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बुधवार, 26 मई 2010

गोमांस और पोर्क खाने में क्या बुराई है?

[भूमिका के लिए पिछली पोस्ट पढ़ें]
पिछले साल अगस्त में मुझे कोरिया जाने का मौक़ा मिला. कोरिया सरकार ने एक यूथ कैम्प (Youth Camp for Asia's Future) का आयोजन किया था जिसमें एशिया के लगभग सभी देशों से ३०० युवा छात्रों को आमंत्रित किया गया था. इसमें भाग लेने के लिए नई दिल्ली में दक्षिण कोरिया के दूतावास द्वारा भारत से ९ लोगों का चयन किया गया जिसमें एक मैं भी था. १५ दिन की इस यात्रा के दौरान न सिर्फ इतने देशों के युवाओं से विचारों के आदान-प्रदान का मौक़ा मिला बल्कि बहुत सारी संस्कृतियों को एक साथ देखने और अनुभव करने का भी अवसर मिला. हो सकता है कि मैं भविष्य में अपने पैसों से विदेश जाऊं पर जो अनुभव और रोमांच इस यात्रा में मिला वो नहीं लगता कि दुबारा मिल पायेगा. उस कैम्प में बिताये गए क्षण निश्चय ही जीवन के यादगार क्षण थे. खैर इस यात्रा के विषय में अलग से एक विस्तृत लेख लिखा जा सकता है. पर यहाँ यह सब बताने का मकसद कुछ और है.

शायद आपमें से बहुत लोग यह जानते हों कि कोरिया में मांसाहार बहुत प्रचलित है और तकरीबन अधिकतर व्यंजनों में गाय और सूअर के मांस का प्रयोग होता है. पूर्ण शाकाहारी व्यंजनों को तलाशना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण काम था. मैं और मेरे कई अन्य भारतीय मित्र चिकेन और मटन आदि खाते हैं पर वहाँ जाकर हमने भी शाकाहारी ही बनना बेहतर समझा. वैसे वहाँ का शाकाहारी खाना भी देखकर और खुशबू से ही भूख ख़त्म हो जाती थी.

अब परेशानी यह हुई कि वहाँ हमेशा खाने से पहले हमें किसी न किसी कोरियाई या किसी अन्य विदेशी मित्र को कुछ सवालों के जवाब देने पड़ते थे. जैसे- "ज्यादातर भारतीय लोग मांस क्यों नहीं खाते", "जब मुर्गा/बकरा खाते हैं तो गाय और सूअर का मांस खान में क्या बुराई है; दोनों तो जीवित प्राणी ही हैं", "मुस्लिम सूअर का मांस नहीं खाते और हिन्दू गाय का मांस क्यों नहीं खाते".

मैं इन सवालों का अपनी बुद्धि और समझ के अनुसार ऐसा तर्कपूर्ण उत्तर देने की कोशिश करता था जिससे उनकी जिज्ञासा भी शांत हो जाए और भारतीय संस्कृति के प्रति उनके मन में कोई गलतफहमी भी न रहे. पर कई बार मैं ऐसा करने में असफल भी रहता था. ऐसे प्रश्न अक्सर विदेशी, खासकर उतर एशियाई लोग हम भाषा के छात्रों से पूछते हैं. अगर आप ऐसी स्थिति में हों तो क्या उत्तर देंगे??

32 टिप्पणियां:

  1. I don't eat any kind of meat but for me a Chicken is as holy as a Cow. If you can eat chicken then you can very well eat cow.

    But, it is a personal preference so personal choice must be respected.

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  2. हम खुद भी बीफ और पोर्क नहीं खा पाते, और सी फूड भी नहीं. बस, मन से नहीं इच्छा होती खाने की.

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  3. प्रिय मित्र, अगर आप गो मांस न खाने के लिए कोई तार्किक उत्तर तलाश रहे हैं तो आप को निराशा ही हाथ लगेगी। यहाँ मामला आस्था का है। हम गो मांस नहीं खाते क्यौकी गायको हम उसकी अनेक खूबियों की वजह से पूजते हैं। हमारा हिन्दू धर्म हर उस चीज को पवित्र समझता है जिससे हमारा भला होता हो। और जब हम किसी चीज को पवित्र मानते हों तो उसका भक्षण अपराध बोध पैदा करता है। इसलिए हमारे यहाँ गो मांस का निषेध है। अन्य कोई दूसरा कारण नहीं है। मामला सिर्फ आस्था का है।

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  4. बेनामीMay 25, 2010 06:40 PM

    जब मेरा कुत्ता शैतानी करता है तो मैं उसे धमकी देता हूं कि मान जा वरना कोरियन एम्बेसी या एलजी की फैक्टरी के आगे छोड़ आऊंगा और वह ज्यादातर रुक जाता है.

