमेरिकी नौकरियां आउटसोर्स किया जाना बंद कर देंगे और उन अमेरिकी कंपनियों को टैक्स में छूट देना बंद कर देंगे जो दूसरे देशों को काम आउटसोर्स करती हैं।”

कश्मीर को पाकिस्तान की “समस्या” बताना, अमेरिकी मध्यस्थता की बात : ओबामा का ताज़ातरीन बयान जो भारतीय राजनीतिक गलियारों में चिंता का विषय होने के लायक है, कश्मीर से संबंधित है। ओबामा ने अमेरिकी चुनाव के मतदान से एक सप्ताह पहले एक इंटरव्यू में कहा कि पाकिस्तान तभी अफगानिस्तान में आतंकवाद से निबट सकता है जब वह भारतीय सीमा की तरफ से निश्चिंत हो सकेगा और इसके लिए “ हमें (अमेरिका को) भारत- पाकिस्तान के बीच समझ को बढ़ावा देकर कश्मीर “समस्या” सुलझाने की कोशिश करनी होगी ताकि वह (पाकिस्तान) भारत पर नहीं बलिक अफगान उग्रवादियों पर ध्यान केंद्रित कर सके।”

भारत शुरू से ही कश्मीर में किसी बाहरी देश के दखल के खिलाफ रहा है और ओबामा का यह बयान भारतीय विदेश नीति, कूटनीति और राजनीतिक सिद्धांतों के पूर्णत: खिलाफ है।

अभी तक तो यह चुनाव अभियान की बात थी। एक बार राष्ट्रपति पद संभालने के बाद ओबामा नई उभरती विश्व ताकतों- भारत और चीन- के साथ क्या रुख अपनाते हैं, इस पर भारतीय राजनीति और उद्योग जगत की सतर्क नजर रहेगी।