    वैसे शाकाहार ही सर्वोत्तम जीवन है. जब अपने भोजन के लिये किसी का खून न बहाया हो तो थोड़ा अच्छा महसूस होता है.

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  5. unke prashn jayaj the. unke prashn ke koi uttar nhi ho sakte.ishwar aapko apne paise se khub videsh yatra karvae. aap apne bhojan ki vyavastha pahle se tay kr le.

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  6. bhaiya, sachchai to yahi hai ki ye aastha ka prashn hai, jaise aap kisi apne ke sath kaisa vyawahar karte hain aur gairon ke sath aapka kaisa bartaw hota hai......

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  7. सतीश जी मैं स्वयं भी दक्षिण कोरिया काफी रहा हूँ, :) इसलिए आपकी परेशानिया समझ सकता हूँ. लेकिन ऐसा नहीं है की वहां पर अच्छा शाकाहारी खाना उपलब्ध नहीं होता. बात केवल जानकारी ना होने की भी हो सकती है. भोजन "फुगम फाब" वेज बिरयानी जैसा ही होता है, तथा इसके जैसे और भी कई अन्य खाने वहां के बाज़ार में आसानी से मिल जाते हैं. साथ ही साथ 'हलाल फ़ूड' के नाम से भारतीय तथा पाकिस्तानी दुकाने तथा भोजनालयों पर भी अच्छा और शाकाहारी खाना आसानी से उपलब्ध हो जाता है. अगली बार जाएँ तो मुझसे सलाह ले सकते हैं.

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  8. जहाँ तक बात सूअर के मांस के भक्षण की है तो धार्मिक बातें तो हैं ही, इसके अलावा अगर वैज्ञानिक स्वरुप से देखा जाए तो सूअर के मांस का भक्षण करने से स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है.

    शरीर में एक तत्व होता है यूरिक एसिड, यह(यूरिक एसिड) मानव में यह एक बेकार उत्पाद के रूप में रहता है, असल में शरीर का 98% यूरिक एसिड गुर्दे के द्वारा खून में से अलग हो कर, पेशाब के माध्यम से शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है.

    यह ध्यान रखने वाली बात है कि सुअर के जैव रसायन अपने कुल यूरिक एसिड का केवल 2% ही excretes (खून से अपशिष्ट पदार्थ के निर्वहन की प्रक्रिया को कहते हैं) कर पाता है, शेष 98% शरीर के एक अभिन्न अंग के रूप में बना रहता है. इससे पता चलता है कि सूअर के मांस की खपत करने वालो में गठिया की उच्च दर पाई जाती है.

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  9. बेनामीMay 25, 2010 10:17 PM

    इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. @ विचारशून्य जी और सत्यप्रकाश जी
    बिलकुल सहे कहा आपने यह तर्क का नहीं आस्था का प्रश्न है,
    पर क्या करें लोग तार्किक उत्तर चाहते हैं.

    @बेनामी जी
    हा हा हा. हम भी अक्सर कोरिया में डॉग मीट खाए जाने की प्रथा को लेकर मौज लेते हैं अपने कोरियाई दोस्तों से. मैंने देखा है कि खुद उनके मन में भी इस प्रथा के प्रति एक ग्लानि का भाव है और पढ़े-लिखे लोग धीरे-धीरे डॉग मीट खाना छोड़ रहे हैं. आपने अपना परिचय क्यों नहीं जाहिर किया?

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  11. @शहनवाज जी,
    इतने विस्तृत और तर्कपूर्ण उत्तर के लिए सचमुच आपका आभारी हूँ.
    आपने सही कहा कोरियाई लोग शाक-सब्जियां भी खूब खाते हैं पर पता नहीं क्यों हमें तो उनके मसालों की गंध से उल्टी आने लगती है. हमनें एक दो दिन वहाँ भारतीय और पाकिस्तानी रेस्तराओं में जाकर खाना खाया था लेकिन व्यस्त कार्यक्रम होने के कारण रोज वहाँ जाकर खाना मुश्किल था.
    @ आदरणीय कविता जी, समीर अंकल और संजुक्रान्ति जी..
    पढ़ने और अपनी राय देने के लिए आभार...

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  12. भाई हम भी कोई भी मीट नही खाते, जब की हमारे यहां सब्जियां इस मीट से ज्यादा महंगी मिलती है, क्योकि मन नही मानता, लेकिन यह लोग मीट क्यो ज्यादा खाते है? कभी यह भी सोचा है?

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  13. @सुमन जी
    धन्यवाद....
    @राज अंकल
    यह भी विचार का विषय है...

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  14. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  15. .
    .
    .
    दोस्त,

    पता नहीं लोगों को किस बात से परेशानी है जो आपकी इस पोस्ट को नापसंद के तीन चटके लगे हैं और पसंद का कोई नहीं...

    पहला पसंद का चटका मेरी ओर से...!

    अब आपके सवाल का जवाब...जब जीवित प्राणी को मार कर उसका मांस खाने का निर्णय ले ही लिया, तो किसी पशुविशेष के मांस से परहेज क्यों... मांसाहारी को सब खाना चाहिये...तार्किक आधार पर सोचें तो यही होना भी चाहिये... परंतु आस्था के आगे कोई तर्क नहीं चलते...


    "मुस्लिम सूअर का मांस नहीं खाते और हिन्दू गाय का मांस क्यों नहीं खाते".

    क्योंकि हिन्दू और मुसलमान दोनों को ही ऐसा करने पर नरक का भय सताता है...

    कुछ हैं मेरे जैसे भी जो शायद नर्क में जाने के लिये ही अभिशप्त हैं...अत: जो प्लेट पर प्यार से परोसा मिले वही खा लेते हैं... वैसे अगर चिकन-मटन खा लेते हो...तो बी ब्रेव एन्ड बी एडवेन्चरस !... फैसला अगर होगा... जब भी होगा... तो खाये-पिये के आधार पर तो नहीं ही होगा ... क्या फायदा फिर मन मार भूखे रहने से ?

    ...... :)

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  16. @प्रवीण जी,
    उत्साहवर्द्धन के लिए ह्रदय से आभारी हूँ. मैं लोगों की अभिव्यक्ति का सम्मान करता हूँ बशर्ते कि वह एक दायरे में हो. मेरे लिखे को पसंद या नापसंद करने का हर पाठक का है और मैं इस हक का इस्तेमाल किये जाने का पूरा समर्थन करता हूँ.

    आपकी बात से मेरी भी पूरी सहमति है. फिर भी मन नहीं मानता. शायद नरक का भय ही हो.. ;)

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  17. Videshi log to yah bhi prashna kartein hain ki doodh shakahaari to nahin hai phir vegetarian log ise kyon khatein hain.
    Vastav mein shaakahaari evam maansahari khadya padarthon mein se hi do padarth hotein hain. Maansahaari ke alawa sabhi veg nahin hain aur veg ke alaawa sabhi maansahaar nahin hain. Magar ve log veg ke alaawa baaki sab ko bhi maansahaar maan letein hain. Is hisaab se to apni maan ka doodh bhi maansahaar ho jayega.

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  18. मुद्गल सर,
    मेरे ब्लॉग पर आने और अपनी राय देने के लिए धन्यवाद.
    आपने बहुत अच्छा मुद्दा उठाया. दूध शाकाहारी है या मांसाहार यह भी बहस का एक अलग मुद्दा है.

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  19. अगर आप गाय को पूजते हैं। तो गो मांस कैसे खा सकते हैं। बात आस्था की है। हम गो मांस नहीं खाते क्योंकि हमारा धर्म गाय को पवित्र समझता है। इसलिए हमारे यहाँ गो मांस का निषेध है।
    अब सवाल ये है कि हम क्यों गाय को पवित्र मानने लगे। हमारा सांस्कॄतिक इतिहास इस प्रश्न का जवाब देता है। भारतीय इतिहास के आदिकाल से ही हमारा संबंध पशुचारण से रहा है। सिन्धु सभ्यता मे भी बैल या वॄषभ का विषेश महत्व था। वैदिक सभ्यता तो मुलत: पशुचारक ही थी। ऐसा प्रतीत होता है कि गाय को पवित्र मानने कि परम्परा आरंभ मे नही थी। कई इतिहासकारो के अनुसार वैदिक लोग गाय का मांस खाते थे। साथ ही वैदिक संस्कॄति यग्य पर आधारित थी। इसमे भी बहुत सारे पशुवो का विनाश होता था ।उत्तर वैदिक काल मे, जब आर्य पशुचारण के स्थान पर खेती करने लगे तब पशुवो कि आवश्यकता कॄषि के लिये होने लगी। गाय को पवित्र मानने, से उसकी संख्या मे वॄद्धि होती थी। अतः गाय को पवित्र मानने वाले सम्प्रदायो को अधिक जन समर्थन मिलने लगा। संभवतः बुद्ध ने सबसे पहले गाय कि पवित्रता का विचार रखा। बाद मे इस सिद्धान्त का व्यापक प्रचार हो गया।
    अगर आप मार्क्स्वादी है तो द्वन्दात्मक भौतिकवाद के सिद्धान्त को भी आप यहा प्रयोग कर सकते है। आरंभिक आर्यो द्वारा गायो के भारी पैमाने पर विनाश ने बाद मे उनकी पवित्रता का विचार उत्पन्न किया। अगर नही तो .....
    मै Shah Nawaz जी से सहमत नही हु कि वैज्ञानिक आधार पर सुअर के मांस से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है.
    सतीश जी आपको kgsp के लिए बहुत बहुत बधाइ.

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  20. शशिकांत जी
    मेरे ब्लॉग पर आने आने और इतनी बेहतरीन और विस्तृत राय देने के लिये आपका आपका आभारी हूँ. मुझे लगता है आपकी टिप्पणी पूछे गए प्रश्न का सही और सटीक उत्तर देती है.

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  21. आपके इस ब्लॉग में अच्छा विमर्श-बिन्दु है। आपका प्रश्न मात्र एक प्रश्न नहीं अपितु एक सभ्यतामूलक विमर्श है। भारतीय संस्कृति का ज्ञात एवं अज्ञात इतिहास गाय से सम्बन्धित है। सभ्यता के उषाकाल से ही गाय भारतीय जीवन का एक अभिन्न अंग रही है। यही कारण है कि हमारे शास्त्रों में गाय के लिये अनेक शब्द एवं अर्थपरक व्युत्पत्तियाँ प्राप्त होती हैं। चाहे वह ऋग्वेद का सरमा-पणि संवाद हो, जिसमें देवताओं की गाय पणियों द्वारा चुराने की कथा है अथवा कठोपनिषद् में ऋषि वाजश्रवा द्वारा गोदान हो, प्रत्येक स्थान पर गाय के दर्शन होते हैं। हम गाय को माता के समान सम्मान देते हैं। वह हमारे लिये पूज्य है। हमारी आस्था, विश्वास, एवं पूर्वजों द्वारा संचित निधि का प्रकाश है गाय।

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  22. सबसे उपयुक्त जवाब मेरी नज़र में -
    खाना पीना सब निजी अभिरुचि पर निर्भर करते हैं और इसके लिए वैयक्तिक स्वतंत्रता होनी चाहिये ,बस

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  23. @ममता जी,
    सही कहा आपने.. आस्था का मूल्यांकन तर्क से नहीं किया जा सकता..
    @अरविन्द मिश्रा जी
    सहमत हूँ आपसे.. मैं भी किसी धार्मिक कारण से नहीं बल्कि बस मन न होने की वजह से यह सब नहीं खाता..

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  24. .

    हिन्दू अथवा मुस्लिम आस्था से जुड़े होने के कारण ही गोमांस और pork नहीं खाते। लेकिन विदेशियों को तर्कों से नहीं समझाया जा सकता । उनके लिए तो बस इतना कहना ही काफी है - " सबकी अपनी-अपनी पसंद है "

    .

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  25. सतीशजी,

    मेरे ब्‍लॉग पर टिप्‍पणी करने के लिए धन्‍यवाद। आपकी उस टिप्‍पणी के सहारे ही यहॉं तक पहुँचा।

    थोडे में अपनी बात कह देने का कौशल आपके लेखन में पहली ही बार में अनुभव होता है। आप अपने लेखन को नियमित करने पर विचार अवश्‍य करें।

    अपने लेखन में विस्‍तार से मैं बहुत ही परेशान रहता हूँ। आप इसे परिहास मत समझिएगा, आपकी इस पोस्‍ट जैसी पोस्‍टें पढ-पढ कर, थोड में अपनी बात कहने का प्रशिक्षण ले रहा हूँ। आप यदि नियमित लिखेंगे तो मेरा भी भला होगा।

    आपकी टिप्‍पणी पर अपनी टिप्‍पणी मैं अपने ब्‍लॉग पर ही दे रहा हूँ।

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  26. हम ३१ साल से यहां रह रहे हे, पहले पहल मीट खाया, वो भारत मे भी खाते थे, लेकिन एक दिन टी वी पर जानवरो पर एक प्रोगराम देखा ओर उस दिन २०% गोरो ने भी मीट खाना बंद कर दिया, यह ती वी की रिपोरट करीब ६ अम्हीने बाद आई थी, ओर हम ने भी उस प्रोगराम को देख कर मीट खाना छोड दिया था, जो आज तक नही खाया-

    आप भी जुडे ओर साथियो को भी जोडे...
    http://blogparivaar.blogspot.com/

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  27. ये सब बेकार की बाते है...एक जानवर को खाने में कितने पौधों की कुर्बानी दे देते है ...क्या आपने सोचा है

